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आडवाणीजी कहते हैं आपातकालीन प्रवृत्तियां अभी भी मौजूद है

ओम थानवी | Updated on: 26 June 2016, 7:29 IST

जैसा कि जॉन एक्टन कह गए - सत्ता बरबाद करती है, पूर्ण सत्ता पूरी तरह बरबाद करती है. इंदिरा गांधी बड़ी नेता थीं. पर पंडित नेहरू के निधन के बाद चौथी लोकसभा के चुनाव में उनके पास अपनी अर्जित ताक़त कम थी. 1969 में डॉ. ज़ाकिर हुसैन के न रहने पर राष्ट्रपति चुनाव के लिए वीवी गिरि के नाम पर पार्टी के दो टुकड़े हो गए. सत्ताधारी कांग्रेस के साथ सिर्फ 228 सांसद रह गए.

श्रीमती गांधी ने "गरीबी हटाओ" की हुंकार भरी और 1971 के आम चुनाव में उनके साथ 520 सदस्यों की लोकसभा में अपने 362 सदस्य हो गए. दो-तिहाई बहुमत की ताक़त ने उनके हौसले बुलंद किए, जो अनेक अपूर्व फैसलों से होते हुए बांग्लादेश के संघर्ष तक उनके 'शौर्य' का रूपक बन गए. अनन्तर उनके विरोधियों ने भी उन्हें 'दुर्गा' की उपाधि दे डाली.

यही वह दौर था जब इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व और शासन में निरंकुशता पनपी. मंत्रिमंडल की सत्ता प्रधानमंत्री कार्यालय में सिमटने लगी. कांग्रेसी चापलूस देश में अध्यक्षीय प्रणाली तक की बात करने लगे. राज्यों में विधायकों के नहीं, श्रीमती गांधी की पसंद के मुख्यमंत्री होने लगे. गैर-कांग्रेसी सरकारों को अध्यादेशों का ख़ौफ़ दिखाया जाने लगा. और तो और, उनकी इस कार्यशैली में न्यायपालिका को भी ठेंगे पर रखने की क़वायद दिखाई देने लगी. कार्यपालिका के साथ वैसा टकराव पहले देखने में नहीं आया था.

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12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा ने श्रीमती गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया और उनका चुनाव अवैध ठहरा दिया. अपील में सर्वोच्च न्यायालय से भी श्रीमती गांधी को बड़ी राहत नहीं मिली. इस बीच जयप्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन और सघन हो गया. उन्होंने इंदिरा गांधी से पद छोड़ने की मांग की.

1975 में इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया और उनका चुनाव अवैध ठहरा दिया

असल में यह वह घड़ी थी जब क़ानून की क़द्र करते हुए इंदिरा गांधी सत्ता त्याग सकती थीं, जिससे उन्हें शायद सहानुभूति और जनसमर्थन ही हासिल होता.

लेकिन उन्होंने दूसरा, नितांत ग़ैर-लोकतांत्रिक, रास्ता चुना. अपने मंत्रिमंडल से सलाह किए बग़ैर 25 जून को प. बंगाल के वकील मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर राय, गृह राज्यमंत्री ओम मेहता, अपने सनकी बेटे संजय गांधी और उनके विश्वस्त हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल जैसे चंद नेताओं से बात कर संविधान की धारा 352 (1) के सहारे इमरजेंसी घोषित करने का निर्णय कर लिया गया.

कठपुतली राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने उसी रात इसके लिए मंज़ूरी भी दे दी. रातोंरात विरोधी नेताओं को जेल में ठूंसने की क़वायद शुरू हो गई. कैसी विडम्बना थी कि भारत सरकार के मंत्रिमंडल को इस क़दम की जानकारी अगले रोज़ सुबह छह बजे आहूत बैठक में मिली!

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स्वाभाविक था कि इमरजेंसी स्वाधीन भारत में एक बड़ा हादसा साबित हुई. बड़ा कलंक. इक्कीस महीने- जब तक इमरजेंसी लागू रही- विपक्ष दुश्मन ही नहीं, कमोबेश अनुपस्थित हो गया. लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव टाल दिए गए. आम नागरिक सहम गए. उनके अधिकार छिन गए. अभिव्यक्ति अपराध हो गई. पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसर लग गया. सिनेमा-कला भी सेंसर से अछूते न रहे.

एक जानकारी के मुताबिक देश में कोई डेढ़ लाख नागरिक गिरफ़्तार किए गए. जयप्रकाश नारायण सहित अनेकानेक दिग्गज नेताओं के अलावा लेखक-पत्रकार भी गिरफ़्तार किए गए. बाक़ी को चेताया गया. कुछ आंदोलनकारी भूमिगत हो गए.

इमरजेंसी ने देश में भय का अजीबोग़रीब माहौल पैदा कर दिया गया. बीस-सूत्री कार्यक्रम और नसबंदी जैसे अभियान भी मानो आतंक के साये में चलाए जाने लगे. इसके पीछे संजय गांधी की नासमझी और ज़िद थी, जो अपनी माता की छाया में एक विकट संविधानेत्तर सत्ता बन चुके थे.

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मंत्री-मुख्यमंत्री उनके निर्देशों को आदेश समझते थे. उनकी अपनी एक चौकड़ी थी. संजय ख़ुद जहां जाते, प्रशासन उनके लिए बिछा रहता. जब वे जयपुर आए, पूरा शहर एक रंग में रंग दिया गया था. उस यह सब उस दौर में अनुशासन कहा गया. विनोबा भावे जैसे संत भी भुलावे में आए और इमरजेंसी को 'अनुशासन पर्व' कह गए. सच्चाई यह थी कि कथित अनुशासन प्रशासन और पुलिस ज्यादतियों का जीता-जागता मंज़र बनकर रह गया.

स्वाभाविक था कि इमरजेंसी स्वाधीन भारत में एक बड़ा हादसा साबित हुई

संविधान के प्रति श्रीमती गांधी पहले भी श्रद्धावान न थीं, इमरजेंसी ने उन्हें संविधान से खिलवाड़ का अचूक अवसर दिया. 42वां संशोधन पारित करवाकर तो उन्होंने हद कर दी, जिसमें राज्यों के अधिकार सिकुड़ गए, केंद्र के बढ़ गए; इतना ही नहीं न्यायपालिका की हस्ती भी सिमट गई.

इंदिरा गांधी अलोकतांत्रिक सत्ता के नशे में इतनी चूर थीं कि उन्हें जनता में भय की चुप्पी बीस सूत्री व अन्य कार्यक्रमों की संतुष्टि लगने लगी. उन्होंने इमरजेंसी उठाकर चुनाव का ऐलान किया. किसी को जनता के मन पर जो गुज़री उसका तब तक अंदाज़ा न था, जब तक कि चुनाव के नतीजे नहीं आए.

नतीजों में जनता ने इमरजेंसी पर अपना दो टूक निर्णय सुनाते हुए इंदिरा गांधी को उखाड़ फेंका; वे सांसद तक नहीं बन सकीं. न ही संजय गांधी. न उनके अधिकांश दरबारी. जिन इंदिरा गांधी को देवकांत बरुआ "इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा" कह गए थे, एक बारगी भारतीय राजनीतिक पटल पर वे कहीं न रहीं.

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क्या "हर-हर मोदी, घर-घर मोदी" के नारे के साथ सत्तासीन हुए नरेंद्र मोदी की शासन शैली में इमरजेंसी के लक्षण हैं? दरअसल इसका विवेचन जल्दबाज़ी होगा और कुछ ज्यादती भी. अव्वल तो 1975 की इमरजेंसी के हादसे के बाद शायद ही कोई दल देश में अब इमरजेंसी के दानव को किसी भी रूप में दुबारा ज़िंदा करने का साहस करेगा. लेकिन निरंकुश सत्ता के लालच और छलावे सर्वत्र एक-से होते हैं. लगता है वे मौजूदा प्रधानमंत्री को भी कम न लुभाते होंगे. उनकी कुछ प्रवृत्तियां इसके अकाट्य प्रमाण देती हैं.

हालांकि 282 सीटों का अच्छा-ख़ासा बहुमत पाने के बावजूद गठित एक लचर मंत्रिमंडल का इमरजेंसी से कोई जुड़ाव नहीं हो सकता, लेकिन वह इंदिरा गांधी के निरंकुश अंदाज़ की याद तो दिलाता ही है. लोकतंत्र में मंत्रिमंडल सनक से फलीभूत नहीं होता. मोदी का मंत्रिमंडल निजी पसंद-नापसंद और ज़िद का प्रमाण अधिक है. लोकसभा चुनाव हार कर आए अपने मित्र अरुण जेटली को उन्होंने न सिर्फ़ देश का ख़ज़ाना सौंपा, सांसदों की भरमार होते हुए भी महीनों रक्षा मंत्रालय भी जेटली के पास रहा. अपनी शिक्षा पर ख़ुद संदिग्ध, डिग्रियों को लेकर अंतरविरोधी दावे करने वाली स्मृति ईरानी शिक्षा मंत्री बनीं.

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प्रदेशों की यहां भी भरपूर अनदेखी है. इसका सबसे तल्ख़ प्रमाण तो हमारा राजस्थान ही है जहां से मंत्री की मूरत के लिए प्रधानमंत्री ने बलात्कार के आरोप से घिरे शख़्स को चुना! बेलगाम और सांप्रदायिक ज़ुबान वाले लोग मंत्री हैं, मसलन साध्वी निरंजन ज्योति (रामज़ादे-हरामज़ादे), गिरिराज सिंह (मोदी-विरोधी पाकिस्तान जाएं). संस्कृति मंत्रालय का जिम्मा उन महेश शर्मा के पास है जिन्होंने दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के बारे में अशोभनीय बात कही.

लोकतंत्र और उसके संघीय ढांचे से सरोकार रखने वालों को यह बात भी सताती है कि राज्यों पर केंद्र ज़्यादा हावी है. ग़ैर-भाजपा सरकारों को बर्ख़ास्त करने की वृत्ति भी मोदी को इंदिरा गांधी की कार्यशैली से जोड़कर रखती है. हाल में उत्तराखंड के मामले में केंद्र की क़वायद और उसके लिए राष्ट्रपति भवन के इस्तेमाल ने इसकी दुखद मिसाल पेश की, जिससे अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने बचाया. दिल्ली सरकार के साथ केंद्र की अनवरत नोक-झोंक ने केंद्र की गरिमा को कम किया है.

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सबसे चिंताजनक बात विरोधी आवाज़ों को कुचलने, अप्रिय ग़ैर-सरकारी संस्थानों को विभिन्न सरकारी नकेलों के ज़रिए घेरने की कोशिशें हैं. तीस्ता सीतलवाड़ के ख़िलाफ़ छिड़ी मुहिम और गुजरात दंगों के ख़िलाफ़ मुखरता से बोलने वाली वकील इंदिरा जयसिंह के संस्थान पर प्रतिबंध सरकार के लोकतांत्रिक तेवर ज़ाहिर नहीं करते.

विरोधियों के ख़िलाफ़ पुलिस का बेजा इस्तेमाल भी पुलिस कर रही है. जेएनयू मामले में सीधे केंद्रीय गृहमंत्री और शिक्षामंत्री का मुखर होना, विश्वविद्यालय में पुलिस भेजा जाना, छात्रों पर राजद्रोह का आरोप मढ़ना, अदालत परिसर में छात्र नेता की भाजपा विधायक की अगुआई में पिटाई और पुलिस का सहयोग माहौल में पैदा किए जा रहे तनाव को स्पष्ट करते हैं. रोहित वेमुला की आत्महत्या के पीछे दलित-विरोधी मानसिकता और वहां भी केंद्रीय नेताओं के दख़ल के उदाहरण सामने आए हैं.

कथित संस्कृति और धर्म के नाम पर हिंसा सामान्य घटनाएं हो गई हैं. एक के बाद एक तीन लेखकों की हत्या ने बुद्धिजीवियों को इतना आहत शायद ही पहले लिया होगा. इसके विरुद्ध लेखकों ने सरकार द्वारा दिए पुरसकार लौटाने का सिलसिला चलाया. विश्वविद्यालय और अन्य अनेक शैक्षिक संस्थान संकीर्ण नज़रिए की चपेट में हैं. इतिहास और उसकी पाठ्यपुस्तकों को आग्रहों-दुराग्रहों के साथ दुबारा लिखवाने की कसरत हो रही है.

सबसे बड़ा ख़तरा लोकतांत्रिक संस्थानों के सिर पर मंडराया है. फ़िल्म प्रशिक्षण संस्थान, फ़िल्म प्रमाणन (सेंसर!) बोर्ड, इंदिरा गांधी कला-संस्कृति संस्थान, राष्ट्रीय फ़ैशन टैक्नोलॉजी संस्थान आदि पर असंदिग्ध रूप से अयोग्य लोग थोप दिए गए हैं. सरकारी मीडिया ही नहीं, दूसरा भारतीय मीडिया भी देश और विदेश से सरकार के "मन की बात" ज़्यादा कहता है. इमरजेंसी के बारे में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि झुकने को कहने पर पत्रकार रेंगने लगे; आज जो समर्पण-भाव पनपा है, उसे किसने व्यवस्थित किया है?

First published: 26 June 2016, 7:29 IST
 
ओम थानवी @catchhindi

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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