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शहाबुद्दीन से साक्षात्कार: एक शहर-दो अफसाने, वाया डॉन का गांधीवाद

व्यालोक | Updated on: 16 September 2016, 8:00 IST
QUICK PILL
  • धूल भरी सीढ़ियों को पार कर हम देखते हैं, सफेद सोफे पर बैठा हुआ शहाबुद्दीन लोगों की भीड़ से घिरा हुआ है. हमारे मित्र टिप्पणी करते हैं, सर इन लोगों की शक्ल में हमें भेड़-बकरियां दिखती हैं, जो अपने क़ातिल को ही मसीहा समझने की गलती कर रहे हैं.
  • वह खुद हम लोगों से पूछते हैं कि ‘परिस्थितयों के मुख्यमंत्री’ का मतलब क्या है? वह मोरारजी भाई के प्रधानमंत्री बनने का हवाला देते हुए और उसे जोड़ते हुए कहते हैं कि भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन बना, यह परिस्थिति थी और नीतीश उसके नेता बने, यह तथ्य है, तो फिर नीतीश परिस्थितियों के मुख्यमंत्री हुए कि नहीं?

सीवान शहर में घुसने के दो किलोमीटर पहले ही एक तोरणद्वार हमें दिखता है, जिसके ज़रिए मोहम्मद शहाबुद्दीन का स्वागत सीवान की जनता करती दिखती है. हमारी गाड़ी के साथ-साथ वह तोरणद्वार भी पीछे छूटता जाता है, लेकिन आगे बढ़ने पर वैसे और भी कई तोरण हमें दिखते हैं. सीवान शहर में घुसने पर शहाबुद्दीन भी सीवान की जनता को ईद की मुबारकबाद देते और शुभकामनाएं बांटते दिखते हैं.

हमारी मंज़िल बड़रडीहा बस स्टैंड है, जहां चंदा बाबू उर्फ चंद्रकेश्वर प्रसाद मिलेंगे. शहाबुद्दीन के आतंक और अत्याचार के प्रतीक. वह आदमी, जिसके तीन जवान बेटों को दर्दनाक तरीके से मारने का आरोप शहाबुद्दीन पर है, जिसमें उम्र कैद की सज़ा भी हुई और फिर जमानत भी. बिहार सरकार पर जान-बूझकर शहाबुद्दीन को जमानत दिलवाने का आरोप है, पर वह विषयांतर है.

हम बड़रडीहा बस-स्टैंड के पास पहुंचे, सीवान की हवा में एक अजीब सी खामोशी घुली है. बकरीद का दिन है, सारी दुकानें बंद हैं. हमारे साथ के पत्रकार मित्र कहते हैं, ‘रऊफ साइकिल वाले की दुकान का बंद होना तो समझ में आता है सर, लेकिन विंध्यवासिनी टेलीकॉम या शारदा बुक-स्टोर क्यों बंद हैं, समझ नहीं आता?’ उनके इस निरीक्षण पर भी मैं टिप्पणी नहीं करता. लेखक दरअसल अपने गांव, अपने घर को महसूसने की कोशिश करता है, पर वह उसे नहीं मिलता.

चंदा बाबू मीडिया की मेहरबानी से काफी मशहूर हैं. बड़रडीहा बस-स्टैंड पर पहुंचते ही हमें लोग उनके मकान की ओर इंगित कर देते हैं. वहां मकान भी है और दुकान भी. हम दुकान में पहुंचते हैं, तो एक 70 वर्षीय वृद्ध को कुर्सी में धंसा देखते हैं. खिचड़ी दाढ़ी, हल्के दाम वाला चश्मा और एक लुंगी के ऊपर सस्ती मटमैली सी गंजी.

चेहरे पर मुझे दो रेखाओं का आभास होता है, जो शायद लगातार आंसू बहाने की वजह से स्थायी निशान से बन गए हैं. बगल में छोटे कद का उनका बेटा खड़ा है, श्यामवर्ण पर तीखे फीचर वाला. दाढ़ी और तिलक से लैस. जितनी बड़ी त्रासदी से गुजरा है, उसका निशान कम से कम चेहरे पर नहीं है.

चंदा बाबू से बात करते हुए हम उसी प्रश्न से दो-चार होते हैं, जो हमने पटना से अपने सफर की शुरुआत में ही खुद से पूछा था कि आखिर उनसे बात क्या की जाए? साहस जुटा कर हम उनसे उनकी वर्तमान हालत पर बातचीत शुरू करते हैं. बोलने के क्रम में हरेक तीसरे वाक्य के बाद उनकी आंखें डबडबा जाती हैं, वह कुछ बोलने में असमर्थ से हो जाते हैं. तब, उनका बेटा उनकी मदद करता है.

चंदा बाबू अपने चौथे बेटे की सुरक्षा को लेकर सर्वाधिक चिंतित हैं. वह कहते हैं कि शहाबुद्दीन के खौफ से पूरे सीवान में कोई भी उनके साथ नहीं रहना या दिखना चाहता है. हालांकि, वह अंतिम सांस तक सीवान न छोड़ने और लड़ते जाने की भी बात करते हैं, लेकिन अपनी अवस्था, पत्नी की बीमारी, बेटे की विकलांगता और आर्थिक असमर्थता के आगे खुद की लाचारी भी बताते हैं.

चंदा बाबू अपने चौथे बेटे को लेकर चिंतित हैं. कहते हैं कि शहाबुद्दीन के खौफ से सीवान में कोई उनके साथ नहीं होता

चंदा बाबू के उसी दुकान में छह दुकानें भी हैं. उन्हीं से किराया आता है, महीने का लगभग 10 हजार रुपया. एक दुकान चंदा बाबू के बेटे ने भी बनायी है, दुकान आधी खाली है क्योंकि माल मंगाने का पैसा नहीं है. हम बगल के कमरे में जाते हैं. चंदा बाबू की पत्नी लेटी हुई हैं- लकवा से पीड़ित थीं, अभी थोड़ी सी ठीक हुई हैं.

हमे देखते ही रोती हैं, चंदा बाबू उन्हें चुप कराते हैं, सुबकते हुए वह हमारी ओर पीठ कर सो जाती हैं. शून्य में निर्निमेष, अपलक देखती आंखें उन दो-चार पलों में ही हमसे मानो सदियों के अत्याचार की दास्तान कह जाती हैं.

चंदा बाबू रोते हुए, संभलते हुए एक संदेश देते हैं, राज्य की जनता के नाम. कम से कम इस राज्य के लोग अपराध और अपराध के राजनीतिकरण के खिलाफ खड़े हों, शहाबुद्दीन का नाम लेते हुए वह कहते हैं कि उसकी जगह विधानसभा नहीं, फांसी का फंदा है. हम स्तब्धता और मूकता में उनसे विदा लेते हैं- ठस दिमाग, सुन्न संवेदना के साथ!

इन द डेन ऑफ डॉन

हमारी अगली मंजिल सीधा ‘इन द डेन ऑफ डॉन’ है. प्रतापपुर, जहां सीवान के ‘साहेब’ शहाबुद्दीन रहते हैं. लंबी पेंचदार गलियों से लगभग सीवान से पांच किलोमीटर दूर हम निकल आते हैं. 

दूर-दूर तक खेत, सड़क की चौड़ाई इतनी ही जिसमें दो कार आमने-सामने आ जाएं, तो दिक्कत से निकल सकें. सड़क अमूमन पक्की है, पर शहाबुद्दीन के 13 साल जेल में रहने का असर उस पर भी पड़ा है. गड्ढे और कीचड़ जगह-जगह नमूदार हो रहे हैं.

घर के 500 मीटर पहले ही हमें पता चलने लगता है कि ‘डॉन’ का दुर्ग आनेवाला है. उनका ही एक आदमी हमारे दोस्त को बता चुका है कि ‘साहेब’ अभी सो रहे हैं. बहरहाल, घर के आगे बकरीद की तैयारियां ज़ोरों पर है. ‘साहेब’ के समर्थकों की भीड़ बाहर प्लास्टिक की कुर्सियों पर पसरी हुई है. 

कुछ लोग बिरयानी की प्लेट पर जमे हुए हैं, झक्क सफेद कुर्तों और कड़क काले शर्ट की नुमाइश ज़ोरों पर है. भीड़ निचली मंजिल से लेकर ऊपरी मंजिल तक है, जिसको चीरते हुए हम आखिर में उस आदमी के सामने पहुंचते हैं जिसकी क्रूरता और नृशंसता के किस्से आज तक हमने केवल सुने और पढ़े हैं.

धूल भरी सीढ़ियों को पार कर हम देखते हैं, सफेद सोफे पर बैठा हुआ शहाबुद्दीन लोगों की भीड़ से घिरा हुआ है. हमारे मित्र टिप्पणी करते हैं, सर इन लोगों की शक्ल में हमें भेड़-बकरियां दिखती हैं, जो अपने क़ातिल को ही मसीहा समझने की गलती कर रहे हैं.

शहाबुद्दीन थोड़ा थका, थोड़ा उनींदा दिखता है. शायद, तुरंत सोकर उठने का असर है. हम सामनेवाले सोफे पर बैठ जाते हैं, डॉन की बेधक आंखें हमें अंदर तक चीरने की कोशिश करती हैं, हमारा जायजा लेती हैं, उसका हरेक वाक्य मानों उपहास सा उड़ाता प्रतीत होता है. प्रचलित आख्यानों के विपरीत अब समझ में आता है कि हमारे कुछ मित्र इस डॉन के मुरीद क्यों हो गए हैं? डॉन की सम्मोहक आंखें, एनिग्मैटिक व्यक्तित्व और दूसरे को कमज़ोर कर देनेवाली मुस्कुराहट झेलने के लिए सचमुच कलेजा चाहिए.

डॉन से आप कुछ भी पूछिए, वह मुद्दा नहीं बनने देता है. उसके लिए अब गांधीवाद ही असल राह है. उसे लड़ाई में ‘हिंसा’ की बू आती है, सीवान की जनता ही ‘उसके लोग’ हैं, सीवान ही उसका घर और लालू प्रसाद उसके नेता.

नीतीश पर दिए बयान को वह एक बार और पूरे जोर से दुहराता है, हमीं से लोकतंत्र के मायने और जनादेश का अर्थ पूछता है. वह जो भी कहता है, पूरी प्रतिबद्धता और जोर से कहता है.

आगे की योजना और परिवर्तन पर

अपनी राजनीतिक और सामाजिक योजना पर शहाबुद्दीन का कहना है कि वह पहले की तरह सीवान में ही रहेंगे. वह कहते हैं कि सीवान की जनता ही उनके लोग हैं और यह तो हमको (पत्रकारों) को तय करना है कि सीवान में उनकी अनुपस्थिति के दौरान क्या परिवर्तन आए हैं. 

वह कहते हैं कि लोगों की दीवार ने उनको घेर रखा है. “पिछले चार दिनों से तो मैं निकल नहीं पाया हूं, सोचता हूं कि अगले दो-तीन दिनों में शायद यह दीवार कुछ कमज़ोर हो, तो मैं बाहर निकल कर जायजा लूंगा. अभी तो मैं सीवान भी नहीं जा पाया हूं.”

डॉन की गांधीगीरी

शहाबुद्दीन को अब ‘लड़ाई’ शब्द में ‘हिंसा’ की बू आती है. हमारे पूछने पर कि क्या वह सीवान की जनता के मुद्दों पर लड़ते रहेंगे, वह बड़े रहस्यमय अंदाज़ में मुस्कुराते हुए उल्टा हमीं से सवाल पूछते हैं- आपको लड़ाई शब्द में हिंसा की बू नहीं आती. लड़ाई क्यों करेंगे? संगठन करेंगे, संगठित बनेंगे, दल का काम करेंगे. बातों के इस दार्शनिक अंदाज़ पर उनके चारों तरफ बैठे सममर्थक हंसते हैं. हम सोचते हैं कि शहाबुद्दीन का यह अंदाज़ कितना सही है, कितना झूठ?

नीतीश पर दिए गए बयान पर

क्या सीएम नीतीश कुमार पर दिए गए बयान को संशोधित करना चाहेंगे, बदलना चाहेंगे? वह समझाने के अंदाज़ में कहते हैं कि पिछले दो दिन से वह अपने बयान को बार-बार समझा रहे हैं, हालांकि समझाने का मतलब यह नहीं है कि वह अपने बयान से कहीं मुकर रहे हैं. 

वह खुद हम लोगों से पूछते हैं कि ‘परिस्थितयों के मुख्यमंत्री’ का मतलब क्या है? वह मोरारजी भाई के प्रधानमंत्री बनने का हवाला देते हुए और उसे जोड़ते हुए कहते हैं कि भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन बना, यह परिस्थिति थी और नीतीश उसके नेता बने, यह तथ्य है, तो फिर नीतीश परिस्थितियों के मुख्यमंत्री हुए कि नहीं?

लालू से बात हुई है कि नहीं?

इस पर वह उल्टा सवाल दागते हैं कि जरूरत ही क्या है? आगे फिल्मी अंदाज़ में वह बोलते हैं, ‘भरोसे के रिश्तों में शब्दों की ज़रूरत या अहमियत नहीं होती.’ जरूरत क्या है, उनसे बात करने की? लालू यादव और शहाबुद्दीन का रिश्ता तो 27 वर्षों का है. वह मुझे जानते हैं, मैं उनको पहचानता हूं.

भविष्य में तेजस्वी को अपने नेता के तौर पर स्वीकारने के सवाल को शहाबुद्दीन गोल-गोल घुमा देते हैं. हां, वह यह जरूर कहते हैं कि तेजस्वी एक परिपक्व नेता के तौर पर उभर रहे हैं. हां, तेजप्रताप का कोई बयान उन्होंने नहीं देखा है, इसलिए कुछ कह नहीं सकता.

भविष्य में तेजस्वी को अपने नेता के तौर पर स्वीकारने के सवाल को शहाबुद्दीन गोल-गोल घुमा देते हैं.

हम लोग धन्यवाद देते हुए उठने को होते हैं, तो डॉन जबर्दस्ती हमें मिठाई खिलवाते हैं, ईद की बधाई देते हैं और हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं.

वे हमारे दोस्त से खुलकर पूछ भी देते हैं, ‘आप कहीं डरे हुए तो नहीं हैं?’ हम उस वक्त भले ही नकार में सिर हिला देते हैं, पर जब हम सीवान के सीमांत से निकलने को होते हैं, तो भी पीछे मुड़-मुड़कर देखते हैं कि कोई गाड़ी तो पीछा नहीं कर रही है.

डॉन का हृदय परिवर्तन सच्चा है या झूठा, उसका गांधीवाद एक हत्यारे का ओढ़ा हुआ नक़ाब है या सच्चा बदलाव, हम इन्हीं सब सोच-विचारों में डूबते-उतराते पटना की ओर चल देते हैं.

शाम का अंधेरा भी घिर रहा है और हमारे दिल में भी गहरी उदासी पसर रही है.

First published: 16 September 2016, 8:00 IST
 
व्यालोक @catchhindi

आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई करके 13 सालों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता की. अब स्वतंत्र पत्रकारिता और बागवानी करते हैं.

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