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आतंकी हिंसा का साल रहा 2015

अलीशा मथारू | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • साल 1978 से 2013 तक ऐसी आतंकी घटनाएं औसतन एक साल में चार बार होती थीं लेकिन साल 2014 में ऐसी 26 घटनाएं हुईं और 2015 का आंकड़ा इससे काफी अधिक है.
  • इन हत्याओं के लिए इस्लामिक स्टेट और बोको हरम जैसे संगठन जिम्मेदार थे. वहीं अमेरिका में सामूहिक गोलीबार में मारे जाने वालों की संख्या भी बहुत ज्यादा रही.

बुरी यादों को भुलाकर आगे बढ़ जाना मानवीय जिजीविषा का अभिन्न अंग है. लेकिन सवाल ये है कि कितना जल्दी भूल जाएं?

2015 अब इतिहास बन चुका है. बीता साल काफी हिंसक रहा. साल भर हिंसा-प्रतिहिंसा की घटनाएं इतनी बड़ी तादाद में हुई कि उनसे हुए नुकसान की गणना संभव नहीं. बीते साल आतंकवाद का खतरा और बड़े रूप में सामने आया. 

इसकी शुरुआत हुई साल 2014 के दिसंबर महीने से. पाकिस्तान के पेशावर में 132 स्कूली बच्चों समेत 141 लोगों को आतंकवादियों ने मार दिया.

2015  के पहले ही हफ़्ते में फ्रांस की राजधानी पेरिस में दो आतंकवादियों ने शार्ली हेब्दो पत्रिका के दफ्तर पर गोलीबारी करके एक दर्जन लोगों की जान ले ली. इस पत्रिका में इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद का व्यंग्य कार्टून छपा था.

मार्च में यमन की राजधानी सना में दो मस्जिदों में हुए आत्मघाती हमलों में 140 लोग मारे गये

मार्च में ही ट्यूनीशिया के ट्यूनिश शहर में तीन आतंकवादियों ने स्थानीय म्यूजियम में घूमने गये पर्यटकों पर हमला बोल दिया. आतंकियों की अंधाधुंध गोलीबारी में 21 लोग मारे गये. विडंबना ये रही कि जब यह हमला हुआ तब ट्यूनीशिया की संसद में आतंकवाद निरोधक नीति पर बहस चल रही थी.

सीरिया को छोड़ दिया जाए तो पूरी दुनिया में बीते साल कुल 105 आतंकी हमले हुए. इन हमलों में 2800 से ज्यादा लोग मारे गये.

अप्रैल में केन्या में हुए आतंकी हमले में 148 छात्र मारे गये. जून में ट्यूनीशिया के तटवर्ती शहर में आतंकियों ने बेतहाशा गोलीबारी करके 38 पर्यटकों को मार दिया. मारे गये लोगों में 30 ब्रितानी नागरिक थे.

इसके बाद नवंबर में पेरिस में हुए हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया. कई हमलावरों ने एक के बाद एक कई जगहों पर हमले करके 130 लोगों की हत्या कर दी. आतंकियों ने एक ऑ़ीटोरियम में भी हमला किया जहां म्यूजिक कंसर्ट चल रहा था. यहां 89 लोग मारे गये.

इस्लामिक स्टेट बर्बरता में रहा सबसे आगे

बीते साल हुए ज्यादातर आतंकी हमलों का संबंध इस्लामिक स्टेट नामक आतंकवादी संगठन से था. पिछले साल की शुरुआत में इस्लामिक स्टेट ने जापानी पर्यटकों की गला काटकर हत्या की थी. उसके बाद उन्होंने जॉर्डन के एक पायलट को जला कर मार डाला. 

इस दुर्दांत आतंकी संगठन ने हैवानियत की सभी सीमाएं लांघते हुए इराक़ के रमादी और पल्माइरा शहरों को नेस्तानाबूद कर दिया. इसके बाद इस्लामिक स्टेट ने रूस के एक हवाईजहाज को मार गिराने की जिम्मेदारी ली. फिर रूस ने उस पर हवाई हमला शुरू किया.

इससे कुछ ही हफ्ते पहले अंकारा में एक शांति रैली में हुए दो आत्मघाती आतंकी हमलों में 102 लोग मारे गये.

अमेरिका को अपने गिरेबान में भी झांकना चाहिए

बीते साल अमेरिका में कई जगह सामूहिक गोलीबारी हुई. दिसंबर में ही तशफ़ीन मलिक और सईद फारूक़ नामक दंपति ने गोलीबारी करके 14 लोगों की जान ले ली. 

साल  2015 में अमेरिका में 12700 लोग अंधाधुंध सामूहिक गोलीबारी में मारे गये.

ये संख्या पूरी दुनिया मे जिहादी आतंकवाद के कारण मरने वालों की संख्या से करीब चार गुना ज्यादा है.

आंकड़ों की नज़र में

एक ताजा अध्ययन के अनुसार 1978 से 2013 तक हर साल किसी एक देश में ऐसी आतंकी घटनाएं औसतन चार बार हुई हैं जिनमें एक ही दिन में 100 से ज्यादा लोग मारे गये.

साल 2014 में ऐसी 26 घटनाएं हुई जिनमें एक ही देश में एक ही दिन में आतंकी हमले में 100 से ज्यादा लोग मारे गये.

लेकिन साल 2015 में ये आंकड़ा 26 से भी बहुत ज्यादा रहने की आशंका है. ये संख्या इस बात पर निर्भर करती कि इस्लामिक स्टेट और नाइजीरिया के आतंकी संगठन बोको हराम जैसे संगठनों ने अपने प्रभाव वाले देशों में कितने लोगों को मारा.

विकीपीडिया पर दी गयी जानकारी के अनुसार साल 2015 में हुए 105 से ज्यादा आतंकी हमलों में करीब 2800 लोग मारे गये. ये आंकड़ा आतंक की पूरी तस्वीर नहीं पेश करता क्योंकि इसमें सीरिया में मारे गये लोगों को नहीं जोड़ा गया है.

साल 2015 में आतंकवाद उन इलाकों में पहुंच गया जहां पहले उसकी पहुंच नहीं मानी जाती थी

पिछले साल नवंबर में पेरिस में हमले के अलावा बेरुत में आतंकवी हमले में 43 लोग मारे गये. रूस का यात्री विमान हमले का शिकार हुआ जिसमें 224 लोग सवार थे. 

माली के होटल में हमला हुआ. नाइजीरिया में हुए एक हमले में 80 से अधिक लोग मारे गये. सोमालिया में भी आतंकी हमले में दर्जनों लोग मारे गये. इराक़ और सीरिया में ऐसे हमलों के शिकारों की वास्तविक गिनती करना भी कठिन है. इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश भी आतंकी हमले के शिकार हुए.

बीते साल आतंकी हमले का सबसे बड़ा शिकार नाइजीरिया रहा. जिसके लिए बोको हराम नामक आतंकी संगठन जिम्मेदार है. बोको हराम का संबंध इस्लामिक स्टेट से भी है. याद रहे कि नाइजीरिया के छह साल के 'आतंक के साम्राज्य' के दौरान 20 हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे और 12.30 करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ा था. 

आम लोगों के साथ ही इन घटनाओं की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को भी आतंकियों ने नहीं बख्शा. 'कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट' की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल पूरी दुनिया में 69 पत्रकार मारे गये. इनमें से 40 प्रतिशत अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे इस्लामिक आतंकी गुटों के हाथों मारे गये.

बुरी बात ये है कि दुनिया की मौजूदा हालत कोई उम्मीद नहीं जगाता. ऐसी घटनाओं की आशंका शायद बनी रहेगी. सनकियों और वहशियों से दुनिया शायद ही कभी खाली रही है. लेकिन इस्लामिक स्टेट और बोको हराम के ख़िलाफ़ जिस तरह कार्रवाई की जा रही है वो राहत की बात है.

पुरानी कहावत है, आशा सबसे बेहतर की करिए, लेकिन सबसे बुरे के लिए तैयार रहिए.

First published: 31 December 2015, 7:09 IST
 
अलीशा मथारू @almatharu

सब-एडिटर, कैच न्यूज़.

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