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'हमारी जिंदगी लूटकर टाटा कहते हैं बाय-बाय'

शिरीष खरे | Updated on: 2 June 2016, 14:02 IST
(शिरीष खरे)
QUICK PILL
  • बस्तर के बहुचर्चित लोहण्डीगुड़ा मेगा स्टील संयंत्र के नाम पर अपने खेत गंवा चुके हजारों किसानों का झलका दर्द. कहा दस साल दर-दर भटके रहे हैं, जब नहीं बन रहा टाटा स्टील प्लांट तो क्यों किया कब्जा.
  • टाटा ने सिंगूर के बाद अब बस्तर को भी कहा बाय-बाय. बस्तर में औद्योगिक क्रांति लाने के लिए लोहण्डीगुड़ा के पास सरकार ने टाटा से सालाना 5.5 मिलियन टन स्टील संयंत्र लगाने के लिए 6 जून, 2015 को किया था करार. कंपनी ने संयंत्र लगाने के लिए मांगी दो हजार हेक्टेयर जमीन.
  • अब प्लांट लगाने से टाटा ने हाथ पीछे खींच लिए. बताया जाता है कि कंपनी प्लांट के पास ही कच्चा माल के लिए सरकार से चाहती थी खदान, जबकि बैलाडीला की खदान एनएमडीसी के अधिकार क्षेत्र में है.

टाटा के बाय-बाय कह देने से हमारे जख्म तो भर नहीं जाएंगे. कोई हमें बताए कि दस बरस से किस कसूर की सजा दी जा रही है? बड़ा स्टील संयंत्र का झूठा ख्वाब दिखाकर आपने तो हमारे खेत लूट लिए. प्रदेश भर में तरक्की के नाम पर धोखा देकर यह सरकार बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर यहीं खेल खेल रही हैं.

देखो, कुछ किया भी नहीं और हमें बर्बाद कर डाला. जब कुछ करना ही नहीं था तो क्यों लूटी हमारी जमीन. जब यह तय हो चुका है कि टाटा यहां स्टील प्लांट नहीं लगा रहा है तो अब तो हमारी जमीन वापस कर दो. बताया गया था कि संयंत्र का काम शुरु होते ही दस गांव उजड़ जाएंगे, इसलिए दस साल से हमारे विकास का एक काम नहीं हुआ. दस साल से यहां एक नल, स्कूल, अस्पताल और सड़क के लिए तरस गए. सालों से जो विकास रुका है, उसका हिसाब कौन देगा?

यह दर्द जगदलपुर से कोई 30 किमी दूर लोहण्डीगुड़ा ब्लॉक के बंड़ाजी गांव के ग्रामीणों का है. 6 जून, 2005 को राज्य सरकार और टाटा ने यहां मेगा स्टील संयंत्र लगाने के लिए करार किया था. तब बस्तर को भिलाई की तरह ही औद्योगिक तौर पर विकसित करने का दावा किया गया था. मगर इस बीच संयंत्र लगाने का काम शुरु नहीं हो पाया है.

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अब टाटा के योजना से कदम वापस खींचने के पुख्ता संकेत मिल रहे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि शासन ने संयंत्र के नाम पर उनकी जमीन लूटी है. वहीं, सालों तक दस गांवों की पूरी आबादी को विकास की मुख्यधारा से अलग रखा.

ग्रामीणों का आरोप है कि राज्य सरकार ने टाटा के संयंत्र के नाम पर उनकी जमीन लूटी है

वहीं, लोहण्डीगुड़ा में जमीन किसानों के पास है उसमें वे खेती करते हैं, लेकिन मालिकाना हक नहीं है. इसलिए किसान होते हुए भी सरकार उन्हें किसान नहीं मानती. किसानों को सरकारी अनुदान व लाभ मिलने बंद हो गए हैं. दस गांवों के 1700 से ज्यादा किसान मंझदार में फंसे दिख रहे हैं. बस्तर में आदिवासी महासभा के बैनर तले लोहण्डीगुड़ा इलाके के हजारों किसान बड़े आंदोलन की तैयारी में है.

महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष कुंजाम ने बताया कि आदिवासी महासभा किसानों के साथ है. जनपद सदस्य वासुराम नाग का कहना है, 'सरकार अब भी हमारी भलाई चाहती है तो फौरन पट्टे वापस दे दे. यह बस्तर के सबसे सम्पन्न किसानों का इलाका है, यहां उपजाऊ खेतों से सालाना दो बार फसलें ली जाती हैं. सरकार हम किसानों को सूखा जैसी कोई राहत न दे, देना ही है तो राहत के नाम पर हमें हमारी जमीन का मालिकाना हक दे दे.'

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कुरसोराम कश्यप का कहना है, 'खेत ही किसानों की जिदंगी है, इसलिए टाटा यहां प्लांट नहीं लगा रही है तो ग्रामसभा में हम ग्रामीणों की जमीनों के पट्टे वापस लेने के लिए प्रस्ताव रखेंगे.'

विकास की बड़ी कीमत

लोहण्डीगुड़ा से कुछ कोस दूर बंड़ाजी गांव जाते समय विकास कार्य ठप दिखाई देता है. कच्चे रास्ते के सहारे ही यहां तक पहुंच जा सकता है. ग्रामीण बताते हैं कि दस साल से उन्हें बिना अपराध की सजा भुगतनी पड़ रही है. यहां तक की ब्लॉक स्तर के अधिकारी उनके रहवासी पहचान पत्र बनाने को लेकर भी सवाल पूछते हैं.

ग्रामीणों का कहना है कि बस्तर के विकास के नाम पर हमारा ही विकास रुक गया. हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है. योजना से प्रभावित दस गांवों में बंड़ाजी के अलावा छिंदगांव, कुम्हली, ठाकुरगुड़ा, बेलर, दुरागांव, छोटे परोदा, दावपाल, सिरिसगुड़ा और बेलियापारा भी शामिल हैं.

दोनों ओर बुरा असर

बस्तर में औद्योगिक क्रांति लाने के लिए लोहण्डीगुड़ा के पास सरकार ने टाटा से सालाना 5.5 मिलियन टन स्टील संयंत्र लगाने के लिए करार किया था. कंपनी ने संयंत्र लगाने के लिए दो हजार हेक्टेयर जमीन मांगी थी. इसके लिए 19 हजार 500 करोड़ रुपए की लागत बताई गई. प्रस्तावित इलाका आदिवासी क्षेत्र में है जहां दस साल बाद भी सरकार जमीन का कब्जा कंपनी को नहीं दिला सकी है.

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बताया जाता है कि कंपनी प्लांट के पास ही कच्चा माल के लिए सरकार से खदान भी चाहती है, जबकि बैलाडीला की खदान एनएमडीसी के अधिकार क्षेत्र में है. टाटा समूह का पूर्वेक्षण के लिए लीज की अवधि 30 सितंबर, 2015 को खत्म हो चुकी है.

माओवाद प्रभावित क्षेत्र में स्थानीय आदिवासियों के विरोध को भी उद्योग न लगने की वजह माना जा रहा है

गौरतलब है कि राज्य सरकार बस्तर संभाग को उद्योगों के लिहाज से असीम संभावनाओं का क्षेत्र बता रही है. मगर संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद यहां अब तक उद्योग के नाम पर एक मात्र नगरनार स्टील प्लांट को ही स्थापित करने में सफलता मिली है.

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लौह अयस्क के विशाल भंडार की उपलब्धता को देखते हुए बस्तर में स्टील प्लांट की स्थापना के लिए इससे पूर्व एसएम डाइकेम, मुकुन्द स्टील, टाटा, एस्सार जैसे कंपनियों ने भी स्टील प्लांट लगाने का प्रयास किया था, कोई भी कंपनी उद्योग लगाने में कामयाबी हासिल नहीं कर सकी है. माओवाद प्रभावित क्षेत्र में स्थानीय आदिवासियों के विरोध को भी उद्योग न स्थापित होने के पीछे की वजह माना जा रहा है.

छत्तीसगढ़ के उद्योग सचिव सुबोध सिंह कहते हैं, 'लोहण्डीगुड़ा में टाटा ने स्टील प्लांट लगाने को लेकर अभी तक दिलचस्पी नहीं दिखाई है. वहां किसानों के पट्टे वापस नहीं होना एक गंभीर समस्या है. आखिर मामला प्रदेश के विकास का है, इसलिए इस बारे में फिर से टाटा प्रबंधन से एक बार बात करेंगे.'दूसरी तरफ, यह सवाल अब भी अधूरा रह गया है कि जो जमीन टाटा के लिए सरकार ने अधिग्रहित की थी, अब उस जमीन का क्या होगा? करीब दो हजार हेक्टेयर यह जमीन सरकार ने किसानों से छीनी है. सरकार अब यह जमीन उद्योगों को देगी या फिर किसानों को वापस करेगी?

First published: 2 June 2016, 14:02 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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