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पटियाला कोर्ट हिंसा: वकीलों की हिंसा के सामने कानून असहाय

सौरव दत्ता | Updated on: 27 February 2016, 14:08 IST

17 फरवरी को कुछ वकीलों ने बेशर्मी से पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में उत्पात मचाया. जनता के बीच इस घटना को लेकर भारी प्रतिक्रिया हुई. वकीलों न सिर्फ पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों को पीटा बल्कि दो दिन बाद जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के साथ भी पेशी के दौरान मारपीट की.

हिंसा करने वाले वकीलों के खिलाफ धारा 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र) और धारा 323 (हत्या की कोशिश) जैसी आपराधिक धाराएं लगाई हैं. हालांकि, पुलिस पर जानबूझकर 'गुंडा' वकीलों पर नरमी बरतने का आरोप भी लग रहा है.

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली पुलिस पर तीखी निंदात्मक टिप्पणी की है, जिसमें पुलिसवालों द्वारा 'कर्तव्य की गंभीर उपेक्षा' का संकेत है.

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हालांकि, जहां तक धरातल पर कानून की बात है, पुलिस के हाथ बंधे हुए हैं. कानूनी रूप से बात करें तो यदि पुलिस हिंसक वकीलों के खिलाफ गंभीर और मजबूत चार्ज लगाती तो उन्हें अदालत में साबित करना उतना ही कठिन होगा.

खुद ही दंड देने की जल्दबाजी

वकीलों की अगुवाई विक्रम सिंह चौहान द्वारा की जा रही थी, जो अपनी बात पर दृढ़ता से जमे हुए कह रहा था, 'देशद्रोहियों को सबक सिखाना ही होगा.' साथ ही वह कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को खुलेआम खुद के और अपने साथियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की चुनौती दे रहा था.

हिंसा करने वाले वकीलों के खिलाफ धारा आपराधिक षड्यंत्र और हत्या की कोशिश जैसी आपराधिक धाराएं लगाई हैं

सिर्फ इतना ही नहीं दिल्ली बार काउंसिल के एक पूर्व चेयरपर्सन ने भी खुलेआम कहा कि जो गतिविधियां 'राष्ट्र-विरोधी' महसूस होती हैं, उनके खिलाफ 'कार्रवाई' करना वकीलों की जिम्मेदारी है.

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चौहान और उसके साथी वकीलों ने कन्हैया के बचाव पक्ष के वकीलों को बुरी तरह धमकाया है और जान से मारने की धमकी भी दी है.

कन्हैया के वकीलों ने इस डर के कारण मामले की सुनवाई पटियाला हाउस कोर्ट की बजाय दूसरी कोर्ट में करने की मांग की थी. यह माना जा सकता है कि ये धमकियां खोखली नहीं थीं.

लेकिन क्या इसका यह अर्थ है कि हमलावरों के खिलाफ पुलिस हत्या की कोशिश जैसे आरोप लगा सकती है?

कानूनी व्यवधान

कानून के विशेषज्ञाें पर भरोसा करें तो पुलिस ऐसा नहीं कर सकती. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी कहते हैं कि आरोप जितने कठोर होंगे, अदालत में उन्हें साबित करना उतना ही मुश्किल होगा.

वे वकीलों की करतूत को 'दुःखद' बताकर कड़ी निंदा करते हैं लेकिन उन्हें यह भी यकीन है कि हत्या की कोशिश जैसा आरोप अदालत में आसानी से ध्वस्त हो जाएगा.

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सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगडे भी कुछ ऐसे ही विचार रखते हैं. हेगड़े कहते हैं, 'आपराधिक कानून को न तो 'राष्ट्रवादी विचारधारा' से प्रभावित वकीलों से सही ढंग से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है और न ही ये इतना सशक्त है. पुलिस ने अपनी कानूनी सीमा में रहते हुए यह कार्रवाई की है. कन्हैया के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से  बचाव एवं सुरक्षा उपलब्ध कराने और मुकदमे की निष्पक्ष गुहार लगाई गई थी लेकिन कोर्ट ऐसा करने में असफल रही.'

आपराधिक अवमानना?

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देशित करते हुए एक विस्तृत आदेश जारी किया, जिसमें सभी असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा गया था, भले ही उनमें से कुछ लोग वकीलों के गाउन में क्यों न रहे हों.

आरोप जितने कठोर होंगे, अदालत में उन्हें साबित करना उतना ही मुश्किल होगा: केटीएस तुलसी

लेकिन यह बहस का मुद्दा है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी वकीलों के खिलाफ आपराधिक अवमानना के आरोप क्यों नहीं लगाए?

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शुद्ध रूप से कानूनी शब्दों पर जाए तो अदालत की अवमानना कानून की धारा 14(1) के तहत यदि कोई 'न्याय के मार्ग में किसी तरह की बाधा उत्पन्न करता है' तो वह आपराधिक अवमानना का जवाबदेह हो जाता है.

हालांकि वकीलों ने निःसंदेह पत्रकारों और कन्हैया को अदालत परिसर के बिल्कुल पास ही पीटा था. चौहान और उसके साथियों ने वास्तव में भय का वातावरण बनाने का काम किया. इससे संभवतः कन्हैया की न्याय तक पहुंच को खतरा हो सकता है. इसलिए वकीलों के खिलाफ आपराधिक अवमानना का दोष लगाया जा सकता है.

हाल के दिनों में, न्यायपालिका ने आपराधिक अवमानना कानून को दोधारी तलवार की तरह उपयोग किया है. बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले की आलोचना करते हुए एक मैगजीन में लेख लिखने वाली बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति राय के खिलाफ इसका प्रयोग किया गया था.

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कन्हैया के मामले में ऐसा करने से सुप्रीम कोर्ट को किस चीज ने रोका? कैच से बात करने वाले कोई भी वकील (यहां तक कि कन्हैया के बचाव पक्ष की टीम के वकील भी) कोई स्पष्ट अभिमत या सही-सही अनुमान लगाने में भी असमर्थ दिखा. इसी हफ्ते होने वाली कन्हैया की जमानत की सुनवाई के डर से कोई भी प्रतिकूल टिप्पणी नहीं करना चाहता.

अनाड़ी बार काउंसिल

अधिवक्ता कानून और इसके अंर्तगत बने नियमों (जो भारत में कानून व्यवसाय को शासित करते हैं) के तहत स्टेट बार काउंसिल के पास उन वकीलों पर अनुशासनात्मक (सिविल लॉ) कार्रवाई का अधिकार है, जो संभवतः अवैधानिक तरीके से काम करते हैं.

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जिस दिल्ली बार काउंसिल के साथ चौहान और अन्य हिंसा करने वाले वकील संबद्ध हैं उसने इनके खिलाफ अब तक कोई कदम नहीं उठाया है.

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इस मसले पर दिल्ली बार काउंसिल के अध्यक्ष और अतिरिक्त महाधिवक्ता मनिंदर सिंह ने आधिकारिक रूप से बोलने से मना कर दिया. बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि हिंसा वाला कदम 'गलत' था, लेकिन वे पूरी तरह सुनिश्चित हैं कि पुलिस कठोर आरोप नहीं थोप सकती थी.

इतना ही नहीं उन्होंने 'सूली पर टंगने तक राष्ट्रभक्ति करने वाले' वकीलों पर 'प्रहार' के लिए मीडिया की भी आलोचना की.

असहाय होने का भाव

वकीलों की हिंसा कोई नई बात नहीं है. पिछले साल अक्टूबर में भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सात जजों की बेंच ने तोड़फोड़ और आगजनी जैसी घटनाओं में शामिल प्रदर्शनकारी वकीलों के खिलाफ कटु आलोचना वाला आदेश पारित किया था.

सितंबर, 2015 में मद्रास उच्च न्यायालय ने मजबूरन केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) को निर्देश दिया था कि अदालत परिसर को उन वकीलों से सुरक्षा दी जाए, जो दंगों का सहारा ले रहे थे.

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पटियाला हाउस कोर्ट में हुई हिंसा पर दिल्ली पुलिस और अधिवक्ता एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट जमा कर दी है. मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च काे निर्धारित की गई है.

अतिरिक्त महाधिवक्ता रणजीत कुमार ने कोर्ट से ऐसा कोई राय न बनाने का निवेदन किया है, जिससे कन्हैया के केस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े. अदालत इससे सहमत हो गई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह कन्हैया का केस नहीं देख रही है, बल्कि वह सिर्फ हिंसा को लेकर चिंतित है.

पूरे मामले में उत्पाती वकीलों के खिलाफ कानून जो कर सकता था, उसकी तुलना में बहुत कम किया गया है.

First published: 27 February 2016, 14:08 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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