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पीडीटी आचारी: सुप्रीम कोर्ट की बजाय उत्तराखंड विवाद स्पीकर को सुलझाना चाहिए था

चारू कार्तिकेय | Updated on: 16 May 2016, 8:05 IST
QUICK PILL
सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद उत्तराखंड की समस्या भले ही सुलझ गई हो लेकिन इसने कई संवैधानिक सवालों को सामने ला खड़ा किया है. विधायिका के काम काज में न्यायपालिका का दखल ठीक नहीं माना जाता लेकिन यह बात सब जानते हैं कि यह पहली बार नहीं हुआ है. इस बार नई बात यह हुई कि अदालत ने शक्ति परीक्षण के तरीकों को लेकर निर्देश दिया.कैच ने इस पूरे मामले को लेकर लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल पी डी टी आचारी से बातचीत की. आचारी देश के संवैधानिक विशेषज्ञों में से एक हैं. आचारी ने कहा कि 10 मई को उत्तराखंड में जोे कुछ हुआ वह संविधान के मुताबिक है. 

उत्तराखंड विधानसभा में जो कुछ हुआ, उसमें आपको किसी तरह की विसंगति दिखाई देती है?

इस पर बात करने से पहले मैं यह पूछना चाहता हूं कि कैसे केंद्र सरकार केवल इस लिहाज पर किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकता है क्योंकि वहां के स्पीकर ने एप्रोप्रिएशन बिल पर वोटिंग की मांग को खारिज कर दिया. मैं कहता हूं कि सभी विधानसभाओं में एप्रोप्रिएशन बिल ध्वनि मत से पारित होता है और स्पीकर इस मामले में वोटिंग कराए जाने की मांग को खारिज कर सकता है.

एप्रोप्रिएशन बिल को पास किए जाने का मामला अलग-अलग मंत्रालयों की तरफ से पास किए जाने वाले अनुदान से जुड़ा है. बिल तभी पास किया जा सकता है जब यह ग्रांट पास कर दिया जाए. 

सदस्य एप्रोप्रिएशन बिल में कोई संशोधन नहीं कर सकते क्योंकि सदन के पास कर देने के बाद अनुदान में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता. तो क्या सदन एप्रोप्रिएशन बिल को खारिज कर सकता है? मेरे विचार में इसका जवाब है नहीं. तब  विपक्ष के सदस्य कैसे वोटिंग की मांग कर सकते थे. ऐसा किया ही नहीं जा सकता.

राष्ट्रपति शासन की सिफारिश केे बाद विधानसभा में जो कुछ भी हुआ उस पर आपका क्या कहना है?

संविधान में शक्तियों के बंटवारे की बात की गई है. न्यायपालिका विधायिका के फैसले की समीक्षा कर सकता है लेकिन अपने काम काज में विधायिका स्वतंत्र है. सदन का अपना अध्यक्ष होता है और कोई भी इसकी स्वायत्तता में दखल नहीं दे सकता. जगदंबिका पाल मामले का अक्सर हवाला दिया जाता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में साफ कर दिया था कि भविष्य में इस मामले को आधार नहीं बनाया जाएगा.

निश्चित तौर पर इसे 2005 में झारखंड में दुहराया गया और यह तीसरी बार है जब ऐसा किया गया. सुप्रीम कोर्ट विधानसभा के काम-काज के तरीकों के बारे में बता नहीं सकता. इस बारे में पूरा अधिकार विधानसभा स्पीकर के पास है. 

अनुच्छेद 142 का अक्सर इन मामलों में हवाला दिया जाता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट को किसी भी मामले में न्याय करने का अधिकार दिया गया है. क्या यह इसमें लागू नहीं होता है?

अनुच्छेद 142 वास्तव में सुप्रीम कोर्ट को बहुत अधिक अधिकार देता है लेकिन यह मामला इस लिहाज से भी अलग है कि इसमें विधायिका जैसी संवैधानिक संस्था शामिल है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को सावधानी से अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए. 

आप शक्ति परीक्षण का आदेश दीजिए लेकिन इसके बाद सब कुछ स्पीकर पर छोड़ दीजिए. संयोगवश सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से पूरे मामले की प्रक्रिया तक को ध्यान में रखते हुए आदेश दिया, वह बताता है कि सुप्रीम कोर्ट को स्पीकर पर विश्वास नहीं था.

ऐसा शायद पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट ने कुछ घंटों के लिए राष्ट्रपति शासन हटाए जाने की सिफारिश की है और फिर उसे बहाल कर दिया. आपको इस बारे में क्या लगता है?

पहली बार राष्ट्रपति शासन को लगाए जाने और हटाए जाने का मामला राष्ट्रपति के क्षेत्राधिकार में आता है. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में बस उसके मेरिट पर विचार कर सकता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाते हुए 2-3 घंटे के लिए राष्ट्रपति शासन हटाया. सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति शासन को अवैध घोषित कर सकता था लेकिन वह इसे थोड़े समय के लिए हटाकर फिर से लागू नहीं कर सकता. यह संविधान के प्रावधान में शामिल नहीं है.

इस मामले में हर कोई अजीब बर्ताव कर रहा है. अगर सरकार को सदन का विश्वास मत मिल गया तो फिर से राष्ट्रपति शासन लगाने का कोई मतलब नहीं था.

सुप्रीम कोर्ट और किन विकल्पों पर विचार कर सकता था?

सबसे बेहतर यह होता कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति शासन के मामले की मेरिट पर विचार करता. बोम्मई केस के मुताबिक जब राष्ट्र्रपति शासन को खारिज किया जाता है तो सरकार अपने आप बहाल हो जाती है. इस मामले में फिर शक्ति परीक्षण का कोई मतलब नहीं रह जाता है. अब इस मसले में भ्रम की स्थिति बन गई है. 

First published: 16 May 2016, 8:05 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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