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तेलंगाना: ख़स्ताहाल विश्वविद्यालयों को छोड़कर निजी यूनिवर्सिटी के लिए कसरत

प्रणेता झा | Updated on: 31 December 2016, 8:22 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

तेलंगाना सरकार एक ऐसे राज्य में निजी क्षेत्र को विश्विद्यालय स्थापित करने की अनुमति दे रही है जिसकी 90 प्रतिशत आबादी आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय से संबंध रखती है. हैदराबाद में रिलायंस भी एक विश्वविद्यालय खोलने का इच्छुक है. रिलायंस की नजर 100 बिलियन डॉलर के शिक्षा बाजार पर है जिसमें उच्च शिक्षा के बाजार की हिस्सेदारी 59.7 प्रतिशत है.

मगर मुकेश अंबानी और दूसरी अन्य कंपनियां ऐसा तभी कर सकती हैं जब तेलंगाना सरकार यूजीसी के नियमों के अनुसार एक कानून पारित कर निजी विश्वविद्यालयों के नियमन और संचालन की अनुमति नहीं देती है. पिछले कुछ महीनों से के चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति का निजाम प्रदेश में एक ऐसे ही बिल पर काम कर रहा है. 10 दिसंबर को कैबिनेट ने एक ऐसे ही बिल का मसौदा पारित किया था. बाद में यह बिल नियम तैयार करने के लिए एक कैबिनेट की उप समिति को सौंप दिया गया.

तेलंगाना में राज्य के विश्वविद्यालयों की हालत निराशाजक होने और पिछले दो सप्ताह में छात्रों के भारी विरोध के बावजूद, चंद्रशेखर राव सरकार चालू शीत सत्र में इस बिल को विधानसभा में लाने जा रही है. हालांकि विधानसभा का चालू सत्र 30 दिसंबर को समाप्त हो रहा था लेकिन अब इसको बढ़ा दिया गया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्य के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री कादियाम श्रीहरि बिल को इस रूप में विधानसभा में पेश किए जाने के पक्ष में नहीं हैं.

ऐसी भी खबरें हैं कि टीआरएस में भी इस मुद्दे पर दो खेमे बन चुके हैं. एक वो जो कि निजी विश्वविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्तता देने के पक्ष में हैं और दूसरे वे, जिसमें खुद मुख्यमंत्री राव भी शामिल हैं. यह खेमा चाहता है कि निजी विश्वविद्यालयों पर सख्त नियमन के साथ उनमें आरक्षण भी लागू हो. हालांकि सरकार ने अभी बिल के मसौदे के ब्योरे को सार्वजनिक नहीं किया है. 

विरोध

इस बिल पर चर्चा के दौरान कई छात्र संगठन जैसे तेलंगाना विद्यार्थी वेदिका, प्रोग्रेसिव डेमाक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन जैसे संगठन इस आधार पर विरोध करते आ रहे हैं कि इस बिल के आ जाने से उच्च शिक्षा राज्य की आम जनता की पहुंच से दूर हो जाएगी. उस्मानिया विवि, हैदराबाद और काकतिया विवि, वारंगल इस विरोध के बड़े केंद्र रहे हैं.

इस विरोध की आवाज विधानसभा तक पहुंचाने के लिए प्रदेश के कई जिलों से छात्र 23 दिसंबर को हैदराबाद में चलो विधानसभा के आह्वान पर जमा हुए थे और उन्होंने छोटे—छोटे गुटों में विधानसभा के सामने तथा राज्य के अनेक हिस्सों में प्रदर्शन किया था. इस विरोध प्रदर्शन के चलते लगभग 200 छात्रों को गिरफ्तार किया गया था जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया.

लेकिन इस बिल के विरोध में सबसे मजबूत आवाज तेलंगाना आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार प्रोफेसर एम कोदानदरम की तरफ से आया, जो कि तेलंगाना ज्वाइंट एक्शन कमेटी के अध्यक्ष भी हैं. इस कमेटी में कई राजनीतिक और गैर—राजनीतिक दलों के लोग हैं जो कि अलग राज्य की मांग के लिए एक दशक तक चले आंदोलन के अंतिम चरण में 2009 में एक साथ आ गए थे.

दिसंबर 19 को प्रो. कोदानदरम ने राज्य के सभी प्रमुख विपक्षी दलों के साथ एक मीटिंग की थी और इस मीटिंग में यह तय किया गया था कि अगर यह बिल विधानसभा में लाया गया तो वे एकमत से विधानसभा में इसका विरोध करेंगे. प्रो. कोदानदरम और चंद्रशेखर राव तेलंगाना आंदोलन के जमाने में साथ थे. उसमानिया विवि के पूर्व प्रोफेसर कोदानदरम टीआरएस के पथप्रदर्शक की भूमिका निभा चुके हैं. हालांकि अब उनके मार्ग अलग हो चुके हैं.

मालूम हो कि जब तेलंगाना जून 2014 में भारत का नवीनतम राज्य नहीं बना था तब भी चंद्रशेखर राव केजी से पीजी तक सभी के लिए मुफ्त शिक्षा देने की बात करते रहे हैं. इस वादे को टीआरएस के चुनावी के घोषणापत्र में भी दोहराया गया है.

चुनाव में किए गए इस वादे को पूर्ण करने की दिशा में सरकार ने अभी तक कोई खास प्रगति नहीं की है, सिवाय एक उस मौखिक घोषणा के जिसमें कहा गया था कि कुछ वंचित वर्ग के लोगों के लिए सरकार जल्द से जल्द 250 विशेष स्कूल खोलेगी.

टूटे हुए वायदे

तेलंगाना में आंध्रप्रदेश की उस नि:शुल्क क्षतिपूर्ति स्कीम को जारी रखा गया है जो कि 2012 में आंध्रप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने प्रदेश में पिछड़े समुदाय के छात्रों के लिए शुरू की थी. ऐसे समुदाय से वे बच्चे जो कि एमसेट परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इंजीनियरिंग, मेडिकल या एग्रीकल्चर की पढ़ाई करते हैं उनकी फीस सरकार वापस कर देती है. इसमें वे छात्र जो शीर्ष के 10 हजार बच्चों में अपना स्थान बना लेते हैं सरकार उनकी पूरी फीस वापस कर देती है जबकि शेष सभी छात्रों को एकमुश्त 35 हजार रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में देती है.

लेकिन वर्ष 2015—16 और 2016—17 के लिए इस मद में दी जाने वाली राशि अभी नहीं दी गई है. इससे भी चिंताजनक बात यह है कि सूत्रों के अनुसार सरकार अब इस क्षतिपूर्ति की राशि को सभी को लिए 40 हजार करने जा रही है, उसने कोई भी रैंक क्यों न हासिल की हो.

जहां तक राज्य पोषित विश्वविद्यालयों की बात है तो वे सभी धनाभाव, सुविधाओं और फैकल्टी की कमी का सामना कर रहे हैं. राज्य में स्थित तीन केंद्रीय विवि हैदराबाद विवि, इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी तथा मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, इनमें भी धनाभाव तो है पर स्थिति उतनी खराब नहीं है. उस्मानिया विवि में कुल 1200 शिक्षकों के पद हैं लेकिन सिर्फ 550 ही स्थाई शिक्षक हैं. इस तरह से आधे पद खाली पड़े हैं.

कैच टीम से बात करते हुए प्रोफेसर कोदानदरम ने बताया कि यह बिल बिल्कुल गलत समय पेश किया जा रहा है. तेलंगाना में शिक्षा प्रणाली गहरे संकट में है. ऐसे समय में जबकि पूरे प्रदेश के कॉलेज और विवि में आधे से अधिक शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं और सभी विवि वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं, अच्छी शिक्षा तक पहुंच बहुत कम लोगों की रह गई है.

शिक्षा प्रणाली पर संकट

कोदानकरम के अनुसार अगर इस समय निजी विवि को संचालन की अनुमति दे दी जाती है तो पूरी शिक्षा प्रणाली ढह जाएगी. एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के छात्र, जो कि राज्य की बहुसंख्यक आबादी है वह निजी विश्विविद्यालयों द्वारा वसूली जाने वाली भारी फीस नहीं चुका पाएगी.

उस्मानिया विवि में पीएचडी के छात्र तथा तेलंगाना विद्यार्थी वेदिका के सदस्य नजीर भी इससे सहमत हैं. नजीर ने बताया कि लगभग 90 प्रतिशत छात्र राज्य में वंचित समुदाय से आते हैं और उनमें से अधिकांश पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं. ऐसे में निजी विवि के आने से शिक्षा उनकी पहुंच से और दूर हो जाएगी.

विश्वविद्यालयों के हालात पहले ही बदतर हैं. उनमें फैकल्टी की कमी के कारण कई विभाग तो पहले ही बंद हो चुके हैं

उस्मानिया विवि में पीजी के छात्र तथा एआईएसएफ के सदस्य रहमान के अनुसार रोजगार और शिक्षा के अवसरों की कमी ही वह सबसे बड़ा कारण था कि हमने अलग राज्य की मांग के लिए संघर्ष किया था. तब चंद्रशेखर राव ने केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा का वादा किया था, पर अब वह कॉरपोरेट के दबाव के आगे झुक रहे हैं. हकीकत यह है कि निजी क्षेत्र सिर्फ फायदे के लिए काम करता है. स्वास्थ्य क्षेत्र में निजीकरण के नतीजे सामने हैं. ऐसे में शिक्षा तक किसकी पहुंच रह जाएगी.

रहमान बताते हैं कि राज्य के विश्वविद्यालयों के हालात पहले ही बदतर हैं. उनमें फैकल्टी की कमी के कारण कई विभाग तो पहले ही बंद हो चुके हैं. इसलिए सरकार को पहले राज्य के विश्वविद्यालयों को मजबूत करना चाहिए. इनमें नए कोर्स आरंभ किए जाएं और अच्छी फैकल्टी की नियुक्ति हो तथा बुनियादी ढांचा मजबूत किया जाए. न कि फायदे के लिए शिक्षा को खोल दिया जाए.

जबकि पूरे देश में 22 राज्य निजी विश्वविद्यालयों और डीम्ड विश्वविद्यालयों को अनुमति देने वाले बिल पास कर चुके हैं, तेलंगाना ही देश के उन कुछ राज्यों में है जहां अभी इस तरह का बिल पास नहीं हुआ है. हालांकि निजी इंजीनियरिंग कॉलेज और दूसरे प्रोफेशनेल संस्थान राज्य में खूब फल—फूल रहे हैं. कुल 266 इंजीनियरिंग कॉलेजों में से मात्र 17 कॉलेज ही सरकारी हैं. पिछले साल आंध्रप्रदेश में भी एपी प्राइवेट यूनिवर्सिटीज (एस्टेब्लिशमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट 2015 पारित किया गया था.

लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि तेलंगाना में सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की आबादी आंध्रप्रदेश से कहीं बहुत अधिक है और वह आबादी भी आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर है.

यहां तक कि साक्षरता के पैमाने पर भी तेलंगाना का स्थान पूरे देश में 32वां है. राज्य में साक्षरता की दर मात्र 66.46 प्रतिशत है जबकि आंध्रप्रदेश में साक्षरता की दर 91.1 प्रतिशत है और देश में उसका स्थान चौथा है.

First published: 31 December 2016, 8:22 IST
 
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