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जिग्नेश मेवानी की दलित चेतना में ब्राह्मण गुरु की भूमिका

राजीव खन्ना | Updated on: 5 September 2016, 16:32 IST
QUICK PILL
  • पिछले महीने गुजरात के अहमदाबाद से उना तक दलित अस्मिता यात्रा की अगुवाई करने के बाद जिग्नेश मेवानी सुर्खियों में आ गए. गुजरात में दलित युवाओं की कथित गौरक्षकों की पिटाई के विरोध में यह यात्रा निकाली गई थी. मेवानी आज देश में दलित समुदाय के एक अहम चेहरे के तौर पर सामने आ चुके हैं.
  • शिक्षक दिवस के मौके पर मेवानी अपनी जिंदगी को बेहतर दिशा देने के लिए संजय भावे को याद करते हैं. उन्होंने कहा कि भावे ने उन्हें एक बेहतर इंसान बनाने और नेतृत्व संबंधी गुणों का विकास करने में अहम भूमिका निभाई, जिसकी वजह से वह दलितों के आंदोलन की अगुवाई करने में सफल रहे.

पिछले महीने गुजरात के अहमदाबाद से उना तक दलित अस्मिता यात्रा की अगुवाई करने के बाद जिग्नेश मेवानी सुर्खियों में आ गए. 

गुजरात में दलित युवाओं की कथित गौरक्षकों की पिटाई के विरोध में यह यात्रा निकाली गई थी. मेवानी आज देश में दलित समुदाय के एक अहम चेहरे के तौर पर स्थापित हो चुके हैं. मेवानी उन कुछ लोगों में से हैं जिन्होंने सवर्ण जातियों और राजनीतिक वर्ग के शोषण के खिलाफ दलितों को एकजुट किया. 

शिक्षक दिवस के मौके पर मेवानी अपनी जिंदगी को बेहतर दिशा देने के लिए संजय भावे को याद करते हैं. उन्होंने कहा कि भावे ने उन्हें एक बेहतर इंसान बनाने और नेतृत्व संबंधी गुणों का विकास करने में अहम भूमिका निभाई, जिसकी वजह से वह दलितों के आंदोलन की अगुवाई करने में सफल रहे.

धर्मनिरपेक्ष शिक्षक हैं भावे

हालांकि सबसे दिलचस्प बात यह है कि भावे मराठी ब्राह्मण हैं और वह अहमदाबाद के एचके ऑर्ट्स कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते हैं. भावे उन छात्रों में बेहद लोकप्रिय हैं जो एकेडमी और पाठ्यक्रम से अलग पढ़ाई करने में इच्छुक हैं.

भावे ने जिन छात्रों को मदद की, उनमें अधिकांश गरीब, दलित और मुस्लिम समुदाय से थे. मेवानी ने कैच को बताया, 'मैं एक मध्यवर्गीय दलित परिवार से आता हूं. मेरे पिताजी अहमदाबाद नगर निगम से सेवानिवृत्त किरानी हैं. मैं आज जो भी हूं भावे सर की वजह से हूं.'

उन्होंंने बताया, 'मेरी जैसी पृष्ठभूमि थी, वहां किताबों के लिए मेरे पास कोई दूसरा साधन नहीं था. ऐसी स्थिति में भावे सर मेरे लिए उम्मीद की किरण बन कर आए. उन्होंने मुझे कला, संस्कृति, सिनेमा, थिएटर और बेहतर साहित्य से परिचय कराया. उनके अलावा सौम्या जोशी ने अन्य थिएटर के  कलाकारों के साथ हमारी मदद की. 2003 तक, तीन साल मैं उनके नेतृत्व में जिया और यह मेरी जिंदगी की बुनियाद रहा.'

भावे बेहद धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक मुद्दों पर काफी संवेदनशील इंसान हैं. मेवानी बताते हैं, 'वह छात्रों के बीच बेहतर साहित्य वितरित करते हैं और उन्हें कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए उकसाते हैं. वह छात्रों को लेकर पुस्तकालय और बुक फेयर में जाते हैं. वह छात्रोें के साथ गुजरात के बुक फेयर और दिल्ली के बुक फेयर जाते हैं. मैं खुद उनके साथ कई बार अहमदाबाद के पुस्तक मेले में गया हूं.'

मेवानी बताते हैं कि भावे ने उन्हें जर्नल और अन्य पत्रिकाओं में लिखने के लिए प्रेरित किया. इससे उन्की जाति और वर्ग को लेकर समझ में वृद्धि हुई. मेवानी बताते हैं, 'इन सभी अनुभवों से मुझे समाज को बड़े मायनों में समझने में मदद मिली. इससे मुझे अपने रास्ता तय करने में मदद मिली.'

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First published: 5 September 2016, 16:32 IST
 
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