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चिंतागुफा का चिंताजनक जीवन

सुहास मुंशी | Updated on: 13 April 2016, 22:49 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ की यात्रा से लौटे कैच संवाददाता सुहास मुंशी की यह जमीनी रिपोर्ट महान भारत देश की कुछ सौतेली संतानों की कहानी सामने लाती है.
  • छत्तीसगढ़ का चिंतागुफा गांव पतीली के उस एक चावल के समान है जिसे देखकर पूरी भात का अंदाजा मिल जाता है.

सुकमा के अन्य गांवों के विपरीप चिंतागुफा में में पांव रखते ही आगंतुकों का सामना स्वागत करते हुए एक साइनबोर्ड से होता है. इस साइन बोर्ड पर लिखे शब्द ‘स्वर्ग में आपका स्वागत है’ शायद इस स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य का सबसे अच्छे तरीके से बखान करते हैं. लेकिन यहां का प्राकृतिक सौंदर्य ही वो चीज नहीं हैं जो इस गांव को औरों से अलग करते हैं.

घने जंगलों के बीच में स्थित चिंतागुफा, नजदीकी शहर द्रोणपाल से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित है. यह देश के सर्वाधिक हिंसाग्रस्त स्थानों में से एक है. इस गांव में करीब एक दशक पहले स्थापित की गई सीआरपीएफ की यूनिट के 300 से अधिक जवान अबतक अपनी जान गंवा चुके हैं.

यह शिविर आए दिन नक्सलियों के हमले का गवाह बनता है जो ऊंचाई पर स्थित इस गांव में शरण लेने के इरादे से आते हैं.

और इस कैंप के सैनिक अगली सुबह को नक्सलियों को उनकी ही भाषा में जवाब देने के इरादे से बाहर आते हैं लेकिन तब उनके सामने सिर्फ आसपास के गांवों के रहने वाले ग्रामीण होते हैं.

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इस प्रकार दो पाटों के बीच पिसते आ रहे ग्रामीण दोनों से ही अपनी लड़ाई कहीं और ले जाने की प्रार्थना करते रहते हैं लेकिन कोई भी उनकी बात पर गौर करने को तैयार नहीं है.

सुरक्षा बल चाहते हैं कि ग्रामीण गांव को खाली करके उनके हवाले कर दें ताकि वे नक्सलियों के खिलाफ आक्रामक रवैया अपना सकें, इसके लिए ग्रामीण तैयार नहीं हैं. दूसरी तरफ नक्सली उन्हें गांव छोड़कर जाने नहीं दे रहे हैं क्योंकि ऐसा होने पर उन्हें आसान पनाह और बचाव से हाथ धोना पड़ेगा.

BSF jawan_Maoists (Photo: Patrika)

राज्य सरकार द्वारा हाल के दिनों में अपनी रणनीति बदलते हुए नक्सलियों के खिलाफ अधिक बल का प्रयोग करने का फैसला लेने के बाद ग्रामीण अब और अधिक संशय और खौफ के साये में जी रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि प्रतिमाह औसतन एक ग्रामीण की मौत या तो पुलिस के हाथों या फिर नक्सलियों के हाथों हो रही है. इसके अलावा शारीरिक उत्पीड़न तो उनके लिये रोजमर्रा की बात है.

एक स्थानीय आदिवासी कहते हैं, ‘‘आप उदाहरण के लिये एक युवा, कुंजम लिंगा की मौत के मामले को ले सकते हैं.’’

पुलिस का दावा है कि उसने लिंगा को एक मुठभेड़ के दौरान मार गिराया. दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का दावा है कि असल माओवादियों को पकड़ने में नाकाम सुरक्षा बलों ने उसके परिजनों के सामने ही बिल्कुल नजदीक से गोली मार दी.

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इलाके के एएसपी संतोष सिंह के अनुसार, ‘‘कोबरा (कमांडो बटालियन फाॅर रिसाॅल्यूट एक्शन) की 206वीं बटालियन, सीआरपीएफ की 150 बटालियन और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप (डीआरजी) की संयुक्त टीम को क्षेत्र में 8 से 10 नक्सलियों की मौजूदगी से संबंधित एक खुफिया सूूचना मिली. सूचना के बाद हुई संयुक्त कार्रवाई के दौरान हुई झड़प में लिंगा की मौत हुई.’’

इस गांव में रहना आपकी इच्छाशक्ति की बेहद कठिन परीक्षा है क्योंकि दोनों ही हथियारबंद समूह विशेष सहयोग की अपेक्षा और मांग करते हैं

कोया मरकाम कहते हैं, ‘‘लिंगा अपने घर में खाना पका रहा था जब सीआरपीएफ के कुछ जवानों ने उसे घर से बाहर बुलाया. इसके बाद वे उसे उसके घर से कुछ दूर ले गए और उसके परिवार और समूचे गांव के सामने गोली मारकर उसकी जान ले ली.’’

मुरकाम कहते हैं कि इसके अगले ही दिन गांव के एक और युवक को उठाकर सीआरपीएफ कैंप ले जाया गया. ‘‘सुरक्षा बलों ने उसे उल्टा लटकाकर बुरी तरह मारा-पीटा और उसके मुंह में बंदूक की नली घुसा दी. पुलिस का दावा है कि यह युवक लिंगा का अंगरक्षक था.’’

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इस गांव में रहना आपकी इच्छाशक्ति की बेहद कठिन परीक्षा है क्योंकि दोनों ही हथियारबंद समूह विशेष सहयोग की अपेक्षा और मांग करते हैं. लाचा मुकराम याद करते हुए बताते हैं कि कैसे उनके एक परिचित को नक्सलियों ने एक मोटरसाइकिल चुराने के लिये कहा था.

‘‘वे उस लड़के के पास गए और उसे एक मोटरसाइकिल चुराकर उनके पास लाने को कहा. अगर वह इनकार करता तो वे उसकी जान ले लेते. मजबूरन उसने मोटरसाइकिल चुराई. अगली ही सुबह पुलिस उस लड़के को तलाशती हुई आई और उसे कैंप में ले जाकर नक्सलियों के साथ मिला होने का आरोप लगाकर पूरे दिन बुरी तरह पीटा. आप ही बताइये, हमारे सामने क्या रास्ता बचा है?’’

chinta gufa embed

इस क्षेत्र में अगर कोई व्यक्ति हिंसा का सबसे बड़ा साक्षी है तो वह है इस गांव की सरपंच पुडियामी मुइये. चूंकि उनके पति नक्सली समूह में शामिल हो गए और बाद में स्थानीय कमांडर बन गए, सीआरपीएफ के जवान जब भी गांव का दौरा करने आते हैं तो वे उनके निशाने पर होती हैं.

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मार्च के प्रारंभ में क्षेत्र में हाल ही में लगवाई गई सौर लाइटों और सेल को तोड़ने आए नक्सलियों ने भी उनके साथ मारपीट की.

प्रगति के किसी भी संकेत को नक्सली संदेह की दृष्टि से देखते हैं. उन्होंने चिंतागुफा के रास्ते में पड़ने वाले कई स्कूलों को बमों से उड़ा दिया है क्योंकि उन्हें इस बात का संदेह है कि सीआरपीएफ इनमें शरण ले सकती है.

नक्सलियों द्वारा सौर सेल को तोड़े जाने के बाद वे सीआरपीएफ कमांडो के कोप का शिकार बनीं. उनका कहना था कि उन्होंने नक्सलियों को सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की अनुमति दी.

सीआरपीएफ के जवान सूरज उगने के बाद हमारे पास आते हैं और हमारे गले काटने और घरों को उड़ाने की धमकी देते हुए हमारा उत्पीड़न करते हैं

सीआरपीएफ का एक जवान उनसे पूछता है, ‘‘नक्सलियों को इस तोड़फोड़ को करने में कम से कम एक घंटा तो जरूर लगा होगा. क्या वह इस दौरान हमें इसकी सूचना नहीं दे सकती थी.’’

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सैनिक ग्रामीणों पर नक्सलियों के साथ साजिश में शामिल होने का आरोप लगाते हैं और कहते हैं कि उनके पास और कोई विकल्प भी मौजूद नहीं हैं.

‘‘हम यहां पर सिर्फ मरने या मारने नहीं आए हैं. अपने आसपास के माहौल और परिवेश को देखो. चारों तरफ खूबसूरत और रही-भरी पहाडि़यां हैं और हम इनके ठीक बीच में हैं. यह ऐसा स्तान नहीं है जहां आप बंदूक ले जाना चाहेंगे. आपको पता है कई बार जब दोपहर के समय में हम अकेले होते हैं तो हम अपने आप से वादा करते हैं कि जब हम सेवानिवृत हो जाएंगे तो हम यहां पर दोबारा वापस आऐंगे और इस झील में अपने परिजनों के साथ नौकायन का आनंद लेंगे.’’

लेकिन एक ग्रामीण का कहना है कि इस स्थान के माहौल को अपूर्णीय क्षति पहुंच चुकी है.

शंकर जोगा कहते हैं, ‘‘सीआरपीएफ के जवान सूरज उगने के बाद हमारे पास आते हैं और हमारे गले काटने और घरों को उड़ाने की धमकी देते हुए हमारा उत्पीड़न करते हैं. और नक्सली भी सही काम सूरज डूबने के बाद करते हैं. दोनों ने ही मुखबिरों की अपनी पूरी सेना तैयार कर रखी है. हमें कोई भी कदम उठाने से पहले कइ बार सोचना पड़ता है.’’

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लेकिन चिंतागुफा के निवासियों की एक और लत है जिससे वे पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं और अपनी जान की कीमत पर भी उसे जारी रखे हुए हैं. एक तरीके से यह आदत उन्हें उस समय की याद दिलाती है जब उनका जीवन अधिक आसान होता था.

किच्चे मुक्का कहते हैं, ‘‘हमें आंध्र प्रदेश का लाजवाब तंबाकू मिलता है और लगभग पूरा गांव उसके स्वाद का दीवाना है. हम लगातार तीन दिन पैदल चलकर, कई पहाडि़यां पार कर तंबाकू के खेतों में काम करने जाते थे और सालभर इस्तेमाल होने लायक तंबाकू लेकर लौटते थे. हमारा उस समय का जीवन किसी भी प्रकार के खतरे सेे बिल्कुल दूर था.’’

लेकिन अब जब उनके जीवन को बेहद गंभीर खतरा है तो क्या ग्रामीणों में तंबाकू के मौसम में बाहर जाना बंद कर दिया है? ‘‘बिल्कुल भी नही,’ मुक्का हंसते हुए कहते हैं, ‘‘हम अब भी चुपचाप निकलकर चले जाते हैं.’’

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First published: 13 April 2016, 22:49 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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