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सिमी एनकाउंटर: मारे गए कैदियों को इंसाफ़ मिलना मुश्किल

सुहास मुंशी | Updated on: 9 November 2016, 18:18 IST
QUICK PILL
  • 31 अक्टूबर को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 8 विचाराधीन क़ैदियों की कई मोर्चों पर जांच की जा रही है. 
  • मगर पूर्व में बिठाए गए जांच आयोगों का हश्र देखने के बाद ऐसा लगता नहीं कि इस केस में भी कोई इंसाफ़ हो पाएगा. 

फ्रांसीसी कानूनविद मोंटेस्क्यू अन्य लेखकों के बरक्स इसलिए ज़्यादा मशहूर हैं क्योंकि उन्होंने 'तानाशाही' शब्द को राजनीति में नई पहचान दिलाई. वह बहुत चालाक होता है और जानता है कि ताक़तवर पर कभी शक़ नहीं किया जा सकता. करीब तीन सौ साल पहले पॉम्पे की कहानी के ज़रिए उन्होंने बताया कि कुछ हुक़ूमतों में ऐसे अफ़सरों की कमी नहीं होती जो समानुपातिक तौर पर उलटे ढंग से काम करते हैं भले ही इसके नतीजे तकलीफ़देह क्यों ना हों. 

तीन बार लगातार मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में सफल रहने और चौथी बार भी चुने जाने के लिए मजबूत दावेदार शिवराज सिंह चौहान को अपने और अपनी पुलिस व्यवस्था पर शक करने की कोई वजह नजर नहीं आती. वरना वे सिमी मुठभेड़ में पुलिस की संदिग्ध भूमिका को लेकर फोटो, वीडियो और ऑडियो क्लिप्स के ढेरों सबूत होने के बावजूद उन पर इनामों की बौछार नहीं करते. 

वारदात के तुरंत बाद वे मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को 2-2 लाख, तलाशी अभियान में मौजूद पुलिसकर्मियों को 1-1 लाख और फ़रार कैदियों को कथिततौर पर दबोचने में मददगार गांववालों को 40 लाख रुपए का इनाम देने का एलान नहीं करते. इसलिए मध्य प्रदेश और केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा की दोनों ही सरकारों ने एमपी पुलिस के बयानों पर पूरा यकीन कर लिया. इतना ही नहीं, मीडिया को इस पर संदेह करने से भी मना किया.

सवाल करना ठीक नहीं

केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने सिमी कार्यकर्ताओं के मामले में पुलिस ज्यादती के पर्याप्त सबूत होने के बारे में पूछे जाने पर कहा कि 'शक करने, अधिकारियों और पुलिस से सवाल-जवाब करने की आदत छोड़ो. यह अच्छी संस्कृति नहीं है.'

आठ विचाराधीन, निहत्थे कैदियों की फर्जी मुठभेड़ के बाद पुलिस महकमे पर लगे संगीन आरोपों को गर्व के साथ स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री चौहान अभिभूत हो गए. एक आम सभा में वे गरजे, 'उन्हें कब तक जेल में रखते? कुछ लोग अब भी जेल में चिकन बिरयानी डकार रहे हैं.' 

न्यायसंगत तौर पर उन्होंने फिलहाल अनचाहे तरीक़े से नकद पुरस्कार टालने और तीन जांचें बिठाने की घोषणा की है. इनमें से एक जांच पुलिस के ही एक विभाग सीआईडी को, दूसरी पूर्व पुलिस महानिदेशक को और तीसरी मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जज को सौपी है. पुलिस पर लगे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले की निष्पक्ष छानबीन के लिए राज्य और केन्द्रीय मानवाधिकार आयोगों को भी कहा जा सकता है. हैरानी की बात यह है कि ये संस्थाएं संगीन आरोपों की जांच-पड़ताल के लिए अभी तक सक्रिय नहीं हुई हैं.

सही जगह पर गलत सवाल

मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने अपने को जेल तोड़ने के अरोपों की जांच और जेल सुधारों के मुद्दे तक सीमित कर लिया है. आयोग के प्रवक्ता एल.आर.सिसोदिया ने कहा कि पहले भी कई बार वे जेल सुधार का मसला उठा चुके हैं. आयोग की विशेष टीम यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि ये सुधार अमल में क्यों नहीं लाए गए?

इसके अलावा जेल तोड़ने और प्रहरी कांस्टेबल की हत्या के मामले की भी जांच-पड़ताल होगी. लेकिन जेल परिसर के बाहर मानवाधिकार उल्लंधन के आरोपों, तेरह किलोमीटर दूर ईंटखेड़ी गांव में विचाराधीन कैदियों के मारे जाने को आयोग क्यों नहीं देख रहा? यह पूछे जाने पर सिसोदिया बोले, 'हमें नहीं मालूम. जो फ़ैसला हुआ है आयोग उस पर काम कर रहा है.

यह पूछने पर कि क्या मध्य प्रदेश पुलिस पर हत्या के आरोपों की जांच होगी? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रवक्ता ने कहा कि आयोग रोजाना के घटनाक्रम पर अपनी राय नहीं देता. उसे पुलिस और प्रशासन से मिलने वाली रिपोर्टों को देखने और उनके जवाब का आकलन करने को कहा गया है. एक वरिष्ठ सीआईडी अधिकारी ने जांच के बारे में पूछने पर कहा कि 'मामला तेजी से देखा जा रहा है. इसकी रिपोर्ट राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेज दी जाएगी. आयोग ने उन्हें जल्दी रिपोर्ट देने को कहा है. वारदात के छ: सप्ताह बाद दूसरी रिपोर्ट दी जाएगी. हम यह काम समय पर पूरा कर लेंगे.' कैच के यह पूछने पर कि जांच कब तक पूरी हो जाएगी? अधिकारी ने कहा, 'जब तक मामले की न्यायिक जांच पूरी नहीं हो जाती.'

जजों पर छोड़ दें

मुख्यमंत्री ने सोमवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश एस.के.पांडे को घटना की न्यायिक जांच करने को कहा है. मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि उन्होंने सरकार के आदेश पर ऐसी कई न्यायिक जांचें देखी हैं लेकिन उनमें सत्ता के खिलाफ कुछ नहीं मिलता. 

व्यापम घोटाला सामने आने पर चौहान सरकार ने हाई कोर्ट के ऐसे ही जज की नियुक्ति की थी. मामले की तह तक जाने के लिए एसआईटी का भी गठन किया गया था. लेकिन जो जज बाहर आकर सार्वजनिक रूप से सरकार के खिलाफ बोल जाते हैं लेकिन अपने कई सालों के कार्यकाल में ऐसा कोई सबूत नहीं देते. ऐसे में कैसी जांच होगी, अंदाज़ा लगाया जा सकता है. 

31 अक्टूबर को मुठभेड़ में मारे गए सिमी के आठ संदिग्धों में से पांच की पैरवी कर रहे खंडवा के वकील जावेद चौहान ने कहा कि आठों शवों का पोस्ट मार्टम ऐसे मामलों में तय मानदंडों के विपरीत मजिस्ट्रेट की गैर मौजूदगी में कर दिया गया. डॉक्टरों की ओर से पोस्ट मार्टम खत्म करने के अगले दिन तक परिजनों को शव नहीं सौपना पुलिस की मंशा पर सवाल उठाता है. एक ओर घटना की जांच सीआईडी कर रही है जबकि दूसरी ओर उसी विभाग पर फर्जी मुठभेड़ में आठ संदिग्धों को मार डालने का आरोप है. तब निष्पक्ष जांच कैसे हो सकती है?

वहीं पूरे प्रकरण का हाल ही जायजा ले चुकी स्वतंत्र संस्था नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ हृयूमन राइटस ( एनसीएचआरओ ) की टीम अभी भोपाल वापस लौटी है. उन्होंने कैच के साथ इस बारे में कुछ जानकारी साझा की. उनका मानना है कि कुछ चीजें तथ्यों से मेल नहीं खाती. ग्रामीणों का कहना है कि भगोड़ों के हाथों में पत्थर थे. शुरुआती सरकारी बयानों में भी यही बात कही गई थी लेकिन मुठभेड़ के तीन घंटे बाद उसे बदल दिया गया.

हमें इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि जेल से भागे आठों संदिग्ध आठ घंटे तक महज 13 किलोमीटर दूरी पर ही कैसे मिल गए? सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस दौरान वे आपस में ही उलझे क्यों रहे? उन्होंने अपने बचाव या तितर-बितर होने की कोशिश क्यों नहीं की?

पोस्ट मार्टम रिपोर्ट से भी बड़ा संदेह होता है जिसमें कहा गया है कि आठों को कमर से उपर गोली मारी गई. घटनास्थल की शिनाख़्त के बावजूद आम लोगों की आवा-जाही जारी है. ग्रामीणों में से घटना के कुछ चश्मदीदों को सरकार ने एक-एक लाख रुपए देने की घोषणा की है. 

ऐसे में उन्हें अब बयान देने के लिए रटाया-सिखाया जा रहा है. ईंटखेड़ी गांव के सरपंच के भाई सूरजभाई मीना का दावा है कि सबसे पहले उसी ने आठों को देखा था. वे गडृढे में छिपने की कोशिश कर रहे थे और 'हिन्दुस्तान मुर्दाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद व अल्ला हू अकबर' चिल्ला रहे थे.

कुल मिला कर राज्य सरकार ने तमाशा करके मामले को हल्का बना दिया है. पुलिस कर्मियों के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के पर्याप्त सबूत होने के बावजूद वह पूरी ताक़त से पुलिस बल के पीछे खड़ी है. 

रोमन सम्राट टिबेरियस के जीवन के बारे में बहस के दौरान मॉंन्टेस्क्यू कहता है किे कानून के साथ क्रूर मजाक करने और न्याय से वंचित करने से बड़ा कोई निरंकुश—अत्याचारी नहीं है.

First published: 9 November 2016, 18:18 IST
 
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