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नोटबंदी की कीमत जान देकर चुका रही देश की जनता

चारू कार्तिकेय | Updated on: 13 November 2016, 6:01 IST

500 और 1000 रुपए के नोटों को अचानक बंद किए जाने की घोषणा को कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने 'तुगलकी' आदेश बताया, और इसकी वजह है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 14वीं सदी के सम्राट मुहम्मद बिन तुगलक से तुलना इसलिए की क्योंकि तुगलक ने भी सोने और चांदी के सिक्कों को बंद करने और उनकी जगह तांबे और पीतल के सिक्के जारी करने का अचानक फैसला लिया था. मोदी की तरह ही तुगलक के इस कदम को साहसी बताया गया था, पर इससे जल्द ही मुश्किलें खड़ी हो गई थीं.  

मोदी के इस कदम से जनहित होगा या नहीं, यह तो वक़्त बताएगा, पर एक नुकसान तो साफ है कि लाखों गरीबों की जिंदगी पर बन आई है. वे इससे जुड़े तथ्यों को लेकर उलझन में हैं, घबरा गए हैं कि उनकी मेहनत की कमाई की बचत का क्या होगा. जिन लोगों की बैंक की शाखाओं और एटीएम तक पहुंच है, अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं और महज इस उम्मीद से घंटों कतार में खड़े हैं कि उनकी मेहनत की कमाई किसी तरह बच जाए. 

पर अंदरुनी इलाकों में, जहां कई लोगों की बैंक की शाखाओं और एटीएम तक पहुंच नहीं है, उनमें असुरक्षा की भावना तेजी से मायूसी में बदल रही है, और दिल बैठा जा रहा है. चौंका देने वाले इस विमुद्रीकरण का सबसे दुखद परिणाम है, लोगों की सदमें में मौतें या आत्यहत्याएं. ये वे लोग हैं, जिनके दिल की धडक़नें केवल इस चिंता में रुक गईं कि मेरी मेहनत की कमाई तो बस गई. 

मौत के नतीजे

गोरखपुर में बैंक की एक शाखा के बाहर पड़ी तीर्थराजी देवी की लाश का चित्र आपको हिलाकर रख देगा. अधेड़ उम्र की इस मृतका ( जिसे धोबिन बताया जा रहा है) की लाश के पास हजार के दो नोट पड़े हैं, उनमें से एक उनकी बैंक की पास बुक में है. कुछ रिपोर्ट्स का कहना है कि शाखा के बाहर चाय की एक थड़ी वाले ने उसमें गलतफहमी पैदा कर दी थी कि उनके रुपए अब बेकार हो गए.

एक पल के लिए आप खुद को उनकी जगह खड़े रखकर देखें और महसूस करें कि उन्हें इस बात से कितना सदमा लगा होगा.

तीर्थराजी देवी क्यों मर गईं? कुछ कहेंगे जानकारी के अभाव में. पर क्या देश के लाखों लोग उसकी तरह आय के अल्प स्रोतों के साथ नहीं जीते? पैसे बचाना और लाखों उम्मीदों और सपनों के साथ बचाना और जो जानकारी हम शहरियों को होती है, उनके अभाव में बचाना. सरकारी योजनाएं, जो उनके हित में बनाई जाती हैं, आंगनबाड़ी की मदद के बिना उन तक नहीं पहुंच पातीं. क्या वे घोषणा के महज चार घंटे में अचानक उठाए इस कदम की बारीकियां समझ सकते हैं?

तेलंगाना में आत्महत्या

55 साल की कांडुकुरी विनोदा ने कल शेनागापुरम में अपने घर के बाहर फांसी लगा ली. उस समय उसका बेटा और पति सो रहे थे. विनोदा के परिवार ने उसके बीमार पति के इलाज के लिए कुछ दिनों पहले ही 12 एकड़ खेती की जमीन बेची थी. इससे उन्हें 56.40 लाख रुपए मिले थे. इसमें से 1.4 लाख खर्च करने के बाद बाकी की रकम घर पर रखी थी, सारी1000 और 500 रुपए के नोटों में. वे खेती की जमीन खरीने की योजना बना रहे थे, लेकिन अचानक 1000 और 500 रुपए के नोटों को हटाए जाने की घोषणा से विनोदा को भारी सदमा लगा और उसने आत्महत्या कर ली.

मुंबई और केरल में पुराने नोटों को बदलवाने के लिए कतार में खड़े दो और व्यक्तियों ने हिम्मत हारी और सदमें में मर गए. 

इन मौतों के निहितार्थ हैं. उन लोगों से भी ज्यादा, जो एक शाखा से दूसरी शाखा और एक एटीएम से दूसरे एटीएम भाग रहे हैं और घंटों कतार में खड़े हैं. ये मौतें सरकार की अचानक, लगभग तुगलक जैसी घोषणा का परिणाम हैं. अन्य सभी गड़बडिय़ों के साथ ही उनकी मौत के लिए भी सरकार जिम्मेदार है. उनकी जिंदगी के साथ इस तरह खेलने का अधिकार किसने दिया? 

जो जिंदा हैं, वे भी सदमे में

जो गरीब मरे नहीं और ना ही आत्महत्या की, वे अब भी सदमे में हैं. उन्होंने नोटों को जलाते हुए देखा-सुना है, और वे उन दृश्यों से घबराए हुए हैं. कह रहे हैं, ये अमीर उन रुपयों को जलाने की बजाय गरीबों को क्यों नहीं बांट देते. उन्हें विश्वास है कि वे नोटों को बदलने के लिए किसी को राजी कर लेंगे. क्या जलते हुए रुपयों का दृश्य उन गरीबों के मानस पर सदा के लिए अंकित नहीं रहेगा? उनके साथ कैसा क्रूर मजाक है यह? बार-बार याद आने वाली मानवीय त्रासदी! 

यह सब काले धन के खिलाफ उठाए गए कदम के नाम पर हो रहा है. क्या सच में? कई खुश हैं कि इससे कइयों का गुप्त बेहिसाबी धन सामने आ सकता है. पर कई नकदी जमाखोरों ने प्रधानमंत्री की घोषणा के महज एक दिन बाद ही अपने बेहिसाब पैसों को सोने और डॉलर्स में बदलवा लिया. एक दिन में सोने के दाम दोगुने हो गए, जो इसका सूचक है कि सोने की भारी खरीद हुई है. क्या इससे किसी भी रूप में काली अर्थव्यवस्था पर आंच आई?

उच्च मूल्य की करेंसी को हटाए जाने के बाद ना केवल 500 और 1000 के नोट वापस आएंगे, बल्कि 2000 रुपए का नया करेंसी नोट भी लाया गया है. क्या इससे काली अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा नहीं मिलेगा? बेहिसाब पैसों को अस्थाई तौर पर सफाया करने की यह कवायद ‘काले धन के खिलाफ जंग’ नहीं है. और किस कीमत पर? सदमे में मौतें? आत्महत्याएं? 20,000 करोड़ रुपए की राशि का विमुद्रीकरण हुआ, पर इंसान के अनकहे दुख पर विचार नहीं किया गया. सरकार और हम सभी को इस पर विचार करना है कि लोगों को इस पूरी कवायद की क्या कीमत चुकानी पड़ी है. 

First published: 13 November 2016, 6:01 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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