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बुरहान की मौत से घाटी में 90 के दौर वाली काली घटाएं घिरने लगी हैं

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 11 July 2016, 14:42 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • वर्ष 2010 में जब उसने पहली बार बंदूक हाथ में उठाई थी, तब उसकी उम्र 17 साल की थी, तभी से उसे कश्मीर की नई पीढ़ी के हीरो के रूप में जाना जाने लगा था.
  • इस पीढ़ी को राज्य के राजनीतिक माहौल से मौका मिलता था. हालांकि इन लोगों ने खुद को अमरनाथ भूमि विवाद के पहले तक किसी राजनीतिक विचारधारा से अलग रखा था. 

पिछले साल जुलाई में 22 साल के बुरहान मुजफ्फर वानी ने दस नए रंगरूटों के साथ अपनी फोटो फेसबुक पर डाली थी. यह फोटो वायरल हो गई थी. ये सभी सेना की वर्दी में थे. यह फोटो दक्षिण कश्मीर के किसी स्थान से ली गई थी. सभी एक दूसरे से सटे हुए थे और उनके कंधों पर हथियार लटक रहे थे. सभी के चेहरे फोटो खिंचवाने की मुद्रा में थे. कुछ के चेहरों पर मुस्कराहट भी थी.

इस फोटो से कश्मीर की नई पीढ़ी के रुख का पता चलता था. नई दिल्ली से गहरे अलगाव के संकेत पहले से ही दिख रहे हैं. यह फोटो फेसबुक और व्हाट्सएप पर काफी शेयर की गई. यह भी पता चल रहा था कि घाटी में आतंकवाद के एक नए दौर की भूमिका बनाई जा रही थी.

यह फोटो कश्मीर घाटी में नए उम्र के लोगों के आंतकवाद की तरफ झुकाव का संकेत देती दिख रही थी. जिसे बाद में जिहाद के रूप में जारी–बुरहान का असर कहा गया. एक दशक में यह पहली बार है जब देशी और विदेशी आतंकवादियों का अनुपात बदला है और वह पहले की तरह दिखने लगा है.

बुरहान प्रभाव

घाटी के 142 सक्रिय आतंककारियों में से 88 स्थानीय थे और बाकी पाकिस्तान के. यह अनुपात अभी भी बना हुआ है. हाल के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार घाटी में लगभग 145 आतंकी सक्रिय है. इनमें से 91 स्थानीय और 54 बाहरी हैं, और इसके पीछे केवल एक व्यक्ति का हाथ है जिसका नाम बुरहान है.

वर्ष 2010 में जब उसने पहली बार बंदूक हाथ में उठाई थी, तब उसकी उम्र 17 साल की थी, तभी से उसे कश्मीर की नई पीढ़ी के हीरो के रूप में जाना जाने लगा था. इस पीढ़ी को राज्य के राजनीतिक माहौल से मौका मिलता था. 

हालांकि इन लोगों ने खुद को अमरनाथ भूमि विवाद के पहले तक किसी राजनीतिक विचारधारा से अलग रखा था. अचानक सर्वाधिक युवाओं का झुकाव अलगाववादी विचारधारा की तरफ हो गया.

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बुरहान नई पीढ़ी के कश्मीरी जिहाद का अगुवा बन गया. उसने पढ़े लिखे युवाओं को साथ लाने में सक्रिय भूमिका निभाई. ये युवा पत्थर की जगह बंदूक थाम सकते थे जो सरकारी बलों से लड़ने के लिए ज्य़ादा मुफीद थे. बुरहान ने उनकी यह नब्ज पकड़ ली और उनकी भावनाओं से खेलना शुरू कर दिया. 

उसने सोशल मीडिया का सहारा लेकर उनकी फोटो और वीडियो अपने साथियों के साथ शेयर किए. यह आतंकवाद का नया रूप था और निश्चित रूप से दुखद भी था.

अकस्मात आया बदलाव?

बुरहान के वीडियो, हथियारों से लैस फोटो और सुरक्षा बलों का मजाक उड़ाने वाले पोस्ट, वॉट्सएप और फेसबुक पर काफी पसंद किए जाने लगे थे. लोग उन्हें शेयर भी करते थे. हालांकि बुरहान में आया बदलाव बेहद अकस्मात था. 

2010 तक घाटी में पिछले दशक की तुलना में आतंकवाद की घटनाओं में काफी गिरावट आ गई थी. नब्बे के दशक की शुरुआत में आतंक की काली यादें भी धूमिल पड़ रही थीं. 20 साल के युवक को इस समय की घटना की शायद थोड़ी-बहुत भी याद नहीं रही हो.

इन सब स्थितियों में 17 साल के एक खूबसूरत कश्मीरी युवक ने बंदूक के साथ अपनी पहचान बनाई और केंद्र सरकार को नए सिरे से चुनौती देने लगा.

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बुरहान के प्रभाव में सैकड़ों स्थानीय युवा आ गए और वे हिजबुल मुजाहिदीन की रैंक में शामिल हो गए

पुलिस सूत्रों के अनुसार बुरहान के प्रभाव में सैकड़ों स्थानीय युवा आ गए और वे हिजबुल मुजाहिदीन की रैंक में शामिल हो गए जिससे कश्मीर में जिहाद को वापस लौटने में मदद मिली. इनमें से किसी को भर्ती नहीं किया गया था. हालांकि कुछ युवा पाकिस्तान गए थे लेकिन उन्हें प्रशिक्षित स्थानीय स्तर पर ही किया गया.

कुछ मामलों में तो युवाों को सार्वजनिक स्थानों पर खड़े पुलिस वालों से खुद के लिए हथियार छीनने का भी दबाव डाला गया. बाहर के जिहादियों की तरह ये लड़के अच्छी तरह प्रशिक्षित नहीं थे. 

लिहाजा ये कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा पाए. सुरक्षा एजेंसियों से जब इनका मुकाबला हुआ तो बिना ज्यादा संघर्ष के ही सुरक्षा बलों ने ज्यादातर को मार गिराया.

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जैसा कि अपरिहार्य था, सोशल मीडिया के चलते इन्हें प्रचार तो मिला, पर नए रंगरूटों को सुरक्षा नेट के कारण सुरक्षा बलों से निपटना काफी कठिन रहा. 2015 से अब तक 180 आतंकी मारे गए हैं. इनमें से 80 को तो पिछले छह माह में ही अपनी जान गंवानी पड़ी है. इस नए उभार का सूत्रधार बुरहान खुद भी सुरक्षा बलों की आतंक विरोधी कार्रवाई में मारा गया.

क्या होगा नतीजा?

अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या बुरहान के मारे जाने से घाटी में नया जिहाद पनप सकता है और घरेलू आतंकवाद की भयावहता को रफ्तार मिल सकती है? राजनीतिक समीक्षक और सुरक्षा एक्‍सपर्ट मानते हैं कि बुरहान की मौत घरेलू आतंकवाद को रफ्तार दे सकती है. इसकी वजह से आतंकियों की नई भर्तियों को बढ़ावा मिल सकता है.

एक पुलिस अधिकारी के अनुसार दोनों ही तरह के हालात उत्पन्न हो सकते हैं. जब आप हथियार हाथ में उठा लेते हैं तो मौत को टाल देने की संभावना शून्य होती हैं. बुरहान नई भर्तियों के कारण मशहूर हो गया और वह जिहाद के नए मजबूत प्रतीक के रूप में पहचाना जाने लगा. आतंकवाद के इस नए दौर में बुरहान के मारे जाने से हालात और खराब हो सकते हैं.

पूर्व मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला घाटी के लिए बुरहान की मौत से कुछ तनाव भरे दिनों की चेतावनी देते हैं

जम्‍मू कश्‍मीर के पूर्व मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला घाटी के लिए बुरहान की मौत से कुछ तनाव भरे दिनों की चेतावनी देते हैं. उमर अब्‍दुल्‍ला ने ट्वीट किया, 'मेरी बात याद रखना. बुरहान की सोशल मीडिया के जरिए आतंकवाद से जोड़ने जो क्षमता थी, वह कब्र में जाने के बाद और बढ़ गई है.' 

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उमर अब्‍दुल्‍ला ने लिखा, 'कई सालों के बाद मैंने श्रीनगर की एक मस्जिद से आज़ादी के नारे सुने. कश्मीर के लोगों को कल एक नया आइकन मिला है. बुरहान, कश्मीर में बंदूक उठाने वाला पहले शख्स नहीं है और न ही आखिरी होगा. हमारी पार्टी नेशनल कांफ़्रेंस का हमेशा से मानना रहा है कि राजनीतिक समस्या का राजनीतिक समाधान ही होना चाहिए.'

उमर का अपना नजरिया है. दक्षिण कश्मीर में बुरहान के जनाजे में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. नब्बे के दशक के बाद पहली बार श्रीनगर में रात भर लाउडस्पीकर से आजादी के नारे लगते रहे, लोगों में देशविरोधी भावनाएं देखने को मिली.

स्थिति में मदद नहीं कर सकते

घाटी के कई शहरी हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर आएं. हिंसक घटनाएं हुईं. हिंसक घटनाएं घाटी के बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं रहीं. विरोध प्रदर्शन की घटनाएं सीमावर्ती क्षेत्रों में भी हुईं. ये वे स्थान हैं जो आतंकी हिंसा वाले क्षेत्र तो कहे जा सकते हैं लेकिन आजादी के नारों से वे हमेशा अछूते रहे हैं. विशेषकर मैदानी इलाके.

अब तक की हिंसा में लगभग एक दर्जन लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. खबर है कि प्रदर्शनकारियों ने सेना के एक शिविर पर हमला किया. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी थी. एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि हालात को सामान्य होने में थोड़ा समय लेगा.

पुलिस अधिकारी ने पहले की एक घटना को याद करते हुए कहा कि पिछली पीढ़ी में 1990 में मारे गए एक हाईप्रोफाइल आतंकी के मामले में भी ऐसा ही हुआ था. लोग सड़कों पर उतर आए थे. उस दौरान आतंकवाद चरम पर था.

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पिछले छह माह से आतंकवादियों का लगातार मारा जाना जारी है. मारे जाने वाले अधिकांश आतंकियों में स्थानीय हैं. कुछ लोग आपस में बात करते हुए सुने जा सकते हैं कि घाटी में कहीं बंदूक फिर से तो नहीं लौट रही. कुछ अलगाववादी नेता है लेकिन वे यह महसूस ही नहीं करते कि हालात को सुधारने में मदद की जा सकती है.

जिलानी गुट वाले हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता अयाज अकबर कहते हैं कि गिलानी साहब खुद छह साल से घर में नजरबंद हैं. यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए कोई जगह नहीं है. ऐसे में प्रतिरोध करने वाले युवाओं के सामने एकमात्र विकल्प यही है कि वे अंडरग्राउंड हो जाएं.

First published: 11 July 2016, 14:42 IST
 
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