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तथागत रॉय: महामहिम की महिमा अपार

चारू कार्तिकेय | Updated on: 7 January 2016, 8:11 IST
QUICK PILL
  • त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत रॉय के लगातार ट्वीट ने से फिर विवाद खड़ा हो गया है. उन्होंने पठानकोट में हुए आतंकी हमलों पर अपनी राय जाहिर करते हुए लिखा है कि आतंकियों के शव को उन्हें सूअर की खाल में लपेटकर सूअर के मल में दफना देना चाहिए.
  • रॉय इससे पहले भी वे ट्वीट के जरिए गुजरात में 2002 के दंगों को जयाज ठहराने से लेकर \'पश्चिम बंगाल के इस्लामी अधिग्रहण\' की बात कह चुके हैं.

त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत रॉय गाहे-बगाहे अपनी सांप्रदायिक सोच को जाहिर करते रहे हैं. हालांकि वे एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं लेकिन उनके विचार अक्सर संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ करते हैं. पठानकोट आतंकी हमले के बाद उन्होंने एक बार फिर से अपनी उसी संकीर्ण सोच का मुजाहिरा किया है.

आतंकी हमले का जिक्र करते हुए रॉय ने दो जनवरी को 'फिदायीन हमले को रोकने के उपाय' के कुछ उपाय ट्वीटर पर रखे हैं. उनके शब्दों में, 'यह सुनिश्चित करने की कोशिश करनी चाहिए कि आतंकियों को जन्नत नहीं मिले.' रॉय आगे लिखते हैं, 'अमेरिकी जनरलों ने यह बताया है कि इसे कैसे किया जा सकता है.'

आगे के ट्वीट में वह अमेरिकी जनरल जॉन पर्सिंग की कहानी बताते हैं. वो लिखते हैं, '50 इस्लामी आतंकियों को फिलीपीन्स में एक फायरिंग दस्ते के सामने रखा गया और उनमें से 49 को सूअर के खून से सनी गोली मारी गई. इसके बाद उन्होंने 50वें आतंकियों को यह मैसेज अपने साथियों के बीच देने के लिए छोड़ दिया कि उसके साथी आतंकी सूअर की वजह से नरक में सड़ेंगे.'

tathagat

रॉय ने ट्वीट किया, 'खबरों की माने तो यह तरीका काम आया.' उन्होंने कहा, 'जनरल पर्सिंग का अनुसरण करते हुए रूसियों ने भी चेचेन विद्रोहियों को सूअर की खाल में लपेटकर दफना दिया.' पठानकोट में जैसे-जैसे मरने वालों का आंकड़ा बढ़ रहा था, रॉय के नकारात्मक ट्वीट की संख्या बढ़ती जा रही थी. 

चार जनवरी को उन्होंने ट्वीट किया, 'मेरी यह सलाह है कि आतंकवादियों के शव के साथ रूस की तरह बर्ताव किया जाए. उन्हें सूअर की खाल में लपेटकर सूअर के मल में ढक दिया जाए. फिर हूर की संभावना ही खत्म हो जाए.'

इस्लाम में हूर की अवधारणा बेहद आम है जिसका साथ मरने के बाद जन्नत में मिलता है. वहीं 'सूअर का खून', 'सूअर की खाल' और 'सूअर का मल' इस्लाम में हराम माना जाता है.

जब उनके आखिरी ट्वीट पर लोगों की नजर गई तो इसकी आलोचना भी शुरू हो गई. हालांकि इसके बाद भी राज्यपाल नहीं रुके. छह जनवरी को एक और ट्वीट कर उन्होंने कहा, 'फिदायीन हमलावरों के साथ किए जा रहे रूसी बर्ताव को अपनाए जाने की मेरी सलाह पर मुझे गाली दी जा रही है. संदेश साफ है, ऐसा मत कीजिए. यह फिदायीन हमले का खात्मा होगा.'

दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा कि मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि 'आखिरकार जिहादी आतंकियों के शवों को लेकर लोगों में सहानुभूति की बाढ़ क्यों आई है.'

सांप्रदायिक अतीत

रॉय इससे पहले भी कई ट्वीट कर गुजरात में 2002 में हिंदुओं की कार्रवाई पर खुशी जता चुके हैं. इसके अलावा वह 'पश्चिम बंगाल के इस्लामी अधिग्रहण का हव्वा' भी खड़ा कर चुके हैं. एक दूसरे ट्वीट में उन्होंने कहा था, 'मैं उज्जवल निकम की तारीफ करता हूं जिन्होंने बिरयानी की झूठी कहानी गढ़कर 'धर्मनिरपेक्ष' मीडिया में कसाब के 'छोटे गरीब बच्चे' की छवि को तोड़ने की कोशिश की थी.'

1993 के मुंबई हमलों के आरोप में याकूब मेनन को फांसी दिए जाने के बाद 31 जुलाई 2015 को उनके एक ट्वीट से विवाद हो गया. रॉय ने लिखा, 'खुफिया एजेंसियों को उन सभी लोगों की (संबंधी और दोस्तों को छोड़कर) निगरानी करनी चाहिए जो याकूब मेनन के जनाजे में जमा हुए थे.'

संवैधानिक गरिमा का ख्याल नहीं

मई 2015 में उन्हें अचानक से त्रिपुरा का गवर्नर बनाया गया. अपने ब्लॉग 'अगेंस्ट द करेंट' में दो जनवरी 2016 को रॉय ने लिखा कि उन्हें फोन पर राज्यपाल बनाने की सूचना दी गई जब वे दिल्ली के होटल इंपीरियल में कुंग पॉ चिकन खा रहे थे.

राज्यपाल बनने के बाद उन्होंने यह दुख जताया कि अब उन्हें अपने राजनीतिक रुझान के मुतबिक ट्वीट करने का मौका नहीं मिलेगा. लेकिन अब शायद उन्हें लगने लगा है कि संवैधानिक पद पर बैठे रहकर भी बेतुका और सांप्रदायिक बयान दिया जा सकता है. उन्होंने खुद कहा कि त्रिपुरा का राज्यपाल रहने के दौरान उनके पास रिबन काटने के अलावा 'कुछ खास काम' नहीं होगा. ऐसा उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा था.

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वह उन्हें उनके पद से हटा कर उन पर बड़ा एहसान करें. राज्यपाल नहीं रहने के बाद भी उनका ट्वीट चलता रहेगा लेकिन तब उसका संबंध राज भवन से नहीं होगा.

First published: 7 January 2016, 8:11 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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