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भारतीय कानून पनामा लीक पेपर्स पर कार्रवाई करने में सक्षम ही नहीं हैं!

सौरव दत्ता | Updated on: 6 April 2016, 8:49 IST
QUICK PILL
  • पनामा पेपर्स लीक के मुताबिक कई भारतीयों की विदेश में अवैध कंपनियां, शेयर और हिस्सेदारी है. भारत सरकार ने मामले की जांच के लिए एक संयुक्त जांच दल बनाने की घोषणा की. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि किसी को बख्शा नहीं जाएगा.
  • कालेधन के मामले में भारत सरकार के पुराने स्टैंड को देखते हुए इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि इस मामले में किसी पर ठोस कार्रवाई हो पाएगी.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में बुधवार को छपी विस्फोटक खबर के अनुसार कई जाने-माने भारतीय पनामा में स्थित फर्जी कंपनियों के शेयर धारक या बोर्ड सदस्य हैं.

पनामा को करचोरों के स्वर्ग माने जाने वाले देशों में गिना जाता है. एक्सप्रेस की इस खोजी खबर की दूसरी कड़ी गुरुवार को प्रकाशित हुई. और अभी ये सिरीज जारी है यानी शुक्रवार को भी अखबार इससे जुड़ी कुछ जानकारी प्रकाशित करेगा.

इस खबर के बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं. जिनपर हम एक एक कर विचार करेंगे.

एक, कर चोरी और कर प्रबंधन में क्या फर्क है? ये अंतर समझना जरूरी है क्योंकि कर चोरी अपराध है लेकिन कर प्रबंधन नहीं.

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दो, क्या भारतीय कानून ऐसे आरोपियों के दोषी पाए जाने के बाद सजा दिलाने में सक्षम है. असल में ये दोनों ही सवाल आपस में जुड़े हुए हैं.

पहले ये जान लें कि अभी किसी भी व्यक्ति पर आरोप सिद्ध नहीं हुआ है. काले धन की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए विशेष जांच दल(एसआईटी) के प्रमुख सेवानिवृत्त जज अरिजीत पसायत भी यही मानते हैं.

कर चोरी या कर प्रबंधन?


पहली नजर में खबर पढ़ने से यही लगता है कि जिन लोगों का नाम इस सूची में है वो विदेशों में कालाधन रखने के दोषी हैं. लेकिन जनभावनाओं और कानून की दृष्टि में अंतर होता है. किसी भी हालत में अंतिम तौर पर कानून की राय का ही महत्व है क्योंकि वो किसी मामले पर भावना के बजाय संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार विचार करता है.

इस मामले को समझने में सुुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए कुछ पुराने फैसले कारगर साबित हो सकते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार भारत के कई चर्चित हस्तियों की विदेश में फर्जी कंपनियां

1985 के मैकडॉवेल मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने वैधानिक और कानूनी के बीच फर्क स्पष्ट करने की कोशिश की थी. इस फैसले में कोर्ट ने कर से बचने और कर चोरी के बीच अंतर किया था. संविधान पीठ ने बहुमत से कर से बचने को अपराध नहीं माना था.

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उस फैसले में जस्टिस ओपी चिनप्पा अल्पमत में थे. चिनप्पा ने अपने अल्पमत के फैसले में लिखा था, "अब हम एक कल्याणकारी राज्य में रहते हैं जिसकी कानूनी जरूरतों का हमें सम्मान करना चाहिए और उन्हें पूरा करना चाहिए. हमें ये स्वीकार करना चाहिए कि कर कानून का दूसरे जनकल्याणपरक कानूनों की तरह नैतिक आधार होता है. ये कहना दिखावा करना होगा कि कर से बचना उतना ही नैतिक है जितना ईमानदारी से कर चुकाना...."

कर प्रबंधन का विचार ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर सिद्धांत पर आधारित है. इसके अनुसार हर व्यक्ति को कर बचाने की कोशिश करने का पूरा अधिकार है. जस्टिस चिनप्पा ने अपने अल्पमत के फैसले में साफ किया था कि खुद ब्रिटेन में इस सिद्धांत को दफन किया जा चुका है. कोई भी व्यक्ति अब ये कहकर नहीं बच सकता कि कर चुकाने से बचने की कोशिश में कुछ भी गैर-कानूनी नहीं है.

एक्सप्रेस की खबर में जिन भी लोगों का नाम आया वो सभी कर से बचने की कोशिश करते प्रतीत होते हैं. कानून के विद्वानों ने 'कल्याणकारी राज्य' की व्याख्या की है. जिसके अनुसार भारत की सर्वोच्च अदालत न्यायिक रूप से इससे बचती नजर आती है.

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साल 2012 के वोडाफोन मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच के ज्यादातर जजों ने इस बात का पक्ष लिया कि देश में 'निवेश का माहौल' की रक्षा करने की जरूरत है. भारत की सबसे बड़ी अदालत इस मामले में कानन के ऊपर कारोबारी निवेश
को तरजीह देती प्रतीत हुई. अदालत के इस फैसले की कानून के कई जानकारों ने आलोचना की थी. अदालत ने 'निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए' कर कानूनों की अनदेखी को एक तरह से मंजूरी दे दी.

खोखले वादे?


भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मामले की जांच के लिए एक विशेष टीम बनायी है. लेकिन क्या इस मामल में किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद की जा सकती है?

प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मामले की जांच के लिए सीबीडीटी और दूसरे एजेंसियों को मिलाकर एक टीम बनाने की घोषणा की है. ये टीम 'खोजी रिपोर्ट' में लगाए गए आरोपों की जांच करेगी.

पनामा पेपर्स मामले में अरुण जेटली की कार्रवाई का आश्वासन सरकार का महज अपना चेहरा बचाने की कोशिश है

कानूनी स्थिति को देखते हुए ये फैसला केवल चेहरा बचाने की कोशिश प्रतीत हो रहा है क्योंकि उनके सत्ता में लाने में 'कालाधन' वापस लेने का वादे ने अहम भूमिका निभायी थी.

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मोदी सरकार पहले ही कालेधन के मामले में सर्वोच्च अदालत में कह चुकी है कि वो संबंधित देशों को सभी कथित खाताधारकों से जुड़ी जानकारी पा सकती है, न ही अखबारों में छपी खबरों के आधार पर मुकदमा चला सकती है. क्योंकि उसने डबल टैक्सेशन अवायडेंस एग्रीमेंट(डीटीएए) पर समझौता कर रखा है.

इसलिए सरकार भले ही कहे कि उसके लिए कोई भी 'पवित्र गाय' नहीं है, इस मामले में क्या कार्रवाई होगी ये वक्त ही बताएगा.

First published: 6 April 2016, 8:49 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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