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लच्छू महाराजः दालमंडी की गलियों में थम गई तबले की थाप

आवेश तिवारी | Updated on: 29 July 2016, 11:00 IST

बनारस की दालमंडी की ठसाठस भरी तंग गलियां, भीड़ भरे बाजार में दुकानदारों और ग्राहकों का भारी शोरगुल, शोर मचाते फेरीवाले, इन सबके बीच एक मकान की दूसरी मंजिल पर बंद कमरे में तबले पर चलता रियाज. लच्छू महाराज का यही पता था, अब भी पता वही रहेगा लेकिन लच्छू महाराज वहां नहीं मिलेंगे.

बनारस शहर में रोज सामने घाट से दालमंडी की आठ किलोमीटर की दूरी पैदल चल कर आने का एक सिलसिला ख़त्म हो गया. प्रख्यात फिल्म अभिनेता गोविंदा के मामा और सितारा देवी के दामाद लच्छू महाराज बनारस ही नहीं तबला बजाने और तबले की दुनिया से ताल्लुक रखने वालों के लिए बड़ा नाम थे.

प्रसिद्ध तबलावादक पंडित लच्छू महाराज का निधन

जिद्दी, अक्खड़, अघोरी और क्रांतिकारी होने के साथ साथ बेहद अराजक स्वभाव वाले लच्छू महाराज देश के अलहदा तबला वादक थे जो चारो पट बजा सकता था. जिस बाजार में कबीर दास ने खड़े होकर अपना घर जलाने की चुनौती दी थी उसी की एक गली में लच्छू महाराज तबला बजाते थे.

तबले से आपातकाल का विरोध

1975 में जब देश में आपातकाल लगा तो लच्छू महाराज जेल पहुंच गए. उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस, देवव्रत मजुमदार, मार्कंडेय जैसे धाकड़ समाजवादी नेताओं को जेल में तबला बजाकर सुनाया. पुराने समाजवादी नरेन्द्र नीरव कहते हैं, 'वो जेल में सिर्फ तबला नहीं बजा रहे थे आपातकाल का अपने तौर तरीकों से विरोध कर रहे थे.'

न संगीत नाटक एकादमी न ही कोई अन्य पुरस्कार लेकिन इसका कोई मलाल भी नहीं. लाल रंग का एक गमछा एक जनेऊ और पूर्वजों की तस्वीर के बीच सुबह 10 बजे से जो रियाज शुरू होता वो शाम को 6 बजे ही ख़त्म होता.

दालमंडी की वो गलियां जो कभी तवायफों के नृत्य के साथ-साथ तहजीब एवं अदब की बानगी थी वो रोज बरोज लच्छू महाराज के क़दमों का इन्तजार करती थी. समय के बेहद पाबन्द लच्छू महाराज से मिलने वाले बताते हैं कि उनसे मिलना किसी बड़े सियासी नेता से मिलने जैसा जतन था.

असहमति को शिल्प से सोचने वाले थे लच्छू महाराज

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और कवि व्योमेश शुक्ल कहते हैं, 'असहमति को शिल्प से सोचने का कलात्मक नजरिया ख़त्म हो गया. लच्छू महाराज ने अपने तबले में कभी किसी प्रभुत्वकारी शिल्प को स्वीकार नहीं किया.' 

वो बताते हैं कि हालांकि लच्छू महाराज की जिद ने उनको कई अवसरों से वंचित किया. उनके अघोरपन और अवधूत स्वरुप के किस्से इतने बड़े हो गए कि उनकी उपलब्धियां पीछे रह गईं.

व्योमेश कहते है, 'तवायफों के परिवार से आने वाले कई कलाकार नामचीन और प्रकांड विद्वान होने के बावजूद कहीं न कहीं एक शर्म का अनुभव करते रहे हैं यह दर्द उनके चेहरे पर भी नजर आता था.'

लच्छू महाराज नहीं संगीत में विपक्ष की मौत

लच्छू महाराज की जिद और तबले के प्रति उनके प्रेम के कई किस्से हैं. बताते हैं कि एक बार आकाशवाणी में उन्हें तबला वादन के लिए बुलाया गया. जिन केंद्र निदेशक महोदय ने उन्हें बुलाया था वो पांच मिनट विलम्ब से आए. इसका नतीजा यह हुआ कि लच्छू महाराज बिना कार्यक्रम में शामिल हुए वापस लौट गए.

एक घटना विश्व विख्यात संकट मोचन संगीत समारोह की है जिसमे लच्छू महाराज को तबला वादन के लिए बुलाया गया था. तबला बजाते बजाते फट गया, नया तबला लाने में देरी हुई तो लच्छू महाराज बीच में ही उठ कर चले गए. लच्छू महाराज का जाना संगीत में विपक्ष का जाना है. सत्तातंत्र से कोई सहयोग पाना उनकी प्राथमिकता में दूर-दूर तक नहीं था. लिहाजा वे बड़े और बड़े होते गए. पं. किशन महाराज से उनकी अदावत की कहानियां बनारस की गलियों में किंवदंति हो चली हैं.

First published: 29 July 2016, 11:00 IST
 
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