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सिद्धांत के लीवर का मामलाः सरकार नहीं देती कामगारों के बीमा पर ध्यान

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 10 June 2016, 7:42 IST

असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी देश में चल रही सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के बारे में उतने ही अनभिज्ञ हैं जितने कानून और संविधान के तहत हासिल अपने अधिकारों के बारे में.

देश भर में विभिन्न प्राइवेट संस्थाओं में काम कर रहे लाखों लोगों के लिए अभी तक कोई प्रभावी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था स्थापित नहीं की जा सकी है. और जो योजनाएं मौजूद हैं, वे जरूरतमंदों की पहुंच से बाहर हैं.

सिद्धांत का मामला

सिद्धांत औरंगाबाद के एक कामगार प्रह्लाद गायकवाड़ का बेटा है. उसकी उम्र 14 साल है. सिद्धांत को एडवांस्ड क्रोनिक लीवर डिजीज है और उसका लीवर ट्रांसप्लांट किया जाना है. वह पिछले तीन सालों से सर्जरी के इंतजार में है.

प्रह्लाद औरंगाबाद की एक ऑटो-मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में मशीन ऑपरेटर के तौर पर काम करते हैं. उन्हें इस काम के लिए हर महीने 13,000 रुपये मिलते हैं. वह अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य हैं. उनके परिवार में उनकी पत्नी और तीन बच्चे हैं. जाहिर है कि वह अपने बड़े बेटे के ऑपरेशन का खर्च नहीं उठा सकते.

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लेकिन प्रह्लाद को ऐसा करने की जरूरत नहीं है. साल 2004 से वह हर महीने अपनी तनख्वाह का दो फीसदी एक सामाजिक सुरक्षा योजना में जमा करते आ रहे हैं. इस योजना का नाम है कर्मचारी राज्य बीमा योजना और इसे श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के तहत कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) चलाती है.

न्यायपालिका ने कुछ ऐसे फैसले दिये हैं, जिससे ईएसआई अधिनियम के तहत सैकड़ों लाभार्थियों को मदद मिल सकती है

यह योजना प्रह्लाद और उनके परिवार को तब तक मेडिकल बेनेफिट देगी, जब तक वह काम करेंगे और उनकी महीने की तनख्वाह 15,000 रुपये से कम रहेगी. यह योजना पूरे देश में 1.95 करोड़ परिवारों के लिए है. लेकिन सिद्धांत अभी भी ऑपरेशन का इंतजार कर रहा है.

योजना में एक बड़ी बाधा है जो सिद्धांत जैसे लोगों के इलाज में रुकावट है. साल 2014 में ईएसआईसी ने इस योजना में संशोधन किया और नये निर्देश जारी किये, जो इस योजना के विस्तार और इसके लाभों को सीमित करते हैं. ईएसआई गाइडलाइन्स 2014 के ‘उच्च लागत वाले उपचार’ वाले वर्ग के तहत कोई भी लाभार्थी हर साल 10 लाख रुपये से अधिक का हकदार नहीं है. लीवर ट्रांसप्लांट जैसे मामलों में, जहां 10 लाख रुपये से अधिक का खर्च आता है, ईएसआईसी मामला-दर-मामला यह तय करती है कि लाभार्थी खर्च की भरपाई का हकदार है या नहीं.

बेमतलब की भागदौड़

दिल्ली के इंस्टिट्यूट ऑफ लीवर एंड बाइलरी साइंसेज (आईएलबीएस) में सर्जरी के लिए प्रह्लाद ने तकरीबन 14 लाख रुपयों की मांग की थी. आईएलबीएस ने 17,60,000 रुपये के खर्च का अनुमान लगाया था, जिसमें ट्रांसप्लांट की लागत 11,50,000 रुपये, डोनर इवैलुएशन की लागत 2,50,000 रुपये और ट्रांसप्लांट के बाद जीवन भर चलने वाले इलाज में पहले साल की दवाई का खर्च 3,60,000 रुपये शामिल था.

ऐसे में ईएसआईसी की हेड कमिटी ने साफ-साफ तय कर लिया कि प्रह्लाद का बेटा लीवर ट्रांसप्लांट का हकदार नहीं था, जिससे उसका जीवन बच सकता है. प्रह्लाद शुरुआत में केवल ऑपरेशन के लिए चिंतित था क्योंकि वह ईएसआई अधिनियम 1950 के तहत हकदार होने के बारे में निश्चिन्त था और उसकी पत्नी ही डोनर की भूमिका में थी. लेकिन उसके बाद से प्रह्लाद और उसके परिवार के लिए लड़ाई काफी लंबी रही है.

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शुरुआत में मुंबई में सिद्धांत की बीमारी के बारे में पता लगना हो या फिर उसके बाद दिल्ली में आईएलबीएस में सिद्धांत को एडमिट कराना, यह परिवार इन सब चीजों से काफी आगे बढ़ चुका है. उन्होंने फिर उस अस्पताल से भी संपर्क किया, जहां उनका बेटा पहले एडमिट था. ऑपरेशन के खर्च की भरपाई के लिए नकारे जाने के बाद प्रह्लाद से कहा गया कि वह दिल्ली में ईएसआईसी के इन्चार्ज से मिले. लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ.

उसे “मेडिकल सेवाओं के बारे में ईएसआईसी के निर्णय- जुलाई 2014” के तहत जारी ताजा दिशा-निर्देशों के बारे में सूचित कर दिया गया, जिसके तहत वह 10 लाख रुपये वाली सीमा की वजह से हकदार नहीं था. ईएसआईसी के प्रतिनिधि ने उन्हें इस बारे में एक अजीब सा तर्क भी दिया- चूंकि उनके इस योजना में पंजीकृत हो जाने के बाद उनके बेटे का जन्म हुआ, इसलिए वह हकदार नहीं है.

ईएसआई अधिनियम में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि कर्मचारी के परिवार के सभी सदस्य ईएसआई योजना में कर्मचारी के पंजीकरण से पहले ही पैदा होने चाहिए.

पहुंचे कोर्ट की शरण में

अब प्रह्लाद के पास कोर्ट की शरण में पहुंचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट अशोक अग्रवाल कहते हैं कि ईएसआईसी की ओर से इस मामले को खारिज कर दिया जाना न केवल अतार्किक और मनमाना है, बल्कि ईएसआई अधिनियम के उद्देश्यों को ही झुठला देता है.

यह बात चौंकाने वाली है कि पिछले साल ईएसआईसी ने रेवेन्यू सरप्लस घोषित किया था

अग्रवाल कहते हैं कि उन्होंने प्रह्लाद की तरह के 500 से अधिक केस लड़े हैं और उनमें से कई मामले ईएसआईसी के लिए मिसाल के तौर पर काम करते हैं. फिर भी ईएसआईसी अपनी पुरानी आदतों से बाज आता नजर नहीं आ रहा.

अग्रवाल कहते हैं, “ईएसआई अधिनियम के तहत लाभ हासिल करने के लिए कोर्ट पहुंचने वाले कामगारों और श्रमिकों की संख्या का तो कोई अनुमान नहीं है, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में ही हर साल यह संख्या हजारों में होती है.”

जेएनयू में सेंटर फॉर इकॉनमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के प्रोफेसर प्रवीण झा कहते हैं, “मौजूदा स्थिति के मुताबिक, अधिनियम में यह कहा गया है कि यदि खर्च 10 लाख रुपये से अधिक होता है, तो ऐसे में मामला-दर-मामला फैसला लिया जायेगा.”

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इसका एक विचित्र पहलू यह भी है कि राजपत्रित अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं के लिए कोई सीमा नहीं है. तो फिर केवल कामगारों के लिए ही सीमा क्यों तय की गयी है? इसके पीछे कोई तर्क नहीं है. ऐसे उपचारों को अनुमति देकर सरकार को कुछ खास नुकसान नहीं होने वाला.

वह कहते हैं, “आर्थिक जनगणना के मुताबिक, संगठित क्षेत्र एक फीसदी से भी कम है. हम बाकी लोगों के लिए क्या कर रहे हैं? मौजूदा योजना इस तरह नहीं बनायी गयी है कि वह अधिकांश कामगारों की जरूरतों को पूरा कर सके.”

अग्रवाल कहते हैं कि हर कर्मचारी के लिए यह संभव नहीं है कि वह कोर्ट का दरवाजा खटखटा सके, ऐसे में न्यायपालिका ने कर्मचारियों के पक्ष में कुछ ऐसे फैसले दिये हैं, जिससे ईएसआई अधिनियम के तहत सैकड़ों लाभार्थियों को मदद मिल सकती है. अग्रवाल को लगता है कि इस बार भी फैसला उनके पक्ष में आयेगा.

आय की अधिकता (रेवेन्यू सरप्लस)

अप्रैल में दिल्ली हाई कोर्ट ने ईएसआईसी को निर्देश दिया था कि वह तीन बच्चों को अंतरिम उपचार प्रदान कराये. इनमें से दो बैंगलुरु से थे और गॉशर रोग से पीड़ित थे. दिल्ली हाई कोर्ट ने ईएसआईसी का यह तर्क खारिज कर दिया था कि थेरेपी काफी महंगी थी.

अग्रवाल कहते हैं, “यह बात चौंकाने वाली है कि पिछले साल ईएसआईसी ने रेवेन्यू सरप्लस घोषित किया था. यही नहीं, इस योजना के लिए पात्र 50 फीसदी से अधिक कर्मचारी इसके लाभार्थी नहीं हैं क्योंकि जानकारी न होने के कारण उन्होंने पंजीकरण नहीं करवाया या फिर उनके नियोक्ता ने उन्हें पंजीकरण कराने से मना कर दिया.”

इस योजना के तहत नियोक्ता को हर छह महीने पर अपनी आमदनी का पांच फीसदी इस योजना के लिए देना होता है. सामाजिक सुरक्षा अभी भारत में दूर की कौड़ी है और थोड़ी राहत देने के लिए जो कुछ नियम बनाये गये हैं उनमें इतनी कमियां हैं कि अधिकांश जनसंख्या उन योजनाओं के दायरे से बाहर रह जाती है.दूसरी ओर प्रह्लाद और सिद्धांत जैसे मामलों में कोर्ट में अपनी समस्या उठाने के लिए लाभार्थियों को अपना वक्त और पैसा बर्बाद करना पड़ता है.

First published: 10 June 2016, 7:42 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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