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मथुरा की हिंसा और बोस का पुराना प्रेत

सादिक़ नक़वी | Updated on: 4 June 2016, 14:15 IST
(कैच न्यूज)

उत्तर प्रदेश बागबानी विभाग के मथुरा स्थित विशाल जवाहर पार्क की 265 एकड़ ज़मीन में जले हुए पेड़ों की कतारें पुलिस और एक हथियारबंद पंथ के उन सदस्‍यों के बीच हुए खूनी संघर्ष की गवाही दे रही हैं, जो खुद को ''सत्‍याग्रही'' कहते हैं.

इस पार्क तक पहुंचने वाली सड़क पर पुलिस की गाड़ियां और अग्निशमन वाहन खड़े हैं. यहां जिस तरह से पुलिस को निशाना बनाया गया, उससे कुछ स्‍थानीय लोग यह कयास लगाने में जुटे हैं कि कहीं हमलावर नक्‍सली तो नहीं थे.

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इस पंथ के धोतीधारी नेता रामवृक्ष यादव और उनके सहयोगी फि़लहाल फ़रार चल रहे हैं. पुलिस ने उन्‍हें पकड़ने के लिए अभियान छेड़ रखा है. एक अटकल यह भी है कि शायद रामवृक्ष भी जलकर मरने वालों में शामिल हो. एक पुलिस अधिकारी बताते हैं कि यादव के ऊपर बरेली, कुशीनगर और मथुरा में 20 से ज्‍यादा आपराधिक मुकदमे कायम हैं.

यह पार्क जिला प्रशासन के तमाम अहम दफ्तरों जैसे जिला मजिस्‍ट्रेट, पुलिस, जिला अदालत आदि से काफी करीब स्थित है. सेना की छावनी यहां से महज 300 मीटर दूर है. इसके बावजूद यहां जो खूनी खेल हुआ है, उसने दो पुलिसवालों और पंथ के 22 सदस्‍यों की जान ले ली.

मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने कथित रूप से दावा किया है कि पुलिस ने वहां ''पूरी तैयारी'' के बगैर जाकर गलती की थी और किसी को पता नहीं था कि भीतर कितना असला और विस्‍फोटक छुपाया गया है, वरना वहां खतरा उतना ज्‍यादा नहीं था.

उनके दावे सही नहीं जान पड़ते

उस इलाके में पहले तैनात रह चुके एक आला पुलिस अधिकारी ने कैच को बताया कि यह मामला खुफिया विभाग की नाकामी का नहीं है, जैसा कि इसे बताया जा रहा है. पुलिस इस समूह के खतरे से अच्‍छी तरह वाकिफ़ थी. हिंसा में लिप्‍त समूह स्‍वाधीन भारत विधिक सत्‍याग्रह की गतिविधयों पर निगरानी रखने का काम करने वाले दो पुलिस अधिकारियों का कहना है कि स्‍थानीय इंटेलिजेंस ने पुलिस को पर्याप्‍त सूचना दी थी कि यह समूह हथियारबंद है.

एक खुफिया पुलिसवाले ने कैच को बताया, ''रोज़ाना समूचे विवरण के साथ रिपोर्ट दी जा रही थी. हम जानते थे कि उनके पास लाइसेंसधारी हथियार हैं, जिनमें राइफलें, रिवॉल्‍वर और देसी असलहा हैं.'' अफसर के मुताबिक रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि उन लोगों के पास ऑटोमैटिक हथियार भी हो सकते हैं. अफ़सर ने कहा, ''हम कोई मौका नहीं चूकना चाहते थे.''

मौके पर मौजूद डीजीपी जावेद अहमद ने रिपोर्टरों को बताया कि पुलिस इस समूह के हथियाबंद होने से वाकिफ़ थी, लेकिन उसे इसका अहसास नहीं था कि उस पर गोलीबारी कर दी जाएगी. घटना के दौरान मौके पर मौजूद एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, ''पुलिस अफसर वहां गए थे तो उनके दिमाग में यह बात थी ही नहीं कि कोई हिंसा भी हो सकती है. वे यह सुनिश्चित करने में लगे थे कि कोई हिंसा न होने पाए और वे उन लोगों को यह संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रह थे कि प्रदर्शनकारी वहां से निकल जाएं.''

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अधिकारी ने बताया कि घटना में मारे गए एसपी और अन्‍य अधिकारी गुरुवार में पार्क का केवल मुआयना करने गए थे. उन्‍होंने बताया, ''ऑपरेशन को अंजाम देने की योजना तो शुक्रवार सुबह पांच बजे की बनी थी.''

उनके मुताबिक मुआयना इस बात का किया जा रहा था कि क्‍या पार्क की चारदीवारी को गिरा पाने की कोई संभावना है ताकि पुलिस आसानी से वहां प्रवेश कर जाए और भीतर फंसे नहीं. इसी चक्‍कर में अफ़सर जैसे ही पार्क में घुसे, उनके ऊपर ताबड़तोड़ गोलिया बरसाई जाने लगीं जबकि पुलिस की ओर से उकसावे की कोई हरकत ही नहीं हुई थी.अधिकारी ने कैच को बताया, ''उन्‍होंने पुलिस पार्टी को घेर लिया और धावा बोल दिया.'' हमलावरों की संख्‍या 2500 से ज्‍यादा रही होगी और वे राइफल, देसी पिस्‍तौल, देसी बम, तलवारों, चाकुओं और लाठियों से लैस थे.

अचानक घिर गए

एसपी मुकुल द्विवेदी और थाना प्रभारी संतोष कुमार यादव मौके पर ही मारे गए जबकि 24 अन्‍य पुलिसवालों को चोट आई है. द्विवेदी को सिर पर एक पत्‍थर लगा था जिसके चलते उन्‍हें दिल के दौरे पड़े जबकि यादव की मौत एक गोली लगने से हुई. हमलावरों ने छोटे वाले एलपीजी के सिलिंडरों से धमाका किया और पुलिस अफसरों पर देसी बमों से हमला किया. कुछ हमलावर पेड़ों पर भी तैनात थे, जैसा कि घटना के वीडियो में सामने आया है.

पुलिस के मुताबिक सिलिंडर के धमाके में समूह के कम से कम 11 सदस्‍य मारे गए. अधिकारी ने बताया, उन्‍होंने पूरे कैंप को आग लगा दी ओर भाग गए.'' अब तक 300 से ज्‍यादा लोगों को गिफ्तार किया जा चुका है. इस समूह के अधिकतर सदस्‍य पूर्वी यूपी, मध्‍यप्रदेश और बिहार के रहने वाले हैं.

ज़ाहिर है, हालात के बारे में पुलिस का आकलन पुरी तरह गलत साबित हुआ. आगे क्‍या होने वाला है, इसके वहां कई संकेत पहले से मौजूद थे. यह घटना पुलिस के खिलाफ एक सुनियोजित अभियान का पता देती है.

अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की कि खुद को 'सत्‍याग्रही'' बताने वाले ये लोग जंग के लिए तैयार थे और कई मौकों पर इन्‍होंने पुलिस और अन्‍य अधिकारियों को चेतावनी भी दी थी कि चाहे जो हो जाए, वे इस पार्क को खाली नहीं करने वाले हैं.

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पुलिस पार्क को खाली कराने के लिए कई दिनों से यहां मॉक ड्रिल कर रही थी. गुरुवार को यह मॉक ड्रिल अपने साथ बदकिस्‍मती लेकर आया. बीते 1 जून को इस समूह को साफ शब्‍दों में बता दिया गया था कि उसे दो दिन के भीतर पार्क खाली करना है वरना बल प्रयोग किया जाएगा.

अधिकारी ने बताया, ''जैसा कि मुग़लकाल में या अंग्रेज़ों के दौर में होता था, एसडीएम ने लाउडस्‍पीकर पर बाकायादा मुनादी करते हुए चेतावनी जारी की थी कि पार्क को खाली किया जाए.''

अधिकारी के मुताबिक इस एलान से समूह पूरी तरह आश्‍वस्‍त हो गया था कि पुलिस का अभियान आसन्‍न है और इसीलिए गुरुवार की शाम जब पुलिस भीतर घुसी, तो उन्‍हें लगा कि वह वास्‍तव में अभियान छेड़ने जा रही है. इसी आशंका में उन लोगों ने पलट कर हमला कर दिया.

सवाल उठता है कि यह समूह जवाहर पार्क तक पहुंचा कैसे?

पार्क पर कब्‍जा

एक अटकल यह भी है कि शायद रामवृक्ष भी जलकर मरने वालों में शामिल हो

पुलिस के मुताबिक यह समूह खुद को जय गुरुदेव का अनुयायी बताता है. जय गुरुदेव ने एक वक्‍त में काफी लोकप्रियता हासिल कर ली थी जब उसने खुद को सुभाष चंद्र बोस घोषित कर दिया था. उसके बाद उनके भक्‍तों की संख्‍या में अपार इजाफा हुआ.

जय गुरुदेव की मौत जब 2012 में हुई, तो अपने पीछे वह सैकड़ों करोड़ की संपत्ति और ज़मीनें छोड़ गए. उनकी अंत्‍येष्टि में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव समेत तमाम लोग पहुंचे थे.

जय गुरुदेव की विरासत के तीन दावेदार हुए- पंकज यादव, जो अब ट्रस्‍ट को संभालते हैं; उमाकांत तिवारी, जिनका समूह उज्‍जैन में स्थित है; और रामवृक्ष यादव. जय गुरुदेव की मौत के बाद इन तीनों में जबरदस्‍त रंजिश छिड़ गई थी. स्‍थानीय लोग बताते हैं कि रामवृक्ष के अनुयायी यह दावा करते थे कि जय गुरुदेव अब भी जिंदा हैं.

स्‍थानीय राजस्‍व विभाग के एक अधिकारी याद करते हैं कि 2014 की शुरुआत में यह समूह दिल्‍ली जाते हुए मथुरा में रुका था. वे कहते हैं, ''उन लोगों ने बताया था कि वे एक जन जागरण यात्रा के सिलसिले में शहर आए थे और यह यात्रा दिल्‍ली में संपन्‍न होनी थी.''

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अधिकारी ने बताया कि उन लोगों ने तत्‍कालीन जिला मजिस्‍ट्रेट विशाल चौहान से शहर में दो दिन तक रुकने की अनुमति मांगी थी. चूंकि यात्रा में शामिल लोगों की संख्‍या दो हज़ार से ज्‍यादा थी, लिहाजा मजिस्‍ट्रेट ने उन्‍हें जवाहर पार्क में ठहर जाने को कहा. एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, ''पहले तो उन लोगों ने तिरपाल लगाया, बाद में बांस के झोंपेड़े बना लिए.''

राजस्‍व अधिकारी, जिनका दफ्तर पार्क के ठीक बाहर स्थित है, याद करते हुए बताते हैं कि वे लोग लाउडस्‍पीकर पर सुभाष चंद्र बोस की आराधना में आरती गाते थे. वे स्‍थानीय लोगों से बातचीत में कहते थे कि उन्‍हें भारतीय राज व्‍यवस्‍था, प्रधानमंत्री और राष्‍ट्रपति में विश्‍वास नहीं है. वे भारत सरकार को अंग्रेज़ों की भारतीय सरकार कहते थे. वे भारतीय मुद्रा के बहिष्‍कार का आवाहन करते थे और भारतीय रिजर्व बैंक की जगह आज़ाद हिंद बैंक की स्‍थापना करना चाहते थे. अधिकारी ने बताया, ''वे पुलिस और दूसरे अधिकारियों से सवाल करते थे कि आखिर क्‍यों ये लोग भारत में रानी एलिज़ाबेथ के राज का पालन करते हैं.''

समय के साथ इस समूह ने पार्क के भीतर एक दुकान, दवाखाना और एक स्‍कूल खोल लिया. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक इनकी दुकान पर बाज़ार से सस्‍ता गल्‍ला मिलता था जिसके चलते यहां स्‍थानीय खरीदारों की लंबी कतारे लग जाती थीं.

राजस्‍व अधिकारी ने बताया, ''वे स्‍थानीय मंडियो से माल खरीदते और बिना मुनाफे के उसे बेचते थे. जब चीनी 35 रुपये किलो बिक रही थी, तो वे उसे 25 रुपये की दर पर बेच रहे थे. जब अरहर की दाल 135 रुपये किलो थी, तब उन्‍होंने हाथरस से भारी मात्रा में दाल मंगाकर 120 रुपये किलो की दर से बेची.'' स्‍थानीय लोगों के मुताबिक वहां अच्‍छी गुणवत्‍ता वाला चावल और फल भी सस्‍ते दाम पर मिल जाता था.

कैच ने जिन पुलिस अधिकारियों से बात की, उन्‍हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि इस समूह को पैसा कहां से मिल रहा था, लेकिन उन्‍हें शक़ है कि तिवारी की अगुवाई वाला धड़ा इन्‍हें पैसा मुहैया करा रहा था. एक पुलिस अधिकारी ने बताया, ''उनमें से कुछ का दावा था कि उन्‍होंने अपनी जायदाद बेच दी है.''

जंगल राज

एक स्‍थानीय शख्‍स बताते हैं कि यह पार्क कानून व्‍यवस्‍था के मामले में एक जंगल में तब्‍दील हो चुका था. उन लोगों ने बोस की तस्‍वीरों वाले विशाल दरवाजे तान दिए थे जहां लाठी और बंदूकधारी सदस्‍य तैनात रहते और राहगीरों को ''जय हिंद, जय सुभाष'' बोलने के लिए मजबूर करते. हालत यह हो चुकी थी कि पार्क से बाहर निकलने वाले हर व्‍यक्ति को एक निकासी पास जारी किया जाता था. खबरों के मुताबिक इस समूह ने खुद को ''बैरकों'' में बांट लिया था जहां प्रत्‍येक ''सिपाही'' के पास उसका पहचान पत्र होता था.

जब पहले साल इस समूह को खास दिक्‍कत नहीं आई, तो इसके बाद उसने अपना रंग दिखाना शुरू किया. उनके शुरुआती शिकार बागबानी विभाग के सरकारी कर्मचारी बने जो पार्क के भीतर रहते और काम करते थे. समूह के सदस्‍यों ने उनके साथ बदसलूकी शुरू कर दी. उनके दफ्तर को भी निशाना बनाया गया.

इसी साल मार्च में आक्रोशित कर्मचारियों ने जिला मुख्‍यालय पर धरना दे दिया. जल्‍द ही उन्‍हें शहर के कुछ रसूखदार लोगों का समर्थन हासिल हो गया और इन लोगों ने तय किया कि चूंकि जिला प्रशासन इस समस्‍या की ओर से आंखें मूंदे हुए है, तो वे लोग खुद 4 अप्रैल को पार्क में जाएंगे और कब्‍ज़ा छुड़ाएंगे.

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जिला मजिस्‍ट्रेट ने 4 अप्रैल को इस मामले में दख़ल देते हुए वादा किया कि वे 20 अप्रैल तक पार्क को खाली करा लेंगे. एक अधिकारी के मुताबिक यह घोषणा दिन के 12 बजे हुए और इसके ठीक बाद शाम चार बजे करीब 250 ''सत्‍याग्रहियों'' ने राजस्‍व विभाग के दफ्तर पर हमला बोल दिया, कर्मचारियों से मारपीट की और एक मजिस्‍ट्रेट की कार को नुकसान पहुंचाया. 

इस हमले ने राजस्‍व विभाग के कर्मचारियों को सुलगा दिया.अधिकारी ने बताया, ''बिना किसी कारण के हम पर हमला किया जा रहा था.'' अधिकारी के मुताबिक उन्‍होंने मामला हल होने तक हड़ताल बुला ली, ''डीएम ने 20 अप्रैल का वादा किया था और पार्क खाली कराने के लिए उन्‍होंने राज्‍य सरकार से और फोर्स की मांग की थी, इसलिए हम लोगों ने तब तक के लिए काम का बहिष्‍कार कर दिया.''

हालात से कायदे से निपटने में नाकाम रहने का आरोप लगाते हुए विपक्षी दलों ने उत्‍तर प्रदेश शासन पर हमला बोल दिया है. इस दौरान प्रदेश में कानून व्‍यवस्‍था की बिगड़ती हालत के मद्देनज़र अखिलेश सरकार ने इस हिंसक घटना की जांच मजिस्‍ट्रेट से कराने का आदेश दिया है.

First published: 4 June 2016, 14:15 IST
 
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