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गुलबर्ग सोसाइटी कांड: क्रिया-प्रतिक्रिया का सिद्धांत भी काम न आया

सुधाकर सिंह | Updated on: 7 June 2016, 23:04 IST
QUICK PILL
  • चौदह साल पहले यानी 28 फरवरी 2002 को जब अहमदाबाद का गुलबर्ग सोसायटी कांड हुआ था तब इसे कुछ लोगों ने एक दिन पहले 27 फरवरी 2002 को हुए गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बताया था.
  • अब एक बार फिर गुलबर्ग सोसाइटी दंगा कांड चर्चा में है. गत दो जून को विशेष अदालत ने इस पर फैसला सुनाते हुए 24 आरोपियों को दोषी माना है, बाकी 36 आरोपी निर्दोष पाए गए हैं.

कोर्ट को इन 24 दोषियों की सजा का ऐलान 6 जून को करना था, पर विशेष सत्र अदालत ने दोषियों के लिए होने वाली सजा का ऐलान टाल दिया है. अब इस मामले पर अदालत 9 जून को सजा सुनाएगी.

मामले से जुड़े जानकारों के अनुसार बचाव पक्ष के वकील अजय भारद्वाज ने कोर्ट को बताया है कि 27 फरवरी 2002 के गोधरा कांड के बाद उत्तेजित लोगों ने गुलबर्ग सोसायटी में तबाही मचाई थी, जिसमें कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी सहित 69 लोगों की जान चली गई थी.

निश्चित रूप से भारद्वाज ने उन लोगों के नाम नहीं बताए जो इस भीड़ में शामिल थे. भारद्वाज ने बचाव पक्ष के वकील के सभी तर्कों को खारिज करते हुए भीड़ के जाफरी के घर में घुसने पर भी सवाल खड़े किए.

उल्लेखनीय है कि क्रिया और प्रतिक्रिया की यह थ्यौरी लगातार मीडिया सुर्खियों में बनी रही है. इसने अच्छी खासी टीआरपी भी बटोरी है. घटना में मारे गए 69 लोगों में से 39 लोगों के तो शव मिले, लेकिन बाकी 30 लोगों के शव भी नहीं मिले इन्हें सात साल बाद कानूनी परिभाषा के तहत मरा हुआ मान लिया गया.

कहा जा रहा है कि अदालत दोषियों की सजा का फैसला इसलिए टाला क्योंकि इस मामले में दलीलें अभी तक पूरी नहीं हुई हैं. इस मामले में 11 लोगों को हत्या का दोषी और विश्व हिंदू परिषद नेता अतुल वैद्य समेत अन्य 13 को हत्या से छोटे अपराध का दोषी ठहराया गया है. जबकि 36 आरोपियों को बरी कर दिया गया.

First published: 7 June 2016, 23:04 IST
 
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