Home » इंडिया » there is no viable technique to convert diesel taxis into cng ones
 

डीजल टैक्सी पर रोक लगाने की राह में है तकनीकी रोड़े

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 5 May 2016, 22:22 IST
QUICK PILL
  • सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए दिल्ली में डीजल टैक्सियों पर रोक लगाने का आदेश दिया है. अदालत ने दिल्ली सरकार से इस आदेश पर अमल की योजना का ब्योरा मांगा है.
  • विशेषज्ञों के अनुसार डीजल बसों को सीएनजी में बदलना संभव था लेकिन डीजल टैक्सियों को सीएनजी में बदलने की भरोसेमंद तकनीकी उपलब्ध नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में वायुद प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए डीजल टैक्सियों के परिचालन पर प्रतिबंध लगा दिया है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसके उलट परिणाम भी हो सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से शुक्रवात तक डीजल टैक्सियों को हटाने की योजना का ब्योरा मांगा है.

सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में एनवायरमेंट पलूशन (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल) अथारिटी का गठन किया था. इसका काम दिल्ली में पर्यवरण नियंत्रण और सुझाव देना और अदालत के निर्देशों के अनपालन पर नजर रखना था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश दिया था कि दिल्ली में केवल सीएनजी बसें चलेंगी.

पढ़ेंः ऑड-ईवन योजना के दौरान प्रदूषण में आई 18 फीसदी कमी

प्राकृतिक गैस उपलब्ध कराने वाली कंपनी गेल को सीएनजी गैस स्टेशनों की संख्या बढ़ाने का भी आदेश दिया था. तब कोर्ट ने साल 2000 तक सभी ऑटो और टैक्सियों को सीएनजी अपना लेने का आदेश दिया था.

1998 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में डीजल बसों पर प्रतिबंध लगाकर सीएनजी बसें चलाने का आदेश दिया था

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2003 में अपने एक अध्ययन में पाया कि सीएनजी अपनाने के बाद दिल्ली के प्रदूषण स्तर में उल्लेखनीय कमी आई है. अदालत के इस आदेश पर अमल इसलिए भी हो पाया क्योंकि डीजल बसों को सीएनजी में बदलना संभव था.  

टैक्सियों को सीएनजी में बदलने की कोई विश्वसनीय तकनीकी अभी उपलब्ध नहीं है.

मालचंद चौहान साल 2000 में डीजल बसों को सीएनजी में बदलने की सरकारी योजना में शामिल थे. वो कहते हैं डीजल टैक्सी को सीएनजी में बदलने की विश्वसनीय तकनीकी नहीं है. कुछ मामलों में ऐसा करवाया भी जाए तो करीब एक लाख रुपये तक खर्च लगता है.

पढ़ेंः दिल्ली हाईकोर्ट: ऑड-इवेन के लिए 15 दिन क्यों?

चौहान कहते हैं कि डीजल गाड़ियों को बदलने वाला सीएनजी किट अनाधिकृत हैं और उनका परीक्षण भी नहीं हुआ है.

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के एक शोध के अनुसार सीएनजी में बदली गई कारें पर्यावण प्रदूषण पर नियंत्रण के मामले में ज्यादा सफल नहीं हैं. पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए पहले सीएनजी फिट गाड़ियां ही कारगर हैं.

साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश का उल्लंघन करने वाली डीजल बसों पर हर रोज 1000 रुपये जुर्माना लगाने के लिए कहा था. नतीजतन, साल के अंत तक दिल्ली की सारी बसें सीएनजी से चलने लगीं.

पढ़ेंः प्रदूषण को पंक्चर करने आ रहीं हैं ये हाइब्रिड कारें

इस अनुभव के आधार पर ये कहा जा सकता है कि कड़ाई बरत कर अदालत के आदेश को अमली जामा पहना जा सकता है.

सीएनजी से चलने वाली कारों में प्रति किलोमीटर 1.75 रुपये का खर्च आता है. यानी सीएनजी पेट्रोल और डीजल के मुकाबले काफी किफायती है.

सीएनजी से गाड़ियों को एक दिक्कत लंबी दूरी की यात्रा में आती है. अगर किसी को दिल्ली से मुंबई जाना सीएनजी गाड़ी से जाना हो तो ये काफी मुश्किल होगा. गाड़ियों के सीएनजी टैंक में इतनी गैस नहीं होती कि ये यात्रा की जा सके, न ही दोबारा गैस भराने के लिए रास्ते में पर्याप्त सीएनजी स्टेशन हैं.

बसों को डीजल से सीएनजी में बदलना संभव था लेकिन टैक्सियों को सीएनजी में बदलने की भरोसेमंद तकनीकी का अभाव

अदालत ने आल इंडिया परमिट वाली डीजल टैक्सियों को सीएनजी में बदलवाने के आदेश से छूट दी है. लेकिन मीडिया में आई खबरों के अनुसार पुलिस आल इंडिया परमिट वाली टैक्सियों का भी चालान काट रही थी. दिल्ली में दूसरे राज्यों से आने वाली टैक्सियों को भी सीएनजी में बदलना तभी संभव है जब उन राज्यों में पर्याप्त सीएनजी स्टेशन उपलब्ध हों.

दिल्ली सरकार ने 2014 में गैस स्टेशनों पर गैस भराने के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र(पीयूसी) जरूरी होगी. दो साल बाद भी इस आदेश पर न के बराबर अमल होता है.

पढ़ेंः सम-विषम नीति से जुड़े रोचक आंकड़े

साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी गाड़ियों को लिए प्रदूषण जांच अनिवार्य बना दिया था.

2013 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड(सीपीसीबी) ने पाया था कि दिल्ली में कई पीयूसी केंद्रों में पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं. सीमावर्ती इलाकों में स्थिति ज्यादा खराब है. कई जगहों पर एक कम्प्यूटर सॉफ्टेयर की मदद से जाली पीयूसी भी बनाया जा रहा है. ऐसी स्थिति में इससे जुड़े आंकड़ों पर पूरा भरोसा करना संभव नहीं है.

जमीनी असर


दिल्ली सरकार के सम-विषम नियम का पर्यावरण सुधार पर कितना असर पडा है ये निश्चित तौर पर नहीं पता चला है. इसके लिए जरूरी आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं.

परिवहन मामलों पर शोध कर रहे राहुल गोयल कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट को विभिन्न संस्थाओं की मदद से प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों का अध्ययन कराना चाहिए. उसके बाद ही किसी चीज पर प्रतिबंध की घोषणा करनी चाहिए."

जाहिर है अब गेंद दिल्ली सरकार के पाले में हैं. देखना है कि वो सुप्रीम कोर्ट को डीजल टैक्सियों को छूट देने के लिए मना पाती है या नहीं. सरकार शायद सुप्रीम कोर्ट को समझाने की कोशिश करे कि डीजल टैक्सियों को सीएनजी में बदलने की कोई भरोसेमंद तकनीकी फिलहाल नहीं है. ऐसे में इस संबंध में कोई दीर्घकालिक योजना बनाना ही उचित होगा.

First published: 5 May 2016, 22:22 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

पिछली कहानी
अगली कहानी