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CJI के खिलाफ इन पांच कारणों से महाभियोग ला रही है कांग्रेस, जमीन हथियाने का भी मामला

कैच ब्यूरो | Updated on: 21 April 2018, 9:24 IST

विपक्ष की 7 पार्टियां CJI के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाई है. कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी पार्टियों ने इस प्रस्ताव को राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडू को सौंपा है. कांग्रेस ने चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोगा नोटिस लाने के पांच कारण बताए हैं. कांग्रेस ने कहा है कि विपक्षी पार्टियों ने 'दुर्व्यवहार करने के पांच आधार' पर महाभियोग प्रस्ताव पेश किया है.

ये वह पांच कारण हैं जिनको लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने CJI पर महाभियोग लाने का निर्णय लिया है-

पहला कारण- CJI के ऊपर जो पहला आरोप है वह प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट से संबंधित है. आरोप है कि इसमें संबंधित व्यक्तियों को अवैध लाभ प्रदान किया गया. प्रधान न्यायाधीश द्वारा देखे गए इस मामले पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाया है. आरोप है कि इस मामले में सीबीआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति नारायण शुक्ला के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की इजाजत मांगी लेकिन उन्होंने जांच की इजाजत नहीं दी.

 

दूसरा कारण- यह मामला एक रिट याचिका को प्रधान न्यायाधीश द्वारा देखे जाने के प्रशासनिक और न्यायिक संदर्भ में है. इसमें प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मामले में जांच की मांग की गई थी.

तीसरा कारण- तीसरा आरोप भी उसी केस से संबंधित है. इसमें विपक्षी दलों ने कहा है कि ऐसा होता रहा है कि जब प्रधान न्यायाधीश संविधान पीठ में होते हैं तो किसी मामले को शीर्ष अदालत के दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश के पास भेजा जाता है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

 

चौथा कारण- प्रधान न्यायाधीश पर गलत शपथपत्र देकर जमीन हासिल करने का आरोप लगा है. आरोप है कि CJI ने वकील रहते हुए गलत शपथपत्र देकर जमीन हासिल की थी. मामले में अतिरिक्त जिलाधिकारी ने 1985 में ही जमीन का आवंटन रद्द कर दिया था. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय में चुने जाने के बाद उन्होंने वर्ष 2012 में जमीन वापस कर दी.

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पांचवा कारण- विपक्षी दलों ने पांचवे कारण में कहा है कि प्रधान न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय में कुछ महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मामलों को विभिन्न पीठ को आवंटित करने में अपने पद एवं अधिकारों का दुरुपयोग किया. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया गया.

क्या है महाभियोग की प्रक्रिया 

भारतीय संविधान में महाभियोग का प्रावधान राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश को किसी आरोप के बाद पद से हटाने के लिए बनाया गया है. संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में इसका जिक्र किया गया है. महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है. नियमों के अनुसार महाभियोग प्रस्ताव के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं.

अगर संसद में महाभियोग का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो तीन सदस्यों की समिति जज पर लगे आरोपों की जांच करेगी. जांच करने वाली समिति में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस और एक अन्य मामलों के जानकार व्यक्ति को रखा जाता है.

अविश्वास प्रस्ताव दोनों सदनों में लाये जाने पर अध्यक्ष मिलकर एक संयुक्त जांच समिति बनाते हैं. जांच होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या अध्यक्ष को सौंपती है है फिर उसे सदन में पेश किया जाता है. दोषी पाए जाने पर वोटिंग कराई जाती है. प्रस्ताव पारित होने के लिए कम से कम दो तिहाई का समर्थन मिलना ज़रूरी है. प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद इसे मंज़ूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजा जाता है. राष्ट्रपति इस पर अंतिम फैसला लेते हैं.

First published: 21 April 2018, 9:21 IST
 
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