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क्या सरकार टीबी मरीज़ों को सस्ती दवा मुहैया करवा सकती है?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 30 January 2017, 7:57 IST

हर साल 22 लाख भारतीयों को अपनी चपेट में लेने वाली और सालाना लगभग 2 लाख 20 हजार मौतों की जिम्मेदार ट्यूबरक्लोसिस यानी कि टीबी निश्चित रूप से ऐसी घातक बीमारी है जिसकी गंभीर और सतत निगरानी जरूरी है.

मानो इतना ही काफी नहीं था, तो भारत में चिंता की एक और बात गहराती जा रही है. चीन के बाद भारत में सर्वाधिक ऐसे टीबी रोगी हैं जिन पर अब दवाओं का भी असर नहीं होता यानी वे दवा-रोधी क्षमता विकसित कर चुके हैं. 2013 में भारत में ऐसे रोगियों की संख्या 248,000 थी. 

देश की पूरी आबादी के अनुपात में हमें यह संख्या बहुत छोटी लग सकती है, लेकिन इससे दवा प्रतिरोधी टीबी किसी गंभीर राष्ट्रीय व्याधि से कम नहीं हो जाती. आखिर इसके उपचार पर जो खर्च आता है वह भारत सरकार के टीबी रोकथाम पहल के अंतर्गत रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्लोसिस कंट्रोल प्रोग्राम (आरएनटीसीपी) के बजट का 40 प्रतिशत है.

दवारोधी टीबी के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए इसकी चपेट से बाहर आ चुके लोगों तथा विभिन्न जन स्वास्थ्य समूहों ने स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि आरएनटीसीपी के अंतर्गत टीबी की पेटेन्ट दवा डेलामैनिड को भी शामिल किया जाए. दवारोधी टीबी को ठीक करने में यह दवा असरकारी साबित हुई है.

सही इलाज की दरकार

देहली नेटवर्क ऑफ पॉजिटिव पीपुल के पॉल लुहंगडिम का कहना है कि मल्टीड्रग रोधी टीबी (एमडीआर) और एक्टेन्सिव ड्रग रजिस्टेंस टीबी (एक्सडीआर) के मामलों से जूझ रहे रोगियों को भारत में उचित इलाज नहीं मिल पाता है. प्राय: लोगों की इस कारण से मौत हो जाती है कि उन्हें जरूरी दवाओं का उचित कॉम्बिनेशन नहीं मिल पाता है. ओत्सुका सचमुच लंबे समय से भारत को टीबी-रोधी दवा डेलामैनिड देने से मना करती आई है.

अब कई जनस्वास्थ्य समूहों ने भारत सरकार से पत्र लिखकर आग्रह किया है कि वह डेलामैनिड बनाने वाली कंपनी ओत्सुका को निर्देश दे कि वह इस दवा को रजिस्टर कर आरएनटीसीपी के अंतर्गत इसकी आपूर्ति करे. लुहंगडिम आगे कहते हैं कि अगर यह दवा कंपनी भारत में यह दवा उपलब्ध नहीं कराती है तो भारत सरकार को सरकारी उपयोग के लिए इस दवा का जेनेरिक आपूर्तिकर्ता सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए. उनका कहना है कि ऐसा करने से हजारों जानों को बचाया जा सकता है.

दो साल का इलाज

दरअसल दवारोधी टीबी के मरीजों को कम से कम नौ महीने से लेकर दो साल तक उपचार लेने की जरूरत होती है. इस उपचार में दवा से लेकर इंजेक्शन दोनों ही लगातार दिए जाते हैं. दो दवा कंपनियों जॉनसन एंड जॉनसन की फॉर्मास्यूटिकल डिवजन जैन्सेन तथा ओत्सुका ने क्रमश: बेडाक्यूलाइन तथा डेलामैनिड नाम से ऐसी दो दवाएं बनाई हैं जिनके लेने से टीबीरोधी मरीजों में सुधार देखा गया है. 

लेकिन दोनों ही कंपनियों ने इनको पेटेन्ट करा रखा है और इनकी कीमत और वितरण पर इनका पूर्ण एकाधिकार है. लेकिन अगर भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय जन समूहों की आवाज सुनती है और आरएनटीसीपी में ओत्सुका की दवा शामिल कर ली जाती है तो भारत टीबी के रोगियों का इलाज अधिक प्रभावशाली तरीके से कर पाएगा.

कोई पहल नहीं

लॉयर्स कलेक्टिव के आनंद ग्रोवर का कहना है कि ओत्सुका ने अब तक भारत में डेलामैनिड को उपलब्ध कराने की दिशा में कदम नहीं उठाया है. इससे भारत में दवारोधी टीबी से जूझ रहे मरीज बहुत मुश्किल का सामना कर रहे हैं. इसलिए सरकार को तुरंत सक्रियता से कदम उठाते हुए ओत्सुका को भारत में टीबी प्रोग्राम के अंतर्गत यह दवा उपलब्ध कराने संबंधी निर्देश देना चाहिए.

वर्तमान में भारत के पास मुश्किल से तीन सौ मरीजों के उपचार के लायक बेडाक्विलीन दवा उपलब्ध है. दवाओं का यह स्टॉक यूएसएड प्रोग्राम के अंतर्गत भारत में उपलब्ध कराया गया था और इनका वितरण टीबी प्रोग्राम के अंतर्गत चलने वाले पांच केंद्रों के माध्यम से किया जाएगा. डेलामैनिड तो अभी भी इस प्रोग्राम के अंतर्गत उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है, जबकि इस दवा को आठ साल पहले पैटेन्ट हासिल हुआ था.

आरएनटीसीपी के गाइडलाइन्स के अनुसार बेडाक्विलाइन को भारत में टीबी प्रोग्राम के अंतर्गत दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, चैन्नई और गुवाहाटी में ही उपलब्ध कराया जाएगा. हालांकि इसी माह के आरंभ में एक एमडीआर-टीबी रोगी की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने यह निर्देश दिए हैं कि जीवन-बचाने वाली दवाओं को प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार का निवास प्रमाण पत्र जरूरी नहीं है. 

मेडिसन्स सैन्स फ्रंटियर्स के सस्ती दवाओं के लिए अभियान को चलाने वाली लीना मेनघाने का कहना है कि पेटेन्ट सिर्फ इसलिए नहीं दिए जाते कि उससे दवा पर एकाधिकार स्थापित हो, बल्कि पैटेन्ट उपलब्ध कराने के पीछे शर्त यह भी होती है कि पेटेन्ट धारक देश में दवा उपलब्ध कराएगा. फिर भी डेलामैनिड दवा को भारत में पैटेंट हासिल हुए आठ साल से अधिक समय हो चुका है लेकिन अब तक दवारोधी टीबी मरीजों को यह दवा उपलब्ध नहीं हो सकी है.

ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क के डॉक्टर गोपाल डाबादे का कहना है कि इस मामले पर दिल्ली हाइकोर्ट के हालिया निर्णय से यह स्पष्ट है कि एमडीआर-टीबी और एक्सडीआर-टीबी के मरीजों को नई टीबी की दवाएं तुरंत हासिल करने का कानूनी हक है. कई प्रकार की दवारोधी टीबी से निपटने के लिए नई दवा डेलामैनिड की उपलब्धता विशेष रूप से जरूरी है. विशेषकर युवा रोगियों के लिए यह दवा उपलब्ध नहीं हो पाना कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता. 

First published: 30 January 2017, 7:57 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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