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मौजूदा एनडीए सरकार में एक दलित नेता होने के क्या मायने हैं?

श्रिया मोहन | Updated on: 5 August 2016, 7:49 IST
(कैच न्यूज)

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने साबरमती के अच्छेर मैदान में दलितों के ऐतिहासिक प्रदर्शन के मात्र 24 घंटों के भीतर ही शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया.

इस दलित महासम्मेलन का आयोजन उना दलित अत्याचार लड़त समिति (यूडीएएलएस) ने किया था. कुछ दिन पूर्व उना के मोटा समाधियाला गांव में हिंदू शिव सेना के लोगों द्वारा मृत गायों की खाल उतारने पर चार दलितों की सरेआम निर्मम पिटाई के विरोध में यह विरोध प्रदर्शन किया गया.

इसके अलावा दलितों ने उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में 15 रुपये का उधार न चुका पाने पर गांव के एक ब्राह्मण द्वारा एक दलित दंपत्ति की हत्या के विरोध में भी प्रदर्शन किया.

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उन्होंने सदियों से जबरदस्ती मरे हुए जानवरों के शवों को उठाने का काम करवाये जाने का विरोध किया और साथ ही खुले हाथो से मनुष्यों की गंदगी साफ करने के लिये मैनहोल में न उतरने की कसम भी खाई.

यूडीएएलएस के संयोजक जिग्नेश मेवानी के अनुसार दलितों पर अत्याचार के 15,500 से भी अधिक मामले दर्ज किये गए हैं और गुजरात के 55 गांवों से दलितों को बाहर निकाल दिया गया है.

उन्होंने लगभग चीखते हुए मीडिया से कहा, ‘‘आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलितों पर हो रहे अत्याचार पर चुप क्यों हैं? आखिर वे हमारा दर्द साझा करने आगे क्यों नहीं आते?’’

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लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिर्फ प्रधानमंत्री ही चुप नहीं हैं बल्कि एनडीए सरकार में खुद को तथाकिथत रूप से ‘दलित नेता’ प्रतिनिधि कहलाने वाले सभी नेताओं ने भी चुप्पी साध रखी है. जुबानी जमा खर्च के अलावा उन्होंने कुछ ठोस नहीं किया है. न तो उन्होंने कोई विरोध ही किया और न ही पार्टी के भीतर किसी फोरम पर कोई विरोध दर्ज करवाया है.

इस सम्मेलन से सिर्फ दो दिन पहले सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया था.

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उन्होंने इस मसले पर संसद में हो रही नारेबाजी के बीच कहा, ‘‘इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई है और दलितों के खिलाफ अत्याचार को लेकर बने अधिनियम के तहत कार्रवाई भी की जा रही है. इसके अलावा सरकार दलित परिवारों को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करवा रही है.’’ हालांकि इस बीच उन्होंने सांसदों और आम जनता से इस मामले का ‘राजनीतिकरण’ न करने की अपील भी की.और यही इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना है. एक दलित नेता अपने दलित साथियों से कह रहा है कि वे मामले का राजनीतिकरण न करें.

बीजेपी के दलित चेहरे कहां हैं?

जब कैच ने भाजपा के एक दलित सांसद उदित राज से बात करने का प्रयास किया तो पहले पहल उन्होंने कहा कि उन्होंने सोमनाथ के दलितों के संघर्ष का समर्थन किया है.

उन्होंने कहा, ‘हमें और जोर से आवाज उठाने की जरूरत है. अभी और कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता है. अपराधियों के कृत्य को सही ठहराने का प्रयास निंदनीय है. हम इस मामले को शिवसेना के समक्ष भी उठाएंगे.’

हालांकि उन्होंने अहमदाबाद में दलितों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया लेकिन वे साथ में यह जोड़ना नहीं भूले कि यह समस्या कोई राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक है.

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उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, ‘‘यह कोई इकलौता मामला नहीं है. झज्जर में इसी वजह के चलते पांच लोगों को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया गया. यह राजनीतिक समस्या कम और सामाजिक अधिक है. यहां तक कि मायावती के शासनकाल के दौरान भी दलितों पर अत्याचार होते थे. क्योंकि यह इसी समाज की देन है. दो दलितों को सिर्फ 15 रुपये के लिये मार दिया जाता है. तमिलनाडु में तो दलितों को मंदिर में घुसने तक नहीं दिया जाता है. अब इसमें बीजेपी का क्या कसूर है?’’

उदित राज कहते हैं, ‘‘सवाल यह है कि आखिर अगड़ी जातियों के लोग यह सुनिश्चित करने के लिये आगे क्यों नहीं आ रहे हैं कि दलित भी समाज में घुल मिल सकें.’’

लेकिन जब कैच ने उनसे पूछा कि क्या यह राजनेताओं और राजनीति की जिम्मेदारी नहीं है कि वे बेहद खतरनाक जातिगत घृणा को हवा न दें? इस पर उन्होंने बेहद सरलता से कहा, ‘‘निश्चित ही कानून-व्यवस्था बेहद अहम है. लेकिन पहले हम नागरिकों को एक साथ आना होगा.’’

सोमवार को हैदराबाद के गोशामहल से बीजेपी विधायक राजा सिंह ने कैच से कहा कि वे पहले एक गोरक्षक हैं और विधायक बाद में. उन्होंने धमकी भरे अंदाज में गाय को मारने वाले किसी भी व्यक्ति को सबक सिखाने के लिये कानून अपने हाथों में लेने की बात दोहराई.

लेकिन अब भी राज का मानना है कि गोरक्षकों और आरएसएस का एक-दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘‘आखिर आप इस सबके लिये बाकी स्वतंत्र समूहों को छोड़कर सिर्फ आरएसएस को ही कैसे जिम्मेदार ठहरा सकते हैं? इन सबकी कड़ी निगरानी किये जाने की आवश्यकता है. आरएसएस ने इस घटना से किसी भी तरह का इत्तेफाक नहीं होने का एलान किया है. फिर भी आप क्यों आरएसएस को अनावश्यक रूप से इस विवाद में घसीट रहे हैं? अबतक मुझे आरएसएस और गोरक्षकों के बीच कोई संबंध नहीं मिला है. दादरी में जो कुछ घटा वह तो आरएसएस की करनी नहीं था. गोरक्षकों का अस्तित्व हमेशा से ही रहा है.’’

गोरक्षा, देश रक्षा और वर्ण रक्षा

प्रोफेसर कांचा इलैया शेफर्ड कहते हैं कि उदित राज जैसे सांसद मूल रूप से ‘‘हिंदु दलित’’ हैं. गोरक्षा, देश रक्षा और वर्ण रक्षा जैसे नारों से उनका ब्रेनवाश किया जा चुका है जिसका सीधा मतलब अपनी गायों की रक्षा, देश की रक्षा और जाति व्यवस्था की रक्षा करना है. इलैया कहते हैं, ‘‘कभी गावों में रहकर अगड़ी जाति वालों की सेवा करने वाले सीधे-सादे ग्रामीण आज संसद में बैठे उच्च जाति वालों की सेवा कर रहे हैं.’’

इलैया को लगता है कि दलित सांसद बीजेपी और आरएसएस के एजेंडे से सहमत हैं. इलैया कहते हैं, ‘‘वे सिर्फ सत्ता और लाभ के लिये वहां बैठे हैं. वे वहां पर किसी समुदाय के फायदे के लिये नहीं हैं. अमेरिका में काले नेता चाहे जहां भी हों वे कालों की आवाज उठाते हैं. यहां तो हमारे सामाजिक न्याय के मंत्री ही यह कहते हैं कि उन्हें पहले यह तथ्य जांचना है कि क्या उन्होंने जानवरों की खाल उतारने के लिये ही तो उनकी हत्या नहीं की थी और उसके बाद फैसला किया जाएगा कि क्या उन्हें भी दंडित किये जाने की आवश्यकता है.’’

खतरे की संभावनाओं का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि बीजेपी और आरएसएस से जुड़े दलित लोकतांत्रिक तरीके से सोच ही नहीं सकते. वे आगे कहते हैं, ‘‘अगर वे पार्टी लाइन से अलग जाकर बोलते हैं तो वे अपने जीवन में किसी भी चीज को लेकर भरोसेमंद नहीं रह सकते. अगर बीजेपी एक बार और सत्ता में आती है तो दलित आंदोलन और गति पकड़ेगा. ऐसा हमेशा से होता आया है क्योंकि दक्षिणपंथी कभी बुनियादी बातों पर टिके नहीं हैं.’’

इलैया को लगता है, ‘‘भारतीय राजनीति में कोई भी राजनीतिक मुद्दा पार्टी से बड़ा नहीं है. मुद्दों की खातिर आप पार्टी बदल सकते हैं और वोट कर सकते हैं. यहां पर अगर आप एक ऐसी पार्टी में है जो हत्या करती है तो आपको उसे भी तर्कसंगत ठहराना होगा.’’ अगर अंबेडकर आज जीवित होते तो यह देखकर शायद सबसे अधिक दुखी होते.

First published: 5 August 2016, 7:49 IST
 
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