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गंवई भारत: इस दुनिया में सबकुछ ठहर गया है

अतुल चौरसिया | Updated on: 17 November 2016, 7:35 IST
QUICK PILL
  • नोटबंदी में हालात सामान्य करने के लिए केंद्र सरकार कितने भी इंतज़ाम कर ले मगर ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. 
  • गांवों में ज़िंदगियां चुपचाप गुज़र-बसर कर रही हैं लेकिन भीतर से उनकी सभी योजनाएं हिल गई हैं.

तमाम बैंकिंग व्यवस्था के विस्तार के बावजूद ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आज भी स्थानीय साहुकार-महाजनों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है. एक बड़ा तबका आज भी आसानी से उपलब्ध होने वाली रकम के मोह में इनसे लेनदेन करता है. बदले में अपने सोने-चांदी के गहने आदि उनके यहां रेहन पर रख देता है.

1000 और 500 के नोटों को बंद करने के फैसले के बाद बड़े शहरों से दूर गांवों की अर्थव्यवस्था में एक अनिश्चित सा ठहराव आ गया है. आजमगढ़ जिले के सरायमीर कस्बे में रहने वाले एक व्यवसायी जिनका कई पीढ़ियों से सूद-ब्याज का कारोबार है. 

अपना नाम न छापने की शर्त पर वो बताते हैं, 'बीते चार दिन में एक भी रुपए का लेनदेन नहीं हुआ है. किसी को पैसा देने के लिए नोट ही नहीं है. लोग इस उम्मीद में गहना-जेवर लेकर आते हैं कि उन्हें छोटे नोट मिल जाएंगे पर हमारे पास पहले से ही 1000-500 के नोट इतने ज्यादा हैं कि उन्हें निपटाना मुसीबत हो गई है.'

नोट बदलने के लिए लगी एक लाइन (फेसबुक)

कारगर गंवई व्यवस्था

गंवई व्यवस्था में सूद-ब्याज वाले साहूकार उस ईंधन की तरह है जिनके भरोसे सीमांत किसान, दिहाड़ी मजदूर, बेलदार आदि की गाड़ी गिरते-पड़ते चलती रहती है. शादी ब्याह से लेकर सत्यनारायण भगवान की कथा कराने तक इनकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहती है. हमारे देश में ऐसी सुचारू बैंकिंग प्रणाली भी तक विकसित नहीं हो पायी है जो जरूरतमंदों को मौके-बेमौके उधार मुहैया करवा सके. इसके मुकाबले स्थानीय महाजन ज्यादा सुलभ विकल्प हैं.

65 वर्षीय रामरती 11 तारीख को अपनी बेटी शादी के लिए कुछ पैसे की उम्मीद लिए अपने हाथों का चांदी का कड़ा और सोने की एक अंगूठी लेकर गिरवी रखने पहुंची थी. उन्हें सरायमीर बाजार पहुंच कर पता चला कि महाजन की दुकान पिछले दो दिनों से बंद चल रही है. रामरती को यह भरोसा करना मुश्किल हो रहा था कि सोना-चांदी भी अब किसी काम का नहीं है. यह उन्हीं साहूकार की बात है जिनका जिक्र ऊपर आ चुका है.

जिस पैसे को लोगों ने सहेज कर रखा था वो कागज हो गया, जो पैसा चल रहा है उसे भी बचा लेने की सोच हावी हो गई है

महादेव यादव का जिक्र भी जरूरी है. यादव सरायमीर बाजार के पास ही के गांव से रोज सुबह दही बेचने के लिए आते हैं. सिर पर दौरी में एक मटका दही रखे वो बाजार की गली-गली में दही बेचते हैं. उनकी स्थिति भी गड़बड़ा गई आम दिनों में वो सुबह छह बजे से नौ बजे तक दो-ढाई सौ रूपए की दही बेचकर वापस गांव लौट जाते थे. लेकिन जब से नोटों की किल्लत हुई है लोगों ने उनसे दही खरीदना बंद कर दिया है. उनके मुताबिक 40-50 रुपए की दही भी वे नहीं बेच पाते. लोग दही खरीदें की पैसा बचाएं.लोगों की स्थिति सांप-छछूंदर वाली हो गई है. जिस पैसे को लोगों ने जतन से काट-कपट कर रखा था वो किसी काम का नहीं रहा, जो थोड़ा बहुत पैसा चल रहा है उसे भी बचा कर रखने की सोच हावी हो गई है. लिहाजा लेनदेन बंद है.

मेलों से रौनक गायब

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने में वहां हर साल महीने, हफ्ते में लगने वाले मेला, हाट बाजारों की बड़ी भूमिका होती है. आजमगढ़ जिले में नवंबर-दिसंबर के महीने में दो ऐतिहासिक मेले लगते हैं. इन मेलों से स्थानीय अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह तेजी से बढ़ता है. लेकिन मौजूदा समय में नगद धन ही नहीं बचा है किसी के पास, जिसके पास है भी वह बचाकर आने वाले अनिश्चित समय के लिए रख लेना चाहता है.

दुर्बासा आश्रम का ऐतिहासिक मेला तीन दिन चलता है. 14 नवंबर को शुरू होकर 16 नवंबर को यह मेला समाप्त हो गया बिना किसी हो-हल्ले के. आमदिनों में आस-पास के बड़े इलाके में इस मेले की चर्चा रहती है. इलाके का हर रहवासी तीन में से एक न एक दिन इसमें जरूर हो आता है. इस बार न तो दूर-दराज के दुकानदार आए न दरंभगा की नौटंकी कंपनियां. दिन में खरीददारी और रात में नौटंकी का मनोरंजन इस बार मेले से गायब रहा.

आजमगढ़ जिले के गोविंद साहब में लगने वाले मेले की प्रतिष्ठा इससे भी ज्यादा है. यह मेला कार्तिक महीने में लगातार 15 दिनों तक चलता है. इसके लिए देश के दूर-दराज के इलाकों से दुकानदार करीब महीना भर पहले से अपने टेंट आदि गाड़कर जगह घेर लेते हैं. इनमें बुलंदशहर के खजला बनाने वालों से लेकर दरभंगा की नौटंकी कंपनियां तक शामिल है.

इसके अलावा मेले में पशुओं का बड़ा बाजार लगता है जिसमें गाय, भैंस, भेंड़ बकरी के अलावा अच्छी नस्ल के घोड़ों का भी कारोबार होता है. अमूमन ये व्यापारी महीने भर पहले से मेले में अपना स्थान घेर लेते हैं. लेकिन इस बार मेला मैदान अभी तक सूना पड़ा है.

खुर्जा बुलंदशहर इलाके से वहां जाकर खजला की सबसे बड़ी दुकान चलाने वाले प्रसिद्ध व्यापारी पन्नालाल-सुभाषचंद्र खजला वाले का टेंट अभी तक नहीं लगा है. स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा का विषय है. इलाके के नेता और समाजवादी युवजन सभा के प्रदेश सचिव सचिन जायसवाल बताते हैं, 'अब तक मेले में बाहरी दुकानदार और पशु व्यापारी नहीं पहुंचे हैं. यह मेला नौ दिसंबर से शुरू होना है. लेकिन नोटबंदी के कारण ऐसा लगने लगा है कि मेला इस बार नाममात्र का रहेगा.'

लेनदेन ठप

स्थानीय बाजारों में भी व्यापारियों ने लेनदेन पूरी तरह से बंद कर रखा है. इसकी एक बड़ी वजह लोगों के पास पर्याप्त मात्रा में छोटी नोटों का न होना है. उससे भी ज्यादा भूमिका सुपरसोनिक गति से भागती अफवाहों ने निभाई है.

मसलन नमक को लेकर अफवाह फैली तो लोगों ने 40 से लेकर 400 रुपए किलो तक नमक खरीदा. इसके बाद अफवाह चली कि सरकार एक तरफ से उन व्यापारियों पर इन्कम टैक्स का छापा मार रही है जिन्होंने नमक या सोना ऊंची कीमतों पर बेचा. कुछ जगहों से इन्कम टैक्स के छापे की खबरें भी आई. इस अफरा-तफरी के माहौल में ज्यादातर व्यापारियों ने अपने दुकान बंद करने का पैसला कर लिया है. प्रधानमंत्री की घोषणा के चार दिन बाद तक स्थिति में कोई सुधार नहीं है.

बैंकों में स्टाफ नहीं

बैंकों से ग्रामीणों को मिलने वाले पैसे की गति वही है जो पूरे देश की है. एटीएम मशीने लगातार बंद पड़ी है. बैंकों के बाहर लंबी लाइनों में लोग खड़े-खड़े सुबह से शाम कर रहे हैं. वहां एक और दिक्कत है बैंक के स्टाफ में कमी की. इसके चलते बैंक में पैसा जमा करने, निकालने और रुपया बदलने के लिए एक ही लाइन लग रही है. लिहाजा हालात और बुरे हो गए हैं. कोढ़ में खाज यह कि कभी बैंकों में दोपहर दो बजे पैसा आता है, कभी बारह बजे. इसके बाद ही लेनदेन की शुरुआत हो पाती है. जिला मुख्यालयों से सुदूर ग्रामीण इलाकों में पैसा पहुंचने में रोज ही इस तरह की देरी होती है.

इस हालात में आम लोगों के लिए जल्दी-देरी का कोई मतलब नहीं रह गया है. वे शून्य पर खड़े हैं, यहां से कुछ पाने के बाद ही उनकी दौड़ शुरू होगी.

First published: 17 November 2016, 7:35 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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