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बेहाल बुंदेलखंड का बदहाल सच

राघवेंद्र प्रताप सिंह | Updated on: 13 April 2016, 9:12 IST

बढ़ते तामपान ने गर्मियों की शुरुआत में ही बुंदेलखंड को झुलसाना शुरू कर दिया है. पेयजल और पशुओं के पीने का पानी समाप्त हो चुका है. हैंडपंप सूख रहे हैं, कुओं का पानी और गहराई में चला गया है. पानी तो पानी, लोगों को भोजन का भी संकट है.

फसल न होने की वजह से कृषि पर निर्भर श्रमिकों को भी काम नहीं मिल पा रहा है. मनरेगा जो कि ग्रामीणों को रोजगार देने की एकमात्र योजना है, उसमें भी उन्हें जरूरत के मुताबिक काम नहीं मिल पा रहा है. बुंदेलखंड के लिए ये कोई नई बात नहीं है पिछले कई सालों से ऐसा ही होता आ रहा है, लेकिन प्रशासन की तैयारियां शून्य हैं.

बुंदेलखंड में पहुंचने वाले सरकारी विभागों के ज्यादातर अधिकारी अक्सर दंभी हो जाते हैं

बुंदेलखंड के बांदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट समेत सातों जिलों में ग्रामीणों और किसानों की स्थिति खराब हैं. दूर-दराज के गांवों में हालात कुछ ज्यादा ही खराब हैं. कई घरों के दरवाजों पर ताले पड़े हुए हैं. खेतों में बेवाइयां फटी हुई हैं. पानी का कहीं नामोनिशान नहीं है. बरियारपुर बांध से निकलने वाली बड़ी नहर, जो देवरार से लेकर पनगरा तक सड़क के समानांतर दौड़ती है, उसकी पेंदी में धूल उड़ रही है. यह तीन साल से लगातार सूखे की चपेट में चल रहे बुंदेलखंड की तस्वीर है.

संवेदनहीन हुआ सिस्टम

बुंदेलखंड में पड़ रहे अकाल को और ज्यादा तकलीफदेह बनाता है सत्ता और व्यवस्था के भीतर संवेदनाओं का अकाल. बुंदेलखंड में पहुंचने वाले सरकारी विभागों के ज्यादातर अधिकारी अक्सर दंभी हो जाते हैं. उनकी यहां के लोगों, किसानों या ग्रामीणों के साथ ऐसी कोई संवेदना नहीं होती, जिसके जरिए वह बुंदेलखंड की समस्याओं का समाधान करने की मजबूत पहल करें. वे बुंदेलखंड में जनसेवा करने नहीं बल्कि नौकरी करने आते हैं और उद्योग से मिले लाभांश को लेकर चले जाते हैं.

पानी की कमी

बुंदेलखंड की सात छोटी-बड़ी नदियां बांदा में बाणगंगा, कड़ैली, चित्रकूट में बाल्मीकि, महोबा में क्योलारी, वर्मा, उर्मिल तथा महोबा-हमीरपुर में चंद्रावल नदी सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं. तालाबों के सूखने के चलते यहां जमीन के वाटर रिचार्ज की संभावना भी खत्म हो चुकी है. पारंपरिक जल प्रबंधन तंत्र बरबाद हो गए हैं. इलाके में अवैध खनन और वनों की अवैध कटान भी निर्बाध चलती है जिसके चलते प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है.

सूखा, अकाल और सरकारी उपेक्षा के चलते दम तोड़ता बुंदेलखंड

इलाके की छोटी नदियां सूख चुकी हैं. केन और यमुना में पानी लगातार कम होता जा रहा है. इसके चलते क्षेत्र की नमी भी लगातार खत्म होती जा रही है. चारा-पानी के अभाव में किसान अपने पशुओं को अन्ना (जानवरों को खुला छोड़ने को बुंदेली भाषा में यही कहते हैं) छोड़ रहे हैं. प्रदेश सरकार ने हालिया बजट में पेयजल के लिए 200 करोड़ बुंदेलखंड को दिया है. इसके सदुपयोग को लेकर सबको आशंका है.

32 लाख से ज्यादा ने किया पलायन

सूखे के लगातार चक्र ने बुंदेलखंड इलाके में पलायन का कुचक्र शुरू कर दिया है. ललितपुर जिले के अंदरूनी हिस्सों में कई-कई घरों के दरवाजों पर लगे ताले अब आम बात हो चुके हैं. स्थानीय स्तर पर किसी प्रकार का रोजगार नहीं मिलने के चलते जिले के ज्यादातर गांवों के पुरुष कमाने के लिए पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात जा चुके हैं.

पिछले तीन सालों से बुंदेलखंड सूखे की मार झेल रहा है

अगर केंद्रीय मंत्रिमंडल की एक आंतरिक समिति की रिपोर्ट पर गौर करें तो बीते कुछ वर्षों में बुंदेलखंड इलाके से 32 लाख से ज्यादा लोग रोजगार की तलाश एवं अन्य कारणों से दूसरे राज्यों एवं इलाकों की तरफ पलायन कर चुके हैं. केंद्रीय मंत्रिमंडल समिति के आंकड़ों से बुंदेलखंड के पलायन की एक तस्वीर समझी जा सकती है.

बांदा                737,920

झांसी               558,377

चित्रकूट            344,801

महोबा              297,547

हमीरपुर            417,489

उरई-जालौन      538,147

ललितपुर          381,316

पलायन की यह तस्वीर कमोबेश हर उस इलाके से मिलती जुलती है जहां प्राकृतिक आपदा या विकास की रोशनी अभी तक नहीं पहुंची है. लोग दिल्ली-मुंबई की चकाचौंध से नहींं बल्कि अपने घर-गांवों की बदहाली के कारण छोड़ रहे हैं.

कर्ज में डूबे किसान मौत को लगाते हैं गले

बुंदेलखंड इलाके के ज्यादातर किसान-मजदूर साहूकारों से ब्याज पर पैसा लेते हैं. अकाल और बेरोजगारी के बीच लोन चुकाने के दबाव और कहीं से कोई राह निकलता न देख किसान मौत को गले लगा लेता है. अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो अप्रैल 2003 से मार्च 2015 तक बुंदेलखंड के अलग-अलग जिलों में 3280 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

बुंदेलखंड सूखे का केंद्र है, लेकिन लोगों को पता तक नहीं हैः योगेंद्र यादव

सूखे की भीषण मार झेल रही बुन्देलखण्ड की बंजर धरती के किसान इस बार भी पहले सूखे और फिर हाड़तोड़ मेहनत के बाद तैयार फसल पर ओलों की बारिश से आत्महत्या करने पर मजबूर हैं. बीते दो महीनों में शायद ही कोई ऐसा दिन गया हो, जब बुंदेलखंड से किसान के आत्महत्या की खबर न आई हो.

हरियाली के नाम पर खर्च हुए 400 करोड़

पिछले एक दशक में बुंदेलखंड में हरियाली के नाम पर 400 करोड़ से ज्यादा खर्च किए गए हैं. वन विभाग का दावा है कि वर्ष 2005 से 2011 के बीच बुंदेलखंड में 15.91 करोड़ पेड़ लगाए गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इतने पेड़ कहीं नजर नहीं आते. यह अलग बात है कि इस पर अब तक 200 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. वर्ष 2012-13 में बुंदेलखंड पैकेज के तहत वन विभाग ने हरियाली लाने के लिए 82 करोड़ रुपए जारी किए.

बुंदेलखंड इलाके से 32 लाख से ज्यादा लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की तरफ पलायन कर चुके हैं

दस साल से हरियाली की योजना जारी है लेकिन हरियाली लापता है. 2015 तक बुंदेलखंड में हरियाली का आंकड़ा 400 करोड़ रुपए पार हो चुका है. वन विभाग सूखे और बारिश की कमी को पेड़ों बरबादी का जिम्मेदार बताकर अपना पल्ला झाड़ लेता है.

सूखे से निजात दिलाने के प्रयास

सूखे की विकट स्थिति से जूझ रहे बुंदेलखंड के किसानों को एनडीआरएफ के तहत सूखा राहत के रूप में 1,303 करोड़ रुपए की राशि घोषित हुई है. जबकि मनरेगा के तहत दिहाड़ी मजदूरी को बढ़ाकर 150 रुपए प्रति दिन कर दिया गया है. प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा प्रदेश की स्थिति का जायजा लेने के बाद यह फैसला लिया गया है.

राजेंद्र सिंह: पूंजीपतियों को नहीं, लोगों को पानी का मालिक बनाना होगा

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आलोक रंजन ने बुंदेलखंड क्षेत्र को स्थायी रूप से सूखे से निजात दिलाने के लिए पुराने तालाबों और जलाशयों की गाद निकालने और उनके संरक्षण पर जोर देने का निर्देश जारी किया है. इसके अलावा कम पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई हो सके इसके लिए प्लास्टिक के पाइपों का इस्तेमाल करने को कहा है.

यूपी के 50 जिले सूखाग्रस्त

यूपी सरकार ने गत वर्ष 75 में से 52 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था. इसका सर्वे करने के लिए नवंबर के अंत में केन्द्रीय टीम यूपी आई थी. उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्रीय टीम से राज्य सरकार को सूखा राहत के मद में 2057.79 करोड़ रुपए जल्द दिलाने का अनुरोध किया है.

सूखाग्रस्त जिलों में इलाहाबाद, फतेहपुर, चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, महोबा, झांसी, जालौन, ललितपुर, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, देवरिया, कानपुर नगर, संत कबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, मऊ, उन्नाव, बलरामपुर तथा अंबेडकर नगर मुख्य रूप से हैं जहां 33 प्रतिशत या उससे अधिक नुकसान होने की सूचना केन्द्र को दी थी.

गैर सरकार संस्थाओं की भरमार

अकाल और गरीबी से जूझ रहा बुंदेलखंड गैर सरकारी संस्थाओं के सेवा भाव के लिए मुफीद इलाका है. इनका पुख्ता आंकड़ा प्राप्त करना थोड़ा मुश्किल है, अगर मोटा-मोटी कहें तो बुंदेलखंड के सातों जिलों में तीन हजार से ज्यादा एनजीओ चल रहे हैं. कुछ बुंदेलखंड के जिलों में रजिस्टर्ड हैं तो कुछ बाहर से आकर काम कर रहे हैं.

जमीनी स्तर पर सही काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाओं की संख्या एक दर्जन से थोड़ी ही ज्यादा होगी. शेष संस्थाएं अपना हित साधने में लीन हैं. कई अधिकारियों के रिश्तेदार और परिचित भी इस बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं.

बुंदेलखंड में जिनके पास पैसा है वे बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं, बाकियों को धोने के लिए नाले का पानी भी नसीब नहीं है.

First published: 13 April 2016, 9:12 IST
 
राघवेंद्र प्रताप सिंह @catchhindi

संवाददाता, पत्रिका ब्यूरो लखनऊ

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