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जेंडर स्टडीज की दिशा में तेलंगाना ने स्थापित किया कीर्तिमान

ऐश्वर्या ऐरा | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • तेलंगाना देश का पहला वैसा राज्य बन गया है जहां अंडर ग्रैजुएट लेवल पर जेंडर सेंसिटाइजेशन को अनिवार्य विषय के तौर पर शामिल किया गया है.
  • 8 महीनों से भी कम समय में न केवल इस कोर्स को तैयार किया गया बल्कि भाषाई बाध्यता को देखते हुए इसे अंग्रेजी के साथ-साथ तेलुगू में भी अनूदित कर दिया गया.

दो महिलाएं एक मुद्दे को लेकर समान तरीके से सोचती हैं. उनकी समझ से न केवल नई किताब तैयार होती है बल्कि एक राज्य को अंडर ग्रैजुएट कोर्स में एक नया विषय तक शामिल करना पड़ता है. तेलंगाना देश का पहला राज्य बन गया है जहां अंडर ग्रैजुएट लेवल पर जेंडर सेंसिटाइजेशन को अनिवार्य विषय के तौर पर शामिल किया गया है.

मई 2015 में तेलंगाना कॉलेजिएट कमिश्नरेट की अध्यक्ष और आईएएस अधिकारी शैलजा रामियार और उनकी ओएसडी डॉ. पदमावती ने जेंडर स्टडीज को विषय के तौर पर पाठ्यक्रम में शामिल करने के विचार पर काम किया और तत्काल इस पर आगे बढ़ते हुए इस मुद्दे को महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कलम चलाने वाली मशहूर लेखिका सूरी थारू को सौंप दिया.

दिसंबर 2015 में रमा मेलकोटे, दुग्गीराला वसंत, आसमा रशीद, दीपा श्रीनिवास, उमा भुरुगुबंदा, गोगू श्यामला, वसुधा नागराज और अन्वेषी रिसर्च सेंटर फॉर वूमन स्टडीज की ए सुनीता ने वर्ल्ड ऑफ इक्वल्स को न केवल अंग्रेजी में लिख डाला बल्कि इसे तेलुगू में भी अनुदित कर दिया.

तेलुगू अकादमी की तरफ से प्रकाशित किए जाने के बाद तेलुगू हायर सेकेंडरी एजुकेशन काउंसिल ने राज्य के अंडरग्रेजुएट कोर्स के लिए जेंडर सेंसेटाइजेशन को अनिवार्य विषय बनाने का फैसला किया है. इसके अलावा हैदराबाद की अग्रणी यूनिवर्सिटी जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने भी इसे अपने सभी संबद्ध कॉलेजों में पायलट पेपर के तौर पर शामिल कर दिया है.

क्या कहती हैं पुस्तक?

अ वर्ल्ड ऑफ इक्वल्स में छात्रों को जेंडर से जुड़े कई मुद्दों से रूबरू कराया गया है. अकादमिक अध्ययनों, अदालती मामलों, कानूनों, सैद्धांतिक विश्लेषण, समाचार की रिपोर्ट्स, कहानियां, कविताओं और जीवनियों के माध्यम से छात्रों को इस विषय के बारे में अथाह जानकारी मिलेगी जिसकी मदद से वह इस विषय के बारे में अपने नजरिये का विस्तार कर सकेंगे.

भारतीय समाज तीन ढांचों पर खड़ा है. जाति, समुदाय और जनजाति. वर्ल्ड ऑफ इक्वल्स इन तीनों ढांचों की मदद से जेंडर को पारिभाषित करने की कोशिश करता है.

जेएनटीयू कनेक्शन?

सरकार ने अंडरग्रेजुएट  लेवल के लिए जेंडर सेेंसेटाइजेशन को अनिवार्य विषय बनाने का फैसला ले लिया है वहीं जेएनटीयू ने इस किताब को अपने सभी संबद्ध 270 इंजीनियरिंग कॉलेजों और 90 फॉर्मेसी कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया है. हालांकि कॉलेजों के लिए यह अनिवार्य नहीं है.

किताब की सह लेखिका डॉ. ए सुनीता बताती हैं कि जेएनटीयू को इस बात का एहसास हो रहा था कि उनके छात्रों को प्लेसमेंट के दौरान सॉफ्ट स्किल की समस्या से जूझना पड़ रहा है. ऐसे में इस किताब से उन्हें इस  कमी को सुधारने में मदद मिलेगी. वास्तव में यह किताब दोनों भाषाओं में है और इससे निश्चित तौर पर मदद मिलेगी क्योंकि इंजीनियरिंग के  अधिकांश छात्र तेलुगू भाषा बोलने वाले हैं.

क्या वास्तव में होगा बदलाव?

यह अच्छी बात है कि जेंडर से जुड़ा विषय अंडरग्रेजुएट के छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है. हालांकि बड़ा सवाल यह है कि इससे किस तरह छात्रों को जोड़ा जाएगा.

डॉ. सुनीता बताती हैं कि लेखकों ने इस बात की पूरी कोशिश की है कि यह पाठ्यक्रम छात्रों के लिए महज अंक लाने की कोशिश न बन जाए. किताब को इस तरह से तैयार किया गया है जिसमें व्यावहारिक अध्ययन पर ज्यादा ध्यान दिया गया है. किताब को बनाने का मकसद लोगों को इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करना है ताकि उन्हें जेंडर से जुड़ी समस्याओं के बारे में सोचने और समझने का मौका मिले.

क्या विशेष फैकल्टी की होगी जरूरत?

ऐसा लगता है कि इस विषय को पढ़ाने के लिए अलग से शिक्षकों की जरूरत नहीं होगी. डॉ. सुनीता बताती हैं, 'मानविकी की पढ़ाई करने वाला कोई भी व्यक्ति इसे इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ा सकता है.' वास्तव में जेएनटीयू ने इसके लिए अपनी फैकल्टी में कैंप लगाया था जिसमें करीब 200 सदस्यों को प्रशिक्षण दिया गया था. छोटे सेमिनार का आयोजन 30 लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए लगाया गया था. उन्होंने कहा कि कैंप को आगे भी जारी रखा जाएगा.

सही दिशा में की गई कोशिश

ईएफएलयू में जनसंचार विभाग की फैकल्टी पदमजा शॉ इस फैसले को स्वागतयोग्य कदम बताती हैं. उन्होंने कहा, 'सच्चाई यह है कि सूसी थारू और डॉ. सुनीता की कोशिशों से तैयार की गई इस पुस्तक को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.'

पूर्व पत्रकार और लोयोला एकेडमी की फैकल्टी मेंबर अखिलेश्वरी रामागौड़ का मानना है कि यह सही वक्त पर की गई सही कोशिश है. उन्होंने कहा, 'काफी लंबे समय से यूजी और पीजी के छात्र जेंडर आइडेंटिटी को लेकर संकीर्ण नजरिया रखते रहे हैं. इस कोर्स को शुरू करने का इससे सही समय नहीं हो सकता.' 

साथ ही वह यह बात रखने से नहीं चूकती कि तेलंगाना इस दिशा में पहल करने वाला पहला राज्य बना है जबकि 'बंगाल और केरल में लंबे समय से वामपंथी सरकारें होने के बावजूद ऐसी कोई कोशिश नहीं हुई.'

 

First published: 16 January 2016, 1:55 IST
 
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