Home » इंडिया » The state was itself the culprit in the Gulberg massacre: Teesta Setalvad
 

तीस्ता सीतलवाड़: गुलबर्ग नरसंहार के लिए राज्य खुद जिम्मेदार है

सुहास मुंशी | Updated on: 3 June 2016, 22:39 IST

एक्टिविस्ट बनने से काफी पहले तीस्ता सीतलवाड़ एक पत्रकार थी. यह बात कम ही लोगों को पता है. उन्होंने 1985 से अपने गृह राज्य गुजरात के अलावा देश के कुछ अन्य राज्यों में भी रिपोर्टिंग की.

लेकिन 1992-93 के मुंबई दंगों के बाद वे एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता बन गईं और 2002 के गुजरात दंगों के बाद गुलबर्ग सोसाएटी नरसंहार उनके लिए पहली घटना बना जिसमें वे पूरी तरह मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में सामने आईं.

उस वक्त उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) संस्था की स्थापना की, जो उसके बाद से गुलबर्ग समेत अन्य मामलों के पीड़ितों के लिए लड़ती आ रही है.

कैच ने विशेष अदालत द्वारा सुनाए गए गुलबर्ग मामले के फैसले पर उनसे कुछ सवाल किए और आने वाले वक्त में न्याय की लड़ाई की उनकी योजना के बारे में चर्चा की.

गुलबर्ग मामले के पीड़ितों के साथ आप कैसे जुड़ गईं?

दंगो से पहले मैं गुजरात से हमारी मैग्जीन कम्यूनलिज्म कॉम्बैट के लिए कहानियां कर रही थी. जैसे ही यह नरसंहार शुरू हुआ तो मेरे पास रोज पांच-छह सौ फोन कॉल आने लगे. फिर जब मैंने हिंसा देखी और इसकी गंभीरता समझी तब मुझे लगा कि इससे मैं निजी तौर पर जुड़ी थी.

हिंसा के मामले में यह काफी हद तक 1992-93 के मुंबई दंगों जैसा था जिसे मैंने देखने के साथ ही रिपोर्टिंग भी की थी. उस वक्त हमने जस्टिस श्रीकृष्णा की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का अभियान चलाया. हम चाहते थे कि हर व्यक्ति इसकी सच्चाई जाने इसलिए हमने इसे किताब के रूप में प्रकाशित करवाया.

जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) अपनी रिपोर्ट सामने लाई तब कुछ साथियों के साथ मिलकर मैंने इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया, ताकि न्यायपालिका और राज्य इसकी संस्तुतियों को लागू करें.

और उसके बाद सीपीजे 2002 दंगा पीड़ितों के लिए काम करने लगी. अपने अभियान की अब तक सफलता के बारे में आपका क्या विचार है?

हमनें बेस्ट बेकरी, सरदारपुरा, नरोदा पाटिया और अन्य को न्याय दिलाने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी, और अब तक कुल 150 को सजा दिलवाई. यह हमारे काम करने के तरीके का सबूत है.

इस दौरान आपने न्यायिक तंत्र और स्टेट मशीनरी के बारे में क्या सीखा?

इस लड़ाई ने हमें सिस्टम के बारे में काफी कुछ सिखाया. यह कुछ वक्त तक आपको झेलता है, शुरुआत में कुछ आवाज उठाने देता है लेकिन फिर 10, 13 या 15 साल बाद भी अगर आप जमे रहते हैं तब यह आपसे घृणा करना शुरू कर देता है. उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि हम इतना आगे जा सकेंगे.

क्या आपको इस पूरे प्रकरण में कोई खेद है?

सुप्रीम कोर्ट में हमारी अपील के बाद स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) का गठन किया गया. गवाहों के प्रति उनके विरोधी नजरिये को देखकर दिल दहल गया. इससे इस नरसंहार में बच निकले तमाम लोगों के दिल टूट गए.

मैं कहना चाहूंगी कि गुलबर्ग मामले में एसआईटी ने अपना सबसे गंदा चेहरा दिखाया. और यह केवल मैं ही नहीं कह रही हूं. एसआईटी के अपने विशेष सरकारी वकील ने भी अपने इस्तीफे में इसका खुलासा कर दिया था.

मुंबई दंगों को कवर करने के आपके अनुभवों को देखते हुए आप गुजरात के दंगों को इनसे कितना मिलता-जुलता या अगल मानती हैं?

मुंबई की तुलना में गुजरात की घटना हजार गुना बुरी थी. मुंबई में दंगा केवल एक शहर में भड़का. लेकिन गुजरात में दंगे की चपेट में 19 जिले आ गए. 

मुंबई में हमने देखा कि सत्ताधारी पार्टी (कांग्रेस) का शिव सैनिकों के विरोध में कार्रवाई करने का मन नहीं था. पुलिस में भी शिव सेना के तमाम हमदर्द थे. कांग्रेस ने आसानी से उन्हें मनमर्जी करने दी.

यहां गुजरात में राज्य स्वयं ही दोषी था. यह इस मामले में खुद ही शामिल था. नजदीकी थाने से गुलबर्ग सोसाएटी की दूरी दो किलोमीटर से भी कम थी और तमाम वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बार-बार फोन कॉल मिलाने के बावजूद भी कोई मदद नहीं पहुंची. दुख की बात है कि एसआईटी ने कभी इस बात को अपने मामले में पेश नहीं किया.

अंत में इस फैसले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? क्या आपको लगता है कि अदालत ने इस मामले में आपके आपराधिक षडयंत्र के दावे को खारिज कर दिया?

मैं यह नहीं कहूंगी कि यह बुरा है, लेकिन हमें बेहतर की उम्मीद थी. हमने आपराधिक षडयंत्र सिद्ध करने के लिए काफी कड़ी बहस की और काफी पुख्ता कागजी सबूत पेश किए. 

मैं कहती हूं कि मुझे बेहतर की उम्मीद थी क्योंकि 2002 दंगों के दो तिहाई मामलों में अदालत ने हमारी बहस के बाद आपराधिक षडयंत्र का कोण भी माना था.

क्या आप आपराधिक षडयंत्र को खारिज करने और बरी किए गए लोगों के विरोध में अपील करेंगी?

हम जरूर करेंगे.

First published: 3 June 2016, 22:39 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

पिछली कहानी
अगली कहानी