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मीरवाइज: संविधान के दायरे में कश्मीर का हल नहीं है इसलिए हम इसमें हिस्सा नहीं लेंगे

कैच ब्यूरो | Updated on: 5 September 2016, 7:46 IST
QUICK PILL
भारतीय राजनीतिक दलों का समूह सर्वदलीय प्रतिनिधिमंड इस समय कश्मीर में है. बीते लगभग दो महीने से चल रही हिंसा और विद्रोह के बाद शांति के संभावित विकल्प तलाशने के लिए यह दल कश्मीर गया हुआ है. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर के तमाम पक्षों के साथ ही हुर्रियत के उदारवादी धड़े को भी बातचीत में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है. हालांकि हुर्रियत चेयरमैन मीरवाइज उमर फारुख इस समय नजरबंदी में हैं. कैच से बातचीत में उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि कश्मीर समस्या का हल संविधान के दायरे में नहीं निकल सकता लिहाजा वे इस बातचीत का हिस्सा नहीं बनेंगे.

आप घाटी में हालात स्थिर करने की दिशा में काम क्यों नहीं करते? राज्य सरकार ने शांति बहाली के लिए आपसे सहयोग मांगा है?

राज्य सरकार ने पिछले कई सालों में यह तय कर दिया है कि हमें राजनीतिक मंच पर कोई स्थान नहीं मिलेगा. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि सरकार यह मानती है कि इससे हम जनता से अलग हो जाएंगे और हमारा प्रभाव खत्म हो जाएगा. साथ ही आजादी का संवेदनशील मुद्दा भी कमजोर पड़ जाएगा. परन्तु मौजूदा हालात से यह स्पष्ट हो गया है कि इस रणनीति से केवल नुकसान ही हुआ है. लोगों में विद्रोह की भावना भड़क उठी है और वे अपने मूल अधिकारों की मांग कर रहे हैं.

इसके बावजूद केंद्र और राज्य सरकार अब भी अपनी रणनीति बदलने को तैयार नहीं हैं. हमें हमारे घरों में नजरबंद कर दिया गया है या जेल में डाल दिया गया है. सरकार इस विद्रोह से कैसे निपट रही है? युवकों को मार कर या उन्हें अंधा करके. वह विरोध का दमन करने के लिए सशस्त्र बलों का इस्तेमाल कर रही है और समस्या का राजनीतिक समाधान उसके पास है ही नहीं.

उन्हीं दिनों प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हमारे खिलाफ एक दुष्प्रचार अभियान छेड़ दिया गया. इसमें सरकार द्वारा हमारे खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे दमन के तरीके को सही बताया गया और कहा गया कि ये कथित ‘शांति कायम करने के लिए आवश्यक है.’

मसला केवल शांति कायम करने का नहीं है, बल्कि राज्य की जनता क्या चाहती है, इस मसले को हल करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे और कश्मीरियों की उम्मीद के मुताबिक एक सार्थक प्रक्रिया शुरू करनी होगी.

एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल कश्मीर में है. और जम्मू-कश्मीर के विपक्षी प्रतिनिधि मंडल के साथ हुई एक बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया कि ‘संविधान के दायरे में रह कर कश्मीर का समाधान किया जाए.’ आपको क्या लगता है?

बेशक प्रधानमंत्री ने कश्मीर मसले के स्थाई समाधान की बात कही है लेकिन उन्होंने यह संविधान के अनुरूप करने की बात कही है. अगर ऐसी ही बात थी तो कश्मीर मसला 1947 में ही सुलझा लिया गया होता. सच्चाई यह है कि राज्य पर यह विवाद पिछले सात दशकों से जारी है और इसी वजह से दक्षिण एशिया में अस्थिरता का कारण बना हुआ है, क्योंकि भारत इस मसले का समाधान संविधान के दायरे में रह कर करना चाहता है.

इस पूरे विवाद में कश्मीरी बुरी तरह से फंसे हुए हैं. हजारों लोगों की जानें चली गईं. अब हमारी चौथी पीढ़ी विद्रोह पर उतर आई है. पिछले दो माह से युवकों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, पैलेट गनें तानी जा रही हैं. 75 से ज्यादा लोगों को मार गिराया गया और सैंकड़ों लोगों को अंधा कर दिया गया.

आप इस सच्चाई को अनदेखा नही कर सकते और एक ही रट नहीं लगा सकते. इससे कोई हल नहीं निकलेगा. मोदी को लगता है कि वे ही समस्या काहल निकाल लेंगे. उन्हें इसी के लिए जनादेश मिला है. हम अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं. जरूरत है साहस और राजनीतिक विकल्पों की. विवाद से जुड़े तीनों पक्षों को इसमें सार्थक रूप से जोड़ना होगा.

कश्मीर विवाद को हल करने का सर्वाधिक लोकतांत्रिक तरीका यह है कि जनमत संग्रह करवाया जाए और लोगों को खुद ही तय करने दिया जाए. यह पूरे जम्मू-कश्मीर पाक अधिकृत कश्मीर दोनों क्षेत्रों में करवाया जा सकता है.

पहले, आप नई दिल्ली के साथ कई दौर की वार्ताओं में शामिल रह चुके हैं. क्या आप केंद्र से दोबारा बातचीत के लिए तैयार हैं?

हम नई दिल्ली के साथ बिना शर्त वार्ता कर चुके हैं. काफी जोखिम के बावजूद हमने वार्ताएं कीं और हमें खेद है कि हम इस प्रक्रिया में सिर्फ पीड़ित हुए, छले गए.

2004 से 2006 के दौरान हमने भारत और पाकिस्तान दोनों से ही बात की. पर क्या हुआ, भारत अपने वादों से पीछे हट गया और वार्ता प्रक्रिया बीच में ही छोड़ दी गई.

इससे न केवल हमारी साख खराब हुई बल्कि वार्ता प्रक्रिया को भी झटका लगा है. अब कश्मीरियों को वार्ता में भरोसा नहीं रह गया है. इसे एक तरह से वक्त की बर्बादी माना जा रहा है. हम ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकते, जिसका कोई नतीजा न निकले. कम से कम उस प्रक्रिया का तो नहीं जो संविधान के दायरे में हो.

समस्या यह भी है कि हुर्रियत कश्मीर पर वार्ता में पाकिस्तान को शामिल करना चाहती है. हुर्रियत सीधे केंद्र से क्यों नहीं बात कर सकती और पाकिस्तान के साथ स्वतंत्र रूप से यह मसला सुलझा सकती है?

ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि इससे कोई हल नहीं निकलेगा. आप यह नहीं भूल सकते कि राज्य पर विवाद में पाकिस्तान भी एक पक्ष है. मसला पूरे जम्मू-कश्मीर का है, जिसका एक हिस्सा पाक के कब्जे में है. एक संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव भी है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों हस्ताक्षरकर्ता हैं.

और फिर वही बात, अगर श्रीनगर और दिल्ली के बीच वार्ता से ही मसला हल हो जाता तो यह काफी पहले हो गया होता. 1975 की इंदिरा-शेख संधि से क्या कुछ हासिल हुआ है?

दूसरी ओर मैं कहूंगा कि भारत-पाक वार्ता से भी कश्मीर मसले का हल नहीं निकल सकता, अगर उसमें कश्मीरी शामिल नहीं हैं. हमारा द्विपक्षीय संबंधों का लंबा इतिहास रहा है- जैसे ताशकंद और शिमला समझौता. इनसे कोई हल नहीं निकला. कोई भी विवाद तब तक हल नहीं होता जब तक कि उसमें सारे पक्षों को शामिल न किया जाए.

क्या मुशर्रफ का चार सूत्री फार्मूला कश्मीर समस्या के हल का आधार बनेगा?

यह एक अच्छी प्रक्रिया थी, जो कि भलि-भांति लागू की जा सकती थी लेकिन भारत के नकारात्मक रवैये और पाकिस्तान की आंतरिक समस्याओं के चलते यह प्रक्रिया किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी. हो सकता है, इन मौजूदा हालात में भारत और पाकिस्तान इस प्रक्रिया की ओर लौटें.

इस फार्मूले में प्रगति की काफी गुंजाइश है. कश्मीरियों के लिए सबसे बड़ी जरूरत सेना को हटाना था. इससे कश्मीर की दमनात्मक स्थिति बदल सकती थी. खुली सीमाओं से एक ‘आजाद कश्मीर’ तक पहुंच आसान होगी और वहां से मध्य एशिया तक. यह फार्मूला मील का पत्थर साबित हो सकता था. कल्पना कीजिए अगर दस साल पहले यह समझौता लागू हो गया होता तो कश्मीर भारत-पाक के बीच सौहार्द्र का स्रोत होता न कि मनमुटाव का कारण.

यह चार सूत्री फार्मूला इतना ही नहीं था; इसके अनुसार, इसके लागू होने के बाद एक जनमत संग्रह भी करवाया जाता.

First published: 5 September 2016, 7:46 IST
 
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