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नक्सलियों के फर्जी आत्मसमर्पण में मानवाधिकार आयोग को दिखा गोरखधंधा

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 September 2016, 7:54 IST
QUICK PILL
  • नक्सल प्रभावित झारखंड में 100 से अधिक लोगों के पहचान और पैसे समेत सब कुछ गंवाने के आरोपों के करीब चार साल बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इसमें सच्चाई नजर आ रही है. 
  • मामला नक्सलियों के आत्मसमर्पण से जुड़ा है. जबकि पीड़ितों का कहना है कि उनका नक्सलियों से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने बताया कि सैन्य खुफिया ईकाई और सीआरपीएफ के बड़े अधिकारियों ने उन्हें बतौर नक्सली 2011-12 में आत्मसमर्पण करने के लिए कहा था.
  •  अब इस पूरे मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से तीन महीनों के भीतर रिपोर्ट मांगी है.

नक्सल प्रभावित झारखंड में 100 से अधिक लोगों के पहचान और पैसे समेत सब कुछ गंवाने के आरोपों के करीब चार साल बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इसमें सच्चाई नजर आ रही है. इन सभी ने आत्मसमर्पण किया था. 

पीड़ितों का कहना है कि उनका नक्सलियों से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने बताया कि सैन्य खुफिया ईकाई और सीआरपीएफ के बड़े अधिकारियों ने उन्हें बतौर नक्सली 2011-12 में आत्मसमर्पण करने के लिए कहा था.

इन अधिकारियों ने आदिवासियों को प्रति व्यक्ति के लिहाज से 2 लाख रुपये भी दिए और उन्हें अर्द्धसैनिक बलों में नौकरी देने का वादा किया. बाद में इन कथित नक्सलियों ने अधिकारियों की तरफ से मुहैया कराए गए हथियार के साथ पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और फिर औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए उन्हें कुछ दिनों के लिए जेल में रखा गया. उन्हें बताया कि जेल से बाहर आने के बाद उन्हें अर्द्धसैनिक बलों में जगह दी जाएगी.

रांची में एक सार्वजनिक सुनवाई में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एल एल दत्तू ने कहा, 'प्राथमिक तौर पर आरोप सही लगते हैं. जांच रिपोर्ट गृह मंत्रालय के साथ राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है.' एनएचआरसी ने तीन महीनों के भीतर राज्य सरकार से इस मामले में रिपोर्ट मांगा है.

पूर्व नियोजित घोटाला

यह पूरा मामला न केवल चौंकाने वाले भ्रष्टाचार के मामले का है बल्कि यह बताता है कि किस तरह से वरिष्ठ अधिकारियों ने निजी छवि चमकाने के लिए नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रकरण से सैंकड़ों आदिवासियों की जान खतरे में पड़ गई.

साथ ही वामपंथ से प्रभावित इलाके में यह बड़े घोटाले की तस्दीक करता है. झारखंड ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ में भी नक्सलवादी बिना किसी उचित कारण के सैंकड़ों की संख्या में आत्मसमर्पण कर रहे हैं. दत्तू जिस मामले की तरफ इशारा कर रहे हैं वह 2001 से 2012 के बीच का है.

पश्चिम सिंहभूम के निवासी और बलात्कार आरोपी रवि बोदरा और एक पूूर्व सैन्य खुफिया अधिकारी ने कथित तौर पर 2011 की शुरुआत में झारखंड के अधिकारियों से संपर्क किया ताकि नक्सलियों से आत्मसमर्पण कराया जा सके.

राज्य सरकार भी नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में आत्मसमर्पण की नीति को कारगर मानता है. क्योंकि किसी के आत्मसमर्पण करने से उनके अन्य सहयोगियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ता है. इसके अलावा हिंसा से भी मुक्ति मिलती है.

इसलिए अधिकारियों ने बोदरा की योजना को लेकर सहमति जताई और उसने  कई अन्य लोगों को आत्मसमर्पण करने के लिए प्रेरित किया. ऐसे लोगों की संख्या करीब 500 थी.

बोदरा मामला

अक्टूबर 2012 में सीआपीएफ के नए आईजी ने देखा कि जेल में कुछ लोग अवैध तरीके से रह रहे हैं और उन्होंने पुलिस को इस बारे में कार्रवाई करने के लिए कहा. मार्च 2014 में पुलिस ने इस मामले में मुकदमा दर्ज करते हुए दो बिचौलियों को गिरफ्तार किया. 

हालांकि किसी वरिष्ठ अधिकारी से कोई पूछताछ नहीं हुई. मई 2014 में हेमंत सोरेन की सरकार ने इस मामले की सीबीआई से जांच कराए जाने की सिफारिश कर दी.

मार्च 2015 में विधानसभा में जबरदस्त हंगामा होने के बाद सोरेन ने राज्य सरकार को आश्वासन दिया कि वह इस मामले में एक बार फिर से सीबीआई से संपर्क करेंगे. उन्होंने इसे घोटाला करार देते हुए दावा किया कि गृह मंत्रालय की यह महत्वाकांक्षी परियोजना गलत साबित हो गई.

रिपोर्ट्स के मुताबिक सीबीआई ने इस मामले को लेने से मना कर दिया. करीब छह सालों बाद भी इस मामले के पीड़ितों को समझ में नहीं आ रहा है कि वह क्या करें.

मानवाधिकार आयोग का दखल

एनएचआरसी की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि इसमेंं कई आदिवासी प्रभावित हुए. हालांकि जब आप आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो आपको पता चलेगा कि कितने लोगों को अब तक इसका शिकार होना पड़ा. किस तरह से उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ. 

वहीं इस मामले में सबसे बड़ी खामी यह रही कि मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

2011 में कथित घोटाले के बाद से कुल 227 नक्सलियों ने समर्पण किया. 2012 में यह संख्या बढ़कर 414 हो गई. एक साल बाद यह संख्या बेहद तेजी से बढ़करर 1,930 हो गई. 

जबकि 2014 में समर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या घटकर 656 हो गई. वहीं 2015 में 615 नक्सलियों ने समर्पण किया जबकि इस साल अगस्त महीने तक 1,548 नक्सलियों ने समर्पण किया है.

2011 में कथित घोटाले के बाद से कुल 227 नक्सलियों ने समर्पण किया. 2012 में यह संख्या बढ़कर 414 हो गई.

इस साल की शुरुआत में कैच ने बताया था किस तरह से बस्तर में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को समर्पण का मतलब भी नहीं पता था. कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्हें बदले में घर और नौकरी का वादा किया गया था लेकिन उन्हें यह अभी तक नहीं मिल पाया है.

पुलिस और गृह मंत्रालय भले ही संख्या को बढ़ा चढ़ाकर पेश करें लेकिन सच यह है कि राज्य सरकार अभी तक 10 बड़े नक्सलियों का आत्मसमर्पण तक नहीं करा पाई है.

वहीं बड़ी संख्या में फर्जी तरीके से निर्दोष लोगों को नक्सली बताकर आत्मसमर्पण कराने की वजह से उनकी जान खतरे में पड़ गई है. नक्सलियों को यह लोग पुलिस के एजेंट लगते हैं. ऐसे समय में दत्तू की तरफ से जांच का वादा इस मामले में उम्मीद की किरण बनकर आया है. 

First published: 11 September 2016, 7:54 IST
 
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