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तमिलनाडु में सत्ता बदली तो स्टालिन होंगे किंग

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 March 2016, 23:30 IST
QUICK PILL
  • 1967 के चुनाव में हारने के बाद से कांग्रेस तमिलनाडु की राजनीति से पूरी तरह बाहर हो चुकी है. अब मतदाताओं के पास डीएमके और एआईडीएमके का ही विकल्प है.
  • जयललिता जहां 60 साल की उम्र को पार कर चुकी है वहीं करुणानिधि 92 साल की उम्र में व्हीलचेयर पर बैठे हुए हैं. ऐसे में डीएमके के लिए चुनाव प्रचार को चलाने की जिम्मेदारी उनके बेटे स्टालिन पर आ गई है.

हर चुनाव से बदलाव की उम्मीद होती है. लेकिन तमिलनाडु में मतदाताओं को घूम फिरकर डीएमके और एआईडीएमके के बीच ही चुनाव करना होता है. 1967 के चुनाव में हारने के बाद से कांग्रेस राज्य की राजनीति से पूरी तरह बाहर हो चुकी है. अब मतदाताओं के पास डीएमके और एआईडीएमके का ही विकल्प शेष है.

राज्य में केवल दो ही मुख्यमंत्रियों का लंबा कार्यकाल रहा है. कांग्रेस नेता के कामराज 1954-63 के बीच नौ सालों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे वहीं सिनेस्टार एमजी रामचंद्रन 1977-87 के बीच दस सालों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे.

तब से लेकर आज तक मतदाताओं को डीएमके के करुणानिधि और एआईडीएमके की जे जयललिता में से ही किसी को चुनना पड़ता है. इस ट्रेंड के आधार पर देखा जाए तो इस बार कुर्सी जयललिता के हाथ से खिसककर करुणानिधि के पास चली जाएगी.

हालांकि इस बार डीएमके के जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके बेटे एमके स्टालिन को मिल सकती है.

खिसकने लगी जमीन

भ्रष्टाचार के मामले में रिहा होने के बावजूद जयललिता की सियासी किस्मत अधर में लटकी हुई है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल उनके खिलाफ ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा है जिसमें कर्नाटक सरकार ने जयललिता की रिहाई को चुनौती दे रखी है. कोर्ट का फैसला कभी भी आ सकता है लेकिन यह निश्चित तौर पर 16 मई के पहले नहीं आएगा.

जयललिता जहां 60 साल की उम्र को पार कर चुकी है वहीं करुणानिधि 92 साल की उम्र में व्हीलचेयर पर बैठे हुए हैं. ऐसे में डीएमके के लिए चुनाव प्रचार को चलाने की जिम्मेदारी उनके बेटे स्टालिन पर आ गई है जिन्हें अनाधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ाया जा रहा है.

एआईडीएमके के लिए जीत जयललिता के चुनाव प्रचार पर निर्भर है. हालांकि उनकी खराब सेहत पार्टी के लिए चिंता का विषय है. जयललिता के खिलाफ तेज सत्ता विरोधी रुझान भी है. 

जयललिता की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर जबरदस्त माहौल है और लोगों को लगता है कि सरकार काम करने में विफल रही है.

डीएमके के खिलाफ जहां भ्रष्टाचार को लेकर संशय है तो वहीं एआईडीएमके के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है

वहीं डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन को लेकर भी स्थिति अच्छी नहीं है. दोनों पार्टियां यूपीए-2 में गठबंधन में थी और इसी दौरान 2जी घोटाला हुआ था और इसमें करुणानिधि की बेटी कनिमोझी आरोपी हैं. यूपीए-2 के दौरान कोयला घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और अन्य घोटाले सामने आए थे.

इसके अलावा डीएमके की पूर्व सरकार पिछले कुछ सालों में तमिलनाडु की सबसे भ्रष्ट सरकार में से एक रही है. यही वजह रही कि पार्टी 2011 के चनुाव में तीसरे पायदान पर पहुंच गई और फिर जयललिता सत्ता में आई. विजयकांत की पार्टी डीएमडीके दूसरे पायदान पर रही और फिर वह विधानसभा में विपक्ष के नेता बने.

कोई मजबूत ताकत नहीं

हालांकि अब अभिनेता से नेता बने विजयकांत ने जयललिता के साथ सहयोग करने से मना कर दिया है तो जयललिता ने उनकी पार्टी के 9 विधायकों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की है. 

जयललिता ऐसा करने में सफल रहीं और उनके विधायकों ने एआईडीएमके के साथ हाथ मिला लिया. फिर विधानसभा स्पीकर ने विजयकांत को विपक्ष के नेता के पद से हटा दिया.

इसके बाद विजयकांत ने डीएमके और एआईडीएमके के विकल्प के तौर पर खुद को सामने रखने की कोशिश की. इसलिए जब करुणानिधि ने उनसे हाथ मिलाने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने कहा, 'मुझे इसकी जरूरत नहीं है.'

बीजेपी तमिलनाडु में 1998 और 99 के लोकसभा चुनाव में ठीक-ठाक प्रदर्शन कर पाई क्योंकि इसकी वजह एआईडीएमके और डीएमके के साथ होने वाला गठबंधन था. 

हालांकि यह गठबंधन पार्टी के प्रदर्शन पर नहीं बना था इसलिए एनडीए के पूर्व सहयोगियों एमडीएमके और पीएमके ने पार्टी से किनारा कर लिया था. विजयकांत भी इस बार पार्टी से किनारा कर चुके हैं.

विजयकांत को लेकर सबसे बड़ी अफवाह यह है कि उन्हें मिला 10 फीसदी वोट अभी भी उनके साथ है. उनकी पार्टी को 2006 के विधानसभा चुनाव में 8.5 फीसदी वोट मिला था लेकिन उनकी पार्टी से उनके अलावा कोई और नहीं जीत पाया. 

2009 के लोकसभा चुनाव में उनका वोट शेयर बढ़कर 10.5 फीसदी हो गया लेकिन चूंकि वह एनडीए के साथ चुनाव लड़े थे इसलिए यह कहना मुश्किल है कि इसमें उनकी हिस्सेदारी कितनी थी.

राज्य में जहां तक तीसरे मोर्चे का सवाल है तो ऐसा कोई भी नेता नहीं जो सत्ता में रहा हो. सभी नेता एआईडीएमके और डीएमके के साथ सरकार में रहे हैं. पीएमके के अंबुमणि रामदॉस केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. लेकिन उनकी अपील में दम नहीं है.

2006 को छोड़कर तमिलनाडु के लोगों ने हमेशा ही निर्णायक तौर पर मतदान किया है

तमिलनाडु के लोगों ने हमेशा ही निर्णायक तौर पर मतदान किया है. केवल 2006 में ऐसा हुआ जब उन्होंने डीएमके की बजाए डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन के पक्ष में मतदान किया. हालांकि यह अलग बात है कि करुणानिधि ने कांग्रेस के साथ सत्ता साझा करने से मना कर दिया और अल्पमत वाली सरकार चलाई. हालांकि यूपीए सरकार में करुणानिधि को मंत्रालय जरूर मिला.

इस बार मतदाता स्टालिन के पक्ष में मतदान कर सकते हैं क्योंकि उनकी उम्र जयललिता के बराबर है. वहीं उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है. स्टालिन दो बार चेन्न्ई के मेयर रह चुके हैं और करुणानिधि की सरकार में स्थानीय प्रशासन संबंधी मामलों के मंत्री भी रह चुके हैं. अब स्टालिन के पास मौका अपने को साबित करने का है. क्या वह इसके लिए तैयार है?

First published: 26 March 2016, 23:30 IST
 
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