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प्रो निवेदिता और राजश्री राणावत पर हमला अकादमिक दुनिया के लिए एक और त्रासदी है

अपूर्वानंद | Updated on: 20 February 2017, 9:36 IST
कैच न्यूज़

जोधपुर के जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय में शनिवार को अंग्रेजी की प्रोफेसर डॉ. राजश्री राणावत को बर्खास्त कर दिया गया. उनका अपराध? उन्होंने इस वर्ष फरवरी के पहले हफ्ते में छात्रों के लिए लीक से हटकर एक बौद्धिक सेमिनार आयोजित किया था. ‘हिस्ट्री रिकंस्ट्रूड थ्रू लिटरेचर: नेशन, आइडेंटिटी, कल्चर’ नाम के सेमिनार में उन्होंने कई मशहूर शिक्षकों के साथ प्रोफेसर निवेदिता मेनन को भी आमंत्रित किया था.

राणावत पर आरोप है कि उन्होंने यह जानते हुए भी कि कश्मीर पर प्रो. मेनन के विचार विवादास्पद हैं, उन्हें आमंत्रित किया. मेनन की वार्ता के दौरान विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत शिक्षक भी मौजूद थे. वार्ता के बाद उनका मेनन के साथ विस्तार से सवाल-जवाब सत्र हुआ था. इस बहस में उनका अन्य श्रोताओं ने साथ नहीं दिया. वे प्रो मेनन के तर्कों से सहमत लग रहे थे.

झूठा सच

उसके अगले दिन ही, स्थानीय मीडिया ने सेमिनार के बारे में आधारहीन, मनगढंत रिपोर्टें छापनी शुरू कर दीं. प्रो. मेनन पर आरोप लगाते हुए कि उन्होंने भारतीय सेना, भारत के कश्मीर से संबंध आदि के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां की हैं. यह भी आरोप था कि उन्होंने भारत के नक्शे को उलटा दिखाकर उसका अपमान किया. निवेदिता ने खुद पर और राणावत पर लगाए जा रहे इन आरोपों का खंडन करते हुए विस्तार से उस पर स्पष्टीकरण दिया.

जाहिर है कि समाचार पत्र उक्त सेवानिवृत शिक्षक के कहे अनुसार रिपोर्ट छाप रहे थे. उस वक्त उनका कोई रिपोर्टर मौजूद नहीं था, फिर भी सेमिनार में हुए विमर्श पर मनगढंत कहानियां छप रही थीं. जैसाकि होना ही था, प्रो.मेनन और डॉ.राणावत के खिलाफ उनकी ‘राष्ट्र-विरोधी’ गतिविधि के लिए कानूनी कार्रवाई की मांग की गई. यूनिवर्सिटी ने इस मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई. समिति ने डॉ. राणावत को अपने समक्ष उपस्थित होने को कहा.

विडंबना है कि यूनिवर्सिटी ने डॉ. राणावत के खिलाफ फौजदारी का मुकदमा पहले दायर किया और उसके बाद जांच शुरू की. तथ्यों की जानकारी के बिना वह उन पर आरोप कैसे लगा सकती है? दरअसल उनके खिलाफ पहले से पुलिस में शिकायत दर्ज थी और जन आंदोलन भी था. इसी के मद्देनजर डॉ. राणावत ने यूनिवर्सिटी से सुरक्षा की मांग की थी.

वे परिसर में अकेली रहती हैं. उनके इस अनुरोध को ठुकरा दिया गया और बेहद रूखे अंदाज़ में कहा गया कि समिति उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं करेगी और उन्हें उसके सामने उपस्थित होना है. उनसे यह भी कहा गया कि यदि वे समिति के सामने नहीं आती हैं, तो वह उनके बयान के बिना अपनी रिपोर्ट पेश कर देगी. डॉ. राणावत को बाद में सूचित किया गया कि समिति ने उनके बयान के बिना ही अंतरिम रिपोर्ट पेश कर दी है.

बढ़ती मुसीबतें

शनिवार को सिंडिकेट की बैठक हुई और उसने डॉ. राणावत को बर्खास्त करने का फैसला लिया. बैठक बड़ी अजीब थी. इसमें केवल उनके खिलाफ रिपोर्ट पर बहस हुई. इसे लेकर कई सवाल हैं, जिनके लिए अधिकारियों, शिक्षक समुदाय और यूनिवर्सिटी के छात्र संघ, और मीडिया एवं समाज को जवाब देना है.

पहला, एक तकनीकी पक्ष- यदि जांच समिति ने केवल अंतरिम रिपोर्ट पेश की है, तो क्या वह डॉ. राणावत के खिलाफ कार्रवाई का आधार हो सकती है? यह सच है कि बर्खास्तगी कोई सजा नहीं है, फिर भी यह उनके नियोक्ता की ओर से एक शिक्षक का अपमान है, ऐसा व्यवहार जो उन्हें और कष्ट पहुंचाता है.

दूसरा, डॉ. राणावत ने यूनिवर्सिटी की पूरी जानकारी में सेमिनार आयोजित किया था. इस इवेंट का खूब प्रचार किया गया था. सेमिनार की प्रचार सामग्री में सब जगह प्रो. मेनन का नाम था. यदि उनके भाग लेने से कोई समस्या थी, तो सेमिनार से पहले क्यों नहीं कहा गया?

आमंत्रित लोगों की सूची से जाहिर है कि इसमें विभिन्न शैक्षिक और वैचारिक पृष्ठभूमि के विद्वान और एक्टिविस्ट थे. प्रो.मेनन मशहूर विद्वान और लेखक हैं. आमंत्रित लोगों में से किसी भी नाम को लेकर यूनिवर्सिटी की आपत्ति नहीं थी और बिना किसी बाधा के सेमिनार हो गया. यह जीवंत, तार्किक और शांतिपूर्ण था. स्टूडेंट्स ने अपने टीचर्स के साथ सत्र का पूरा आनंद लिया. उनकी तरफ से कोई शिकायत नहीं थी.

तो फिर प्रो.मेनन और डॉ. राणावत के खिलाफ कहां से शिकायत उठ रही है. यूनिवर्सिटी उन शिकायतों को क्यों मान रही है, जो हिस्सा लेने वालों की तरफ से नहीं हैं? शिक्षक और स्टूडेंट्स चुप क्यों हैं और डॉ. राणावत का साथ क्यों नहीं दे रहे हैं? क्या वे डर रहे हैं? मीडिया मनगढ़ंत कहानियों की रिपोर्ट क्यों कर रहा है और प्रचार मशीन क्यों बन गई है? राजनीतिक वर्ग क्यों चुप है? अकादमिक जगत अपनी आजादी और एक टीचर के काम करने के अधिकार के लिए क्यों नहीं बोल रहा?

सवाल दर सवाल

1- क्या उदयपुर की मोहन लाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी की राजश्री राणावत और सुधा चौधरी, हरियाणा की सेंट्रल यूनिवर्सिटी की स्नहेस्ता मानव, जिन्हें अपना काम करने के लिए उत्पीड़न और अपमान सहना पड़ा है, उन्हें गुंडागर्दी का सामना करने के लिए अकेले छोड़ दिया जाए?

2- क्या यूनिवर्सिटी परीक्षा लेने वाली मशीनें बन कर रह जानी चाहिए?

3- क्या ज्ञान सृजन और बौद्धिक गतिविधियां केवल कुछ संभ्रांत संस्थाओं के लिए हैं और अन्य सभी, खासकर राज्य के विश्वविद्यालय ज्ञान की दुनिया के सबसे निचले पायदान पर हैं.

4- क्या राजश्री जैसी शिक्षकों के साथ हमारा यही व्यवहार है, जो लीक से हटकर अपने स्टूडेंट्स को श्रेष्ठ बौद्धिक सोहबत देने की कोशिश करती हैं? क्या इसी तरह हम श्रेष्ठता की ओर बढ़ रहे हैं?

यह भारत में युवाओं के लिए एक और दुखद दिन है. ज्ञान के लिए एक और त्रासदीपूर्ण दिन.

First published: 20 February 2017, 9:36 IST
 
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