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कन्नूर में सीपीएम-आरएसएस का संघर्ष और गहरा, और रक्त रंजित हो सकता है

आदित्य मेनन | Updated on: 17 July 2016, 8:10 IST
QUICK PILL
  • केरल के कन्नूर जिले में पिछले चालीस साल से चले आ रहे सीपीएम और बीजेपी-आरएसएस के बीच हिंसक संघर्ष नेे सोमवार रात को दो और लोगों की जान ले ली.
  • सोमवार को रात दस बजे सीपीएम कार्यकर्ता सीवी धनराज को कन्नूर में उसके घर के बाहर काट कर मार डाला गया. हमलावर तीन बाइक पर सवार हो कर आए थे. सीपीएम का आरोप है कि हमलावर बीजेपी के थे.
  • कुछ ही घंटों में संघ की इकाई भारतीय मजदूर संघ के एक आॅटोरिक्शा चालक ईके रामचंद्रन को उसी इलाके में चाकुओं से गोद कर मार डाला गया. पुलिस का दावा है कि यह धनराज की हत्या का बदला था.

केरल के कन्नूर जिले में पिछले चालीस साल से चले आ रहे सीपीएम और बीजेपी-आरएसएस के बीच हिंसक संघर्ष नेे सोमवार रात को दो और लोगों की जान ले ली. इन ताजा वारदातों के साथ ही कुन्नूर में दो और पत्नियां विधवा हो गईं और चार और बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया.

सोमवार को रात दस बजे सीपीएम कार्यकर्ता सीवी धनराज को कन्नूर में उसके घर के बाहर चाकू-दंरातियों से काट कर मार डाला गया. हमलावर तीन बाइक पर सवार हो कर आए थे. सीपीएम का आरोप है कि हमलावर बीजेपी के थे.

कुछ ही घंटों में संघ की इकाई भारतीय मजदूर संघ के एक आॅटोरिक्शा चालक ईके रामचंद्रन को उसी इलाके में चाकुओं से गोद कर मार डाला गया. पुलिस का दावा है कि यह धनराज की हत्या का बदला था. केरल के मुख्यमंत्री पिन्नारई विजयन का भी मानना है कि ये हत्याएं राजनीतिक रंजिश का नतीजा हैं.

उन्होंने केरल विधानसभा में कहा, 'धनराज की हत्या में दस बीजेपी कार्यकर्ता शामिल थे और भारतीय मजदूर संघ के कार्यकर्ता की हत्या इसी का नतीजा था.'

धनराज और रामचंद्रन के पीछे उनके घर में उनकी पत्नियां और दो-दो बच्चे है. सीपीएम और बीजेपी दोनों ने मृतकों को शहीद घोषित किया है. कोई आश्चर्य नहीं कि इससे कन्नूर जिले में प्रतिशोध में हत्याओं और हिंसक घटनाओं का सिलसिला चल पड़े.

चौंकाने वाले आंकड़े

वर्ष 1980 से लेकर अब तक कन्नूर में राजनीतिक हिंसा में मारे गए लोगों की संख्या 180 हो चुकी है. आंकड़ों के मुताबिक इस साल के फरवरी माह तक पिछले दस सालों में कन्नूर में मारे गए लोगों की संख्या 41 थी. इनमें 19 सीपीआई के, 17 आरएसएस के और 3 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के हैं. 2 प्रतिद्वंद्वी मुस्लिम संगठन एनडीएएफ के हैं; जो साल 2006 में पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया में शामिल हो गया.

इस वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में मई में यहां हिंसा चरम पर थी. पूरे केरल में चुनावी हिंसा के 1,253 मामले सामने आए थे. इनमें कन्नूर में सर्वाधिक 222 घटनाएं घटीं.

वर्ष 1970 से लेकर अब तक वाम दलों और संघ के 4,000 से ज्यादा कार्यकर्ताआें के खिलाफ आपराधिक वारदातों, हत्या के प्रयास और विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं की हत्या के मामले दर्ज हैं.

हिंसा की संस्कृति

केरल में सीपीएम-बीजेपी के बीच जारी संघर्ष मध्यकालीन उत्तरी केरल के कुड्डीकपा या खूनी संघर्ष की याद दिलाता है. जब भी किसी काॅमरेड या स्वयंसेवक की हत्या होती है दूसरा पक्ष बदले में और ज्यादा खून खराबा करता है.

ये मात्र हत्याएं नहीं हैं, वे इन नृशंस कृत्यों के माध्यम से राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं. उदाहरण के लिए जब 4 मई, 2012 को बागी कम्युनिस्ट नेता टीपी चंद्रशेखरन की हत्या की गई थी तो हत्यारे सीपीएम कार्यकर्ताओं ने उनका चेहरा इस कदर विकृत कर दिया था कि उन्हें पहचाना न जा सके. उनके शरीर पर 55 घाव किए गए, इसमें से 49 केवल चेहरे पर थे.

कार्यकर्ता अपना ‘तरीका’ बताने के लिए बर्बरता पर उतर आते हैं. चंद्रशेखरन के चेहरे पर 49 निशान इसका ही संकेत है.

कम्युनिस्टों के लिए बागी का मतलब ऐसा ही है जैसा धार्मिक कट्टरपंथियों के लिए काफिरों का और सीपीएम कार्यकर्ता ऐसा करने वालों को सबसे भयानक सजा देते हैं.

एक और उदाहरण देखिए, इसी साल 15 फरवरी को सीपीआई कार्यकर्ताओं ने कथित रूप से 27 वर्षीय पीवी सुजिथ को उसके माता-पिता के सामने ही काट डाला. उसका कसूर था कि उसने संघ में शामिल होने के लिए डीवाईएफआई छोड़ दी थी.

सीपीएम और बीजेपी दोनो ही दल हिंसा के इस खेल में बुरी तरह से उलझ चुके हैं. इसे समझने के लिए इतना जानना काफी है कि ये लोग खून से सने चाकू या कुल्हाड़ी को कुछ दिनों के लिए मिट्टी के अंदर गाड़ कर रखते हैं ताकि इसकी धार और तेज हो जाए.

साथ ही दोनो ही दल देर रात खाली सड़कों पर आवारा पशुओं को मारकर भी बल प्रदर्शन करते रहते हैं.

कन्नूर ही क्यों?

केरल में कन्नूर ही वह जगह है, जहां कम्युनिस्ट पार्टी के आंदोलन ने जड़ें पकड़ी थीं. इसके बाद मद्रास के इस अति विवादित क्षेत्र में 1930 में कम्युनिस्ट आंदोलन फैला. यहां तक कि आजादी के बाद और कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बावजूद पार्टी ने कन्नूर पर अपना नियंत्रण कायम रखा. जिले की प्यननूर और तालिपरम्बा जैसी कुछ विधानसभा सीटों पर 1965 से सीपीएम का ही कब्जा है.

कुछ लोग कन्नूर की हिंसा को इसके रक्त रंजित अतीत और पिछड़ेपन से जोड़कर देखते हैं. कन्नूर के ज्यादातर सीपीआई और संघ के कार्यकर्ता पिछड़े वर्ग थिया समुदाय से संबंधित हैं और निम्न मध्यमवर्ग से ताल्लुक रखते हैं. क्षेत्र में इन दोनों ही संगठनों के लिए वफादारी और आज्ञा पालन की प्रकृति आदिम समुदायों जैसी है.

यह उसी प्रकार है जैसे पूरी वफादारी और और बदले की भावना से लैस हो कर किसी माफिया के लिए काम करना.

इन्हीं थियाओं के लिए पैदा हुई प्रतिस्पर्धा ने भाकपा और संघ के बीच दुश्मनी में आग में घी डालने का काम किया है.

बीजेपी का उत्थान

यद्यपि संघ हमेशा से ही कन्नूर मेें शक्तिशाली रहा है, परंतु केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद यह और आक्रामक हो गया है.

मोदी के सत्तारूढ़ होने से यहां बीजेपी-संघ का आधार मजबूत हुआ है और इससे सीपीएम का आक्रोश बढ़ गया है.

पिछले साल यहां हुए पंचायत चुनाव में बीजेपी का उत्थान साफ देखा जा सकता था. वामदलों को इन चुनावों में भले ही दो तिहाई सीटों पर विजय मिली हो लेकिन बीजेपी को मिले मतों में तिगुना इजाफा देखा गया और वह 13 पंचायतों में चुनाव जीत गई.

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद बीजेपी यहां केरल के हिंदू वोटरों के बीच प्रमुख वाम विरोधी दल के रूप में उभरना चाहती है. इसीलिए पार्टी का एलडीएफ के साथ सीधा टकराव चल रहा है. बीजेपी इस चक्कर में एलडीएफ के साथ उलझती रहती है.

पार्टी अब शुजित और रामचंद्रन को शहीद का दर्जा दे रही है और वामपंथियों से लड़ाई के दौरान घायल हुए स्वयंसेवकों का भी उल्लेेख कर रही है. विधानसभा चुनावों में पार्टी ने सी सदानंदन मास्टर को मैदान में उतारा था, जिनके पैर एक चुनावी रैली के दौरान सीपीआई कार्यकर्ताओं ने काट दिए थे. प्रधानमंत्री मोदी ने मास्टर और अन्य कार्यकर्ताओं की तारीफ की जिन्होंने वाम दलों से मोर्चा लिया था.

मोदी के केंद्र में और पिन्नाराई विजयन के राज्य में सत्तारूढ़ होने के बाद क्षेत्र में हिंसा बढ़ी है. इससे कन्नूर जिले में राजनीतिक रंजिश नए सिरे से सिर उठाने लगी है.पहले जो कार्यकर्ता केवल अपने स्तर पर ही हिंसक घटनाओं को अंजाम देते थे उनके हौंसले अब बुलंद हैं, क्योंकि उन्हें लगता है न केवल पार्टी उनका समर्थन करती है बल्कि वामपंथियों को सड़क पर मार गिराने के लिए सरकार उनका सम्मान भी करती है.

अब काफी कुछ मुख्यमंत्री विजयन पर निर्भर है कि वे हालात को किस प्रकार संभालते हैं. कारण, कि वे पिछले पचास सालों से कम्युनिस्ट हैं और कन्नूर जिले के थिया समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. क्षे़त्र की राजनीतिक हिंसा को उनसे बेहतर कोई और नहीं समझ सकता.

उनका अतीत बताता है कि कैसे उन्होंने सीपीआई के बागियों के खिलाफ कड़े कदम उठाए थे. टीपी चंद्रशेखरन के पुत्र ने अपने पिता की हत्या के लिए विजयन को ही जिममेदार ठहराया है.

1998 से 2015 के बीच केरल प्रदेश सचिव के तौर पर उन्होंने वामपंथियों को आदेश दिया था कि वे इस भगवा संगठन के खिलाफ मोर्चा खोल दें और संघ के लिए नफरत का सबब बन जाएं. अगर मुख्यमंत्री के अतीत और मोदीनीत बीजेपी की आक्रामकता को देखा जाए तो कन्नूर जिले को आने वाले महीनों में और रक्तपात का साक्षी बनने के लिए तैयार रहना होगा.

First published: 17 July 2016, 8:10 IST
 
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