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मीडिया की मंडी में सबसे बड़ा रुपैय्या

मनीष तिवारी | Updated on: 23 February 2016, 8:15 IST
QUICK PILL
  • मीडिया एक व्यापार. इसमें कई हिस्सेदार हैं. किसी भी दूसरे धंधे की तरह मामला पैसे और मुनाफे पर आता है. समस्या यह है कि इस धंधे में इतना पैसा नहीं है कि सभी खिलाड़ियों को उसके मन मुताबिक पैसा मिलता रहे.
  • मीडिया के व्यापार में पैसे की कमी की एक बड़ी वजह इसका रेवेन्यू मॉडल है जिसमें कई खामियां हैं. यह समस्या टीवी इंडस्ट्री में और भी ज्यादा है. 
  • भारत में आर्थिक उदारवाद की जो 26 सालों की विरासत है, उसका सबसे बड़ा भुक्तभोगी टीवी हैं. हमने रेवड़ियों की तरह टीवी के लाइसेंस बांटे. इससे विचारिक विविधता में कोई इजाफा नहीं हुआ उल्टे सीमित बाजार में ढेर सारे खिलाड़ी खड़े हो गए. जबकि राजस्व बहुत कम था.

जेएनयू विवाद का एक दिलचस्प पहलू यह रहा कि इसे लेकर मीडिया में दो फाड़ हो गया है. एक शाम कार्टून चैनल की सर्फिंग के दौरान मैं थोडे़े समय के लिए अंग्रेजी के चैनल को देखने लगा. वहां विचार दिए जा रहे थे जबकि उसे यह लाइसेंस न्यूज और करेंट अफेयर्स दिखाने के लिए दिया गया था.

मैं उस वक्त हैरान रह गया जब मैंने उन्हें मीडिया ट्रस्ट की तरफ से चलाए जाने वाले स्वतंत्र न्यूज वेबसाइट के प्रोमोटर की लानत मलानत करने देखा क्योंकि उस वेबसाइट ने यह बताया था कि जेएनयू मामले में जिस वीडियो को चलाया जा रहा है वह 'फर्जी' है.

जिस प्रोमोटर पर सवाल उठाए जा रहे थे वह भारत के सबसे पुराने और सम्मानित न्यूजपेपर के संपादक रह चुके हैं. एक अन्य अंग्रेजी टीवी व्यूज चैनल ने यह साफ करने की कोशिश की कि जिस वीडियो को दिखाया जा रहा है वह नकली है और उसमें छेड़छाड़ कर बाहर से आवाज डालने की कोशिश की गई थी.

जेएनयू मामले में गृहमंत्री और दिल्ली पुलिस कमिश्नर पूरी स्थिति को लेकर दिग्भ्रमित नजर आ रहे हैं. राजनाथ सिंह ने जहां एक फर्जी ट्वीट के आधार पर जेएनयू के छात्रों का संबंध पाकिस्तान से जोड़ दिया वहीं दूसरे ने एक पैरोडी अकाउंट पर अपनी प्रतिक्रिया दे डाली. दोनों ने एक गंभीर मसले को मजाक बना कर रख दिया.

यह मजाक नहीं

यह सब उस स्थिति में ठीक लगता जब कोई कॉमेडियन यह सब कर रहा होता, लेकिन शासन में गंभीर पदों पर बैठे व्यक्तियों से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं की जाती है.

इसमें मीडिया की आपसी खींचतान भी दिख रही है. हो सकता है इसमें संपादकों की व्यक्ति ईर्ष्या भी शामिल हो. यह सब चीजें हमेशा से होती रही है लेकिन पहली बार यह सार्वजनिक रूप से दिख रहा है.

हालांकि इसकी वजह यह नहीं है कि मीडिया में सभी पक्षों ने बेहद संकीर्ण नजरिये से इस पूरे मामले को ही मोड़ने की कोशिश की. न ही यह मामला वैचारिक विरोधाभास का है. मीडिया में वैचारिक मतभेद लंबे समय से रहे हैं. यह कोई नई बात नहीं है.

भारतीय मीडिया में हर विचार के लोगों के काम करने के लिए जगह हमेशा मौजूद रही है. चाहे वह अति वामपंथी हो या अति दक्षिणपंथी. अक्सर लोगों के निजी विचारों का खबरों पर असर भी पड़ता है लेकिन इसे मानवीय त्रुटि माना जा सकता है.

ऐसे देश में जहां पर 1,05,443 प्रिंट मीडिया है और 399 से ज्यादा समाचार चैनल हैं. इसके अलावा 22 ऐसे चैनल हैं जिसकी कमान सरकार के पास है. यह सब मिलकर करीब सवा अरब की आबादी को सूचना देते हैं. लिहाजा इस तरह की गलतियां छिप जाती हैं.

इन आंकड़ों को 243 निजी एफएम चैनल, 188 कम्युनिटी रेडियो और 410 एफएम ट्रांसमीटर मिलकर और जटिल बना देते हैं. यह आंकड़ा कुल मीडिया स्पेस का छोटा सा नमूना भर है. अगर आप इसमें न्यू मीडिया, डिजिटल मीडिया और अन्य मीडिया के आयाम भी जोड़ दें तो यह दायरा असीमित हो जाता है.

इतने बड़े मीडिया के बाजार में हर तरह के लोगों के लिए हमेशा स्थान बना रहेगा. हालांकि समस्या यहां नहीं है.

गंदा है पर धंधा है

सच्चाई यह है कि मीडिया एक धंधा है. इसमें कई हिस्सेदार हैं. किसी भी दूसरे धंधे की तरह यहां भी मामला पैसे और मुनाफे का होता है.

समस्या यह है कि इस धंधे में इतना पैसा नहीं है कि इतनी भारी संख्या में यहां मौजूद हिस्सेदारों को उनके मन मुताबिक पैसा मिलता रहे. इसकी एक वजह इसका रेवेन्यू मॉडल भी जिसमें कई खामियां भी हैं. यह समस्या टीवी इंडस्ट्री में और भी ज्यादा है. 

851 टीवी चैनलों में से 399 समाचार के बिजनेस में हैं. लेकिन टेलीविजन के कुल व्यापार का सिर्फ 7 फीसदी राजस्व ही समाचार चैनलों को मिलता है. बाकी हिस्सा यानी 93% मनोरंजन चैनलों के पास जाता है.

दूसरे शब्दों में कहें तो 93 फीसदी लोग टीवी पर समाचार देखते ही नहीं है. अभी तक टीवी समाचार चैनल सब्सक्रिप्शन का पुख्ता मॉडल नहीं खोज पाए हैं. पूरी आय विज्ञापनों पर निर्भर है. यह विज्ञापन उस पर निर्भर है कि कितने लोग आपका चैनल देखते हैं. यानी दर्शक.

दर्शक को गिनने का जो तरीका है वह अपने आप में खामियों भरी है. इसे टीआरपी कहा जाता है. अगर दर्शक नहीं होंगे तो आपके पास पैसा नहीं आएगा. जो डिस्ट्रीब्यूटर है वह चैनलों से अलग से वसूली करते हैं. यह डिस्ट्रीब्यूटर जहां मनोरंजन के चैनलों को या तो फ्री में दिखाते हैं या कभी उन्हें उल्टा भुगतान भी करते हैं. जबकि न्यूज चैनलों के मामले में स्थिति उलटी है.

आईबी मिनिस्टर के तौर पर मैंने टीवी रेटिंग के लिए एक दिशानिर्देश तैयार किया था. इसके तहत सभी टीवी कंपनियों को अपना शेयरहोल्डिंग पैटर्न सार्वजनिक करना था. 

सबसे पहले खबर दिखाने का जो दबाव है उससे खबर की विश्वसनीयता समाप्त हो रही है

अपने लिए समस्या खड़ी होते देख ज्यादातर चैनल हाईकोर्ट चले गए और इन दिशानिर्देशों के ज्यादातर बिंदुओं पर स्टे ले लिया. मामला अभी भी कोर्ट में है. इस दौरान टीवी इंडस्ट्री एक नया सिस्टम बार्क लेकर सामने आई. इन्होंने भी मोटे तौर पर टैम के तरीकों को फॉलो किया. आज जो आंकड़ा आपको मिल रहा है वह टैम के ही आंकड़े हैं जिसे बार्क के तौर पर आपको दिया जा रहा है.

यह सही नहीं है

दर्शकों के आंकड़ों पर नजर रखने का कोई दूसरा तरीका नहीं है. इस मामले में कोई प्रतिस्पर्धा भी नहीं है. जिन पीपुल मीटर के आधार पर आंकड़े निकाले जाते हैं उसका दायरा काफी छोटा है. 16.8 करोड़ टीवी वाले घरों के मुकाबले महज 30,000 पीपुल्स मीटर लगाए गए हैं.

ऐसे तनाव भरे माहौल में संपादकीय टीम पर हमेशा अतिरिक्त दबाव बना रहता है. सबसे पहले खबर दिखाने का जो दबाव है उससे खबर की विश्वसनीयता समाप्त हो रही है. 

जेएनयू का पूरा मामला इसकी बानगी है. एबीवीपी ने जो वीडियो दिखाया वह आम आदमी की रुचियों के मुताबिक हो सकता है क्योंकि इसमें अंधराष्ट्रवाद कूट-कूट कर भरा हुआ था. यह लोगों को पसंद आता है. लेकिन चैनलोंं के पास इसे रोकने, फिल्टर करने या उसे तय करने का वक्त ही नहीं है.

भारत के आर्थिक उदारवाद की जो 26 सालों की विरासत है, उसका सबसे बड़े भुक्तभोगी टीवी हैं. हमने रेवड़ियों की तरह टीवी के लाइसेंस बांटे. इससे विचारों की विविधता में कोई इजाफा नहीं हुआ बल्कि जो सीमित बाजार था उसमें ही कई सारे खिलाड़ी पैदा हो गए. जबकि राजस्व काफी कम था.

इस छोटे से पैसे ने भारतीय टीवी मीडिया में कुश्ती की शुरुआत कर दी. इसकी कीमत ख्रबरों ने चुकाई. कल को अगर यह साबित हो जाता है कि जेएनयू का वीडियो गलत था तो क्या चैनल इसकी जिम्मेदारी लेंगे? इसका जवाब है  नहीं. तब तक वह किसी और की सनसनीपसंद बाइट लेने में जुटे होंगे. 

First published: 23 February 2016, 8:15 IST
 
मनीष तिवारी @catchhindi

तिवारी कांग्रेस के नेता और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता हैं. पिछली यूपीए सरकार में तिवारी सूचना और प्रसारण मंत्री थे.

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