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पढ़ी-लिखी मुस्लिम लड़कियों के पति कहां हैं?

सिमीं अख़्तर नक़वी | Updated on: 27 September 2016, 18:46 IST
QUICK PILL
  • लड़कियों के पास डिग्री डॉक्टर की हो या फिर इंजिनियर की, शादी करने वाले लड़कों की प्राथमकिता हमेशा कम उम्र, दुबली और सुंदर लड़की की होती है. 
  • चूंकि उच्च शिक्षा हासिल करने के दौरान लड़कियां एक उम्र भी पार कर चुकी होती हैं, इसलिए उन्हें अपने लिए साथी ढूंढ पाना एक मुसीबत बन जाती है. 

शादी से जुडी सामाजिक अपेक्षाएं और आम-फ़हम सामाजिक सोच के चलते शिक्षित लड़कियों के लिए शादी के लिए साथी तलाशना एक मुश्किल सवाल है. सभी लड़कियों के लिए और उनमें भी ख़ास तौर पर मुस्लिम लड़कियों के लिए. लड़की जितनी ज़्यादा पढ़ी-लिखी है, उसके लिए शौहर ढूंढ पाना उतना ही कठिन हो जाता है. इसलिए नहीं कि मुस्लिम समाज में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स लड़कियों के लिए डॉक्टर, इंजीनियर, लॉयर, कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स लड़कों की कमी है. 

वजह ये कि एक ही कार्य-क्षेत्र में काम कर रहे लड़के अमूमन (अधिकांशतः) अपने से कम उम्र की, कम पढ़ी लिखी, कम कमाने वाली, ‘दुबली, गोरी, खूबसूरत’ लड़कियां तलाश करते हैं, जिन्हें वे समाज के सामने ‘गर्व' से पेश कर सकें और जिस से शादी में मर्द-औरत की असमानता बनी रहे. ज़ाहिर है लड़की कैसी दिखती है और कितनी शिक्षित है, ये दो अलग बातें हैं. मगर इतना तय है कि वो जितना ज़्यादा पढ़ी लिखी है, उसकी उम्र भी उतनी ही ज़्यादा है। इसका सीधा मतलब यह है कि रवायती शादी-बाजार में लड़की की शिक्षा उसकी वैवाहिक वांछनीयता के उलट काम करती है. हालांकि यह सच पूरी विवाह-इश्तेहार संस्कृति पर लागू होता है, मगर मैं यहां सिर्फ़ मुस्लिम औरतों की बात करूंगी.

अगर हम अखबारों में छपने वाले शादी के इश्तिहारों को देखें तो पाएंगे कि लड़के के घर वाले होने वाली बहु में जो खूबियां तलाश कर रहे हैं, उनमे या शारीरिक विशेषताओं को व्यक्त करने वाले विशेषणों का प्रयोग ज़्यादा आम है. जैसे ‘गोरी’, ‘सुन्दर’, ‘दुबली ’ या फिर ‘धार्मिक’ और ‘घरेलु’ वग़ैरह. ‘पेशेवर’ और ‘आला तालीम याफ़्ता’ जैसे विशेषण आम तौर पर आज भी लड़कों के लिए ही इस्तेमाल किये जाते हैं. इसके उलट अगर हम लड़की के परिवार वालों की तरफ़ से दिए गए इश्तिहारों को देखें तो लड़कियों की विशेषताओं में ‘आला तालीम याफ्ता’ और ‘प्रोफेशनल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल आम तौर पर होने लगा है जिसका सीधा मतलब है शादी के बाज़ार में मांग और आपूर्ति में तालमेल नहीं.

मगर विज्ञापन भी छपते हैं और रिश्ते भी होते हैं, जिसका मतलब है लड़के वालों की तरफ से होने वाली बहु में जिन गुणों की की अपेक्षा की जाती है उसका मकसद सिर्फ यह ज़ाहिर करना होता है कि अगर लड़की शिक्षित या काम काजू भी होगी तो शादी के बाद घर में उसे एक रवायती बीवी और बहु की भूमिका निभानी होगी. 

पढ़ी-लिखी तो ठीक है लेकिन गोरी और सुंदर भी है क्या?

इस लेख के लिए मैंने एक आम रविवार को अलग-अलग अख़बार खरीदे और उन में छपे मुस्लिम समुदाय के 50 वैवाहिक-इश्तिहारों का विश्लेषण किया, जिनमे 25 इश्तिहार लड़की वालों के थे और 25 लड़के वालों के. इनमें से 44 ने धर्म के अलावा अपनी जात/बिरादरी/उप-समुदाय भी लिखा था (जैसे शिया/सुन्नी, शेख/सय्यद/जुलाहा वग़ैरह, जबकि न इस्लाम धर्म में जात/बिरादरी/उप-समुदाय की बात की गयी है और न ही उत्तर भारत के मुस्लमान आम तौर पर इस बात को मानते हैं कि उनके बीच जात-पात होती है. वैसे भी दूसरे समुदायों के जिन विज्ञापनों में ‘कास्ट नो बार’ लिखा होता है, उनमे भी इन लड़कों के उदारवादी माता-पिता अक्सर ‘गोरी’ और ‘खूबसूरत’ बहु की कामना करते हुए पाए जाते हैं, जो लिंग-भेद और वर्ण-भेद वाली सोच को ही ज़ाहिर करता है.

लड़के वालों के 25 इश्तिहारों में से केवल 5 ने ‘शिक्षित’ और केवल 2 ने ‘उच्च शिक्षा प्राप्त’ बहु की कामना ज़ाहिर की थी और जिन परिवारों को पढ़ी लिखी लड़कियों की तलाश थी उन्होंने भी होने वाली बहु के लिए ‘गोरी’ और ‘सुन्दर’ जैसी खूबियों की अपेक्षा ज़ाहिर करने में कोई हिचकिचाहट नहीं महसूस की थी. मुस्लिम समुदाय के अपने बहुत सारे दोस्तों से बात कर के भी इन्ही रूढ़िवादी विचारों से दो चार होना पड़ा, ख़ास तौर पर पुरुष दोस्तों से. अफ़सोस यह कि वे लड़के भी जो खुद उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और यह नहीं चाहते कि होने वाली बीवी शिक्षा प्राप्त न हो, अधिकतर यही समझते हैं कि शादी के बाद लड़की को ही घर-परिवार की ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए जबकि पुरुष का काम मुख्यतः केवल पैसा कमाकर घर लाने तक ही सीमित है.

नौकरी-पेशा होने के बावजूद अधिकार पति का

इसके विपरीत पढ़ी-लिखी और नौकरी-पेशा मुस्लिम लडकियां न सिर्फ शादी के बाद नौकरी जारी रखना चाहती हैं अलबत्ता अपने माता-पिता की ज़िम्मेदारी भी उठाना चाहती हैं. एक अनुभव जो कई शादी-शुदा महिला दोस्तों ने दोहराया, वह यह था कि शादी के बाद उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने माता-पिता से कम से कम मिलें-जुलें और कार्यस्थल पर भी केवल जितना ‘बहुत ज़रूरी है' उतना ही समय बिताएं. इसके अलावा यह अनुभव भी आम रहा कि बहु की कमाई पर लड़के के घर वाले अपना अधिकार समझते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि अपनी कमाई के पैसे बहु पति के घर पर ही खर्च करें, न कि अपने माँ-बाप, भाई-बहनों वग़ैरह पर. ज़ाहिर है यह पितृ-सत्तावादी और ग़ैर-बराबरी वाली सोच आज भी औरतों से यही अपेक्षा करती है कि वे खुद को पुरुषों से कमतर और दूसरे दर्जे का नागरिक समझें. 

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि हम जितना ज़्यादा पढ़-लिख जातें हैं, उतना ही अपने अधिकारों के लिए सचेत हो जाते हैं और बराबरी और स्वाभिमान के लिए प्रयत्नरत भी. बदकिस्मती से आज भी रवायती शादी के दायरे में इसे बग़ावत समझ जाता है और जो लड़की अपने माँ-बाप की ज़िम्मेदारी उठाने की आज़ादी चाहती है उसे ग़ैर-ज़िम्मेदार समझ जाता है. 

अपनी शादी अपने हाथ

ऐसा नहीं है कि विवाह या वैवाहिक अपेक्षाओं से जुड़ा सांस्कृतिक सन्दर्भ नहीं बदल रहा, मगर इसकी रफ़्तार कुछ धीमी ज़रूर है और इसे बदलने के लिए कोशिश करनी होगी. इस तथ्य के मद्देनज़र कि आज भी लगभग 80-90 फ़ीसदी शादियां घर वाले ही करवाते हैं और जो शादियां लड़का-लड़की अपनी पसंद से करते हैं, उनमे भी ज़्यादातर अपने ही समुदाय/जाति /वर्ग में की जाती हैं. कहा जा सकता है कि जब तक खुद लड़कियां इस बदलाव की ज़िम्मेदारी नहीं लेंगी, बदलाव आना मुश्किल है. खुद लड़कियों को ही शादी के रिश्ते में बराबरी पर ज़ोर देना होगा, दहेज़ की प्रथा से इनकार करना होगा, ख़ुद से ज़्यादा कमाने वाले लड़के या स्वयं से अधिक समपन्न घर में रिश्ता तलाशना बंद करना होगा और शिक्षा से वैवाहिक संभावनाओं में होने वाली हानि को दरगुज़र कर, शिक्षा और रोज़गार से मिलने वाली आज़ादी, स्वाभिमान और सुरक्षा को समझना और चुनना होगा. अगर हम इतना करने में सफल होते हैं तो निस्संदेह सामजिक परिवेश भी ज़रूर बदलेगा. 

First published: 27 September 2016, 18:46 IST
 
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