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गुजरात से ग्राउंड रिपोर्ट: यहां कदम-कदम पर मोटा समढियाला बिखरे हुए हैं

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 15 August 2016, 9:56 IST

गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में स्थित ऊना तालुका के बाजा़र में जिस दिन चार दलित युवकों की सरेआम गौरक्षकों ने पिटाई की, ठीक उसी दिन पियूष सरवैया (24) और उनके पिता काला (65) जूनागढ़ की जेल से 18 दिन बाद रिहा हुए. इस दलित पिता-पुत्र का कसूर बस इतना था कि इन्‍होंने चार बरस की नाइंसाफ़ी से तंग आकर 24 जून को आत्‍मदाह करने की लिखित चेतावनी राज्‍य की मुख्‍यमंत्री आनंदीबेन पटेल को दी थी. इसके तुरंत बाद इन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया. कुल 18 दिन बाद जब 11 जुलाई को ये रिहा हुए, तब तक देश भर में ऊना की पिटाई का वीडियो वायरल हो चुका था.

बीते एक महीने और चार दिन के दौरान गुजरात की घटना के जरिए दलित उत्‍पीड़न का मसला राष्‍ट्रीय फलक पर छा गया, लेकिन 14 अगस्‍त की शाम जब हजारों दलितों की विशाल यात्रा उना के राठौड़ हॉल के प्रांगण में पहुंची, तो पीयूष उसमें शामिल नहीं हुए. वे दो दिन पहले से शहर के बीचोबीच लगी बाबासाहब आंबेडकर की प्रतिमा के नीचे अपने परिवार के 14 सदस्‍यों के साथ आमरण अनशन पर बैठे हुए हैं.

ज़ाहिर है, पीयूष यात्रा में नहीं गए तो यात्रा का कोई प्रतिनिधि भी उनसे मिलने 500 मीटर दूर नहीं पहुंचा. उनके साथ आमरण अनशन पर परिवार की दो साल की एक बच्‍ची भी शामिल है. इन 14 लोगों की निगरानी के लिए पूरे समय आंबेडकर प्रतिमा के पास चार पुलिसवाले तैनात हैं.

पीयूष अकेले दलित नहीं हैं जो उत्‍पीड़न का शिकार होने के बावजूद ऐतिहासिक कही जा रही दलितों की रैली में शामिल नहीं हैं. अमरेली जिले के जामका गांव निवासी वीराभाई भी इस रैली का हिस्‍सा नहीं हैं, ये बात अलग है कि रविवार को वे भी अपने परिजनों समेत उना में ही थे. उनकी आंख का अभी ऑपरेशन हुआ है. पट्टी बंधी हुई थी और आंख पर काला चश्‍मा चढ़ा हुआ था, लेकिन वीराभाई उसी उम्‍मीद में आंबेडकर की प्रतिमा के नीचे चले आए थे जो उम्‍मीद पीयूष अब छोड़ चुके हैं.

चार साल पहले पीयूष के भाई लालजी को कोली पटेल जाति के कुछ लोगों ने जि़ंदा जला दिया था. लालजी के बड़े भाई की पत्‍नी ने वह हादसा अपनी आंखों से देखा था. वह ज्‍यादा दिन इस सदमे को बरदाश्‍त नहीं कर सकी और 10 दिन बाद उसने भी दम तोड़ दिया.

मुसीबतें यहीं खत्‍म नहीं हुईं. इसके बाद पीयूष के परिवार को गांव से निकाल दिया गया और 15 बीघा ज़मीन पर खेती करने से रोक दिया गया. भाई की हत्‍या के दोषियों के बतौर पीयूष ने 21 लोगों की पहचान की थी, लेकिन पुलिस ने केवल 11 लोगों को गिरफ्तार किया. बाकी के बारे में पुलिस का कहना था कि सभी 21 को पकड़ने से केस कमज़ोर हो जाएगा.

मोटा समढियाला के तमाम दलित ऐतिहासिक कही जा रही दलित चेतना रैली में शामिल नहीं हो रहे हैं

वीराभाई के साथ इससे भी बुरा हुआ. उनके और उनकी पत्‍नी के ऊपर 350 कोली पटेलों ने हमला किया और पिटाई की. इसके बाद उन्‍हें गांव से निकाल दिया गया और 20 बीघा ज़मीन पर खेती करने से रोक दिया गया. चार साल इस घटना को हो गए लेकिन आज तक एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई.

वीराभाई कहते हैं, ''केवल तारीख लग रही है.'' ऐसा कहते हुए वे एफआइआर की प्रति दिखाते हैं और पत्‍नी से मिलवाने की बात करते हैं. दोनों ही मामलों में आधार लड़की को बनाया गया. लालजी के ऊपर एक कोली पटेल बिरादरी की लड़की को गायब करने का आरोप लगाया गया, जो उनकी हत्‍या के तीन दिन बाद अचानक वापस आई और उसने मृत‍क से किसी भी तरह का परिचय होने से इनकार कर दिया.

वीराभाई का लड़का मधु चार साल पहले एक दिन कोली पटेल बिरादरी की लड़की काजल के साथ गायब हो गया, जिसके बाद उनके ऊपर हमला हुआ. लड़का और लड़की का अब तक कोई सुराग नहीं मिला है.

गिर सोमनाथ के जिलाधिकारी डॉ. अजय कुमार बताते हैं कि गुजरात में दलितों को जब उनके गांवों से उच्‍च जाति के लोग निकाल देते हैं (स्‍थानीय भाषा में इसे हिजरत कहते हैं), तो अनुसूचित जाति उत्‍पीड़न कानून के तहत उन्‍हें ''आंतरिक विस्‍थापित और पलायित'' मान लिया जाता है.

भूमिहीन दलितों को ऐसे मामले में किसी और जगह ज़मीन देने का प्रावधान है. पीयूष के परिवार के संबंध में कुमार कहते हैं, ''एक तो वह ज़मीन का हकदार नहीं था. फिर उसे ज़मीन मिली तो अब वह ट्रैक्‍टर की और लेवेलिंग की मांग कर रहा है.''

हकीकत यह है कि पीयूष के परिवार को उना से तीन किलोमीटर दूर भेलवाड़ा गांव में ज़मीन देने का आदेश तो पहले हो चुका था लेकिन ज़मीन अब तक नहीं मिल सकी है. दो दिन पहले के स्‍थानीय अखबारों में ख़बर थी कि यह ज़मीन दिए जाने का आश्‍वासन उसके परिवार को प्रशासन ने दे दिया है. पीयूष अख़बार की कतरन दिखाते हुए कहते हैं, ''अब भी यह कागज़ों में ही है.''

गांव में आ रहे दलित हितैशियों ने दलितों को समझा दिया है कि राजनीति नहीं करनी है, समाज की एकता जरूरी है

वीराभाई को भी 20 बीघा ज़मीन के बदले अब तक ज़मीन नहीं मिली है. मोटा समढियाला गांव के दलित बालूभाई, जिनके बेटों की गौरक्षकों ने 11 जुलाई को पिटाई की थी, उनके परिवार में भी विवाद ज़मीन का ही था. इस गांव में करीब 170 दलित परिवार हैं लेकिन किसी के पास भी अपनी ज़मीन नहीं है.

बालूभाई के पास घटना से महीने भर पहले पंचायत का नोटिस आया था कि वे अपना मकान छोड़ दें. जिलाधिकारी बताते हैं कि यह मामला अतिक्रमण का था. वे कहते हैं, ''यह इकलौता परिवार है जो वहां गाय की चमड़ी उतारने का काम करता है. पैसे से ठीकठाक है. उसकी लड़की नर्स है और तेरह हज़ार कमाती है.''

बालूभाई बताते हैं कि ज़मीन केवल एक बहाना थी जिससे हमले की पृष्‍ठभूमि तैयार की गई. गांव के पड़ोसियों से बात करने पर इस हमले का आर्थिक आयाम खुलकर सामने आता है. बालूभाई की दलित पड़ोसी हेतल बताती है कि चूंकि आसपास के सभी गांवों के गाय का काम बालूभाई के पास है, इसलिए उनकी स्थिति बाकी दलितों के मुकाबले बेहतर है. वे बताती हैं कि बाकी दलितों ने गाय का काम बहुत पहले छोड़ दिया है लेकिन बालूभाई का परिवार अब भी कमाई के लिए यह काम करता है. गाय के काम के सहारे पैदा हुई उनकी आर्थिक मज़बूती है जिससे उच्‍च जातियों को दिक्‍कत थी.

बालूभाई दो दिन पहले राजकोट से आया एक बेनामी अंतर्देशीय पत्र दिखाते हैं. गुजराती में लिखे इस पत्र में उन्‍हें धमकी दी गई है कि उन्‍हें जीवित रख कर अब तक अहसान किया गया है और आगे जिंदा जला दिया जाएगा.

गांव से निकाले जाने के विरोध में धरने पर बैठे दलित (अभिषेक श्रीवास्तव)

पत्र लिखने वाला कहता है- ''आनंदीबेन ने जो पांच लाख रुपये भेजे हैं वे उन्‍हें मारने के लिए हैं.'' पत्र में अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में भी कुछ आपत्तिजनक बातें लिखी हुई हैं. पत्र भेजने वाले की पहचान मुश्किल है, लेकिन घटनाओं का यह सिलसिला बताता है कि गुजरात में दलितों पर हुए हमलों का एक महत्‍वपूर्ण आर्थिक आयाम है जिसका स्रोत गाय है. ऊना के दलित नेता चंद्रसिंह महीडा कहते हैं, ''ब्राह्मणों ने जो वर्ण व्‍यवस्‍था बनाई थी, वह अब उनके खिलाफ जा रही है. यह हिंदू धर्म के भीतर का 'कल्‍चरल वॉर' है.''

क्‍या हिंदू धर्म इस 'कल्‍चरल वॉर' को अपने भीतर अपने तरीकों से हल कर पाएगा? इस सवाल पर दलित रैली में शामिल और उसमें अपने-अपने कारणों से शामिल नहीं होने वाले एकमत हैं कि ऐसा संभव नहीं.

विडंबना यह है कि इस वैचारिक सहमति के बावजूद दलित उत्‍पीड़न की कहानियां सौराष्‍ट्र के गांव-कस्‍बों में बरसों से लगातार फल-फूल रही हैं जबकि 11 जुलाई की घटना के बाद हुआ दलित उभार इन कहानियों से बेपरवाह अपनी अलग धुन में है.

फिलहाल, आज़ादी की 70वीं वर्षगांठ पर ऊना में समाप्‍त हो रहे दलितों के अभूतपूर्व दस दिवसीय 'आज़ादी कूच' की सबसे ताज़ा विडंबना यह है कि इसमें मोटा समढियाला गांव के अधिकतर दलित शामिल नहीं हो रहे. राकेश और संगीता को 15 अगस्‍त को स्‍कूल जाना है, इनके पिता खेती का सीज़न न होने के कारण मज़दूरी ढूंढ रहे हैं और इनकी मां रैली में जाने के सवाल पर आंचल में मुंह छुपाकर चुपचाप हंस देती हैं.

रविवार को दिन भर बालूभाई के परिवार से मिलने आए गणमान्‍य दलित हितैशियों ने गांव वालों को समझा दिया है कि इस मसले पर राजनीति नहीं करनी है, बल्कि सामाजिक समन्‍वय का रास्‍ता अपनाना है.

First published: 15 August 2016, 9:56 IST
 
अभिषेक श्रीवास्तव @abhishekgroo

स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. लंबे समय से देशभर में चल रही ज़मीन की लड़ाइयों पर करीबी निगाह रखे हुए हैं. दस साल तक कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में नौकरी करने के बाद बीते चार साल से संकटग्रस्‍तइलाकों से स्‍वतंत्र फील्‍डरिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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