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छत्तीसगढ़ का मदकू द्वीप, जहां दबी है 11वीं सदी की एक सभ्यता

शिरीष खरे | Updated on: 18 August 2016, 7:24 IST
(कैच न्यूज)

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से बिलासपुर हाइवे पर कोई 80 किलोमीटर दूर है बेतलपुर गांव. यहां से मदकू द्वीप के लिए रास्ता मुड़ता है. लगभग 4 किमी लंबी यह सिंगलेन सड़क बारिश में जगह-जगह से उखड़ रही है. इस पर अधिकतम 20 किमी रफ्तार से ही कार चल सकती है.

हम मदकू द्वीप से ठीक पहले शिवनाथ नदी के किनारे तक पहुंच चुके हैं. धमतरी के गंगरेल बांध से पानी छोड़े जाने से नदी उफान पर है. नदी पर बना एनीकट का रपटा भी डूबा हुआ है. उस पर चल कर मदकू के टापू पर पहुंचना जान जोखिम में डालने जैसा है. हमारे लिए द्वीप के रहस्यों को जानने की उम्मीद टूटती दिखती है.

इस बीच, उफनती नदी में चल रही डोंगी देखकर आंखों में थोड़ी चमक आती है. ये डोंगी आसपास के केवट मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल करते हैं. डोंगी नदी के किनारे आई तो सरगांव से हमारी यात्रा में जुड़े जोगिन्दर सिंह ने आंधू केवट से बात की. वह थोड़ा ना-नकुर करने के बाद हमें नदी पार कराने को तैयार हो गया. डोंगी में केवट के साथ चार लोग ही बैठ सकते हैं. उफनती नदी को डोंगी से पार करने का यह नया अनुभव है. सभी साथियों के चेहरे पर थोड़ा  तनाव साफ दिखता है. लेकिन, मदकू द्वीप तक जाने का उत्साह भी है. खैर, हम डोंगी पर सवार हो गए. कुछ देर में द्वीप के किनारे लगते ही सभी के चेहरे दमक उठे. स्वाभाविक भी है, क्योंकि सभी के चेहरों पर तनाव की जगह उत्साह साफ दिखने लगा.

नदी के बहाव ने द्वीप को दो हिस्सों में बांट दिया है

शिवनाथ नदी के पानी से घिरा मदकू द्वीप आम तौर पर जंगल जैसा ही है. लंबे अरसे से यहां काम कर रहे भगवती प्रसाद मिश्रा बताते हैं, "शिवनाथ नदी के बहाव ने मदकू द्वीप को दो हिस्सों में बांट दिया है. एक हिस्सा लगभग 35 एकड़ में है, जो अलग-थलग हो गया है. दूसरा करीब 50 एकड़ का है, जहां 2011 में उत्खनन से पुरावशेष मिले हैं." अब हम इसी द्वीप पर खड़े हैं.

नदी किनारे से पुरावशेष के मूल अकूत खजाने तक पहुंचने की पगडंडी के दोनों तरफ पेड़ों के घने झुरमुट हैं. यहां नदी से बहते पानी की कलकल आती आवाज रोमांचित करती हैं. चलते-चलते जैसे ही पुरातत्व स्थान का द्वार दिखता है, हमारी उत्सुकता भी शिवनाथ नदी की माफिक उफान पर होती है. मुख्य द्वार से अंदर पहुंचते ही दायीं तरफ पहले धूमेश्वर महादेव मंदिर और फिर श्रीराम केवट मंदिर आता है. थोड़ी दूर पर ही श्री राधा कृष्ण, श्री गणेश और श्री हनुमान के प्राचीन मंदिर भी हैं.

हमारा लक्ष्य 19 मंदिरों के उन समूह को देखने की है, जो 11वीं सदी के कल्चुरी कालीन पुरावैभव की कहानी बयां करते हैं. यहां उत्खनन के साक्षी रहे छत्तीसगढ़ के संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पर्यवेक्षक प्रभात कुमार सिंह ने एक पुस्तक में वर्णन किया है, "इसे मांडूक्य ऋषि की तपो-स्थली के रूप में तीन दशक पहले प्रोफेसर डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने चिन्हित किया था. संभवत: यही पर ऋषि ने 'माण्डूक्योपनिषद्' की रचना की. संविधान में समाहित किए गए  'सत्यमेव जयते' भी इसी महाकृति के प्रथम खंड का छठवां मंत्र है."

कैच न्यूज

वर्ष 1985 से यहां श्रीराधा कृष्ण मंदिर परिसर में पुजारी के तौर पर काम कर रहे वीरेंद्र कुमार शुक्ला बताते हैं, "पुरा मंदिरों के समूह वाला गर्भगृह पहले समतल था. जब खुदाई हुई तो वहां 19 मंदिरों के भग्नावशेष और कई प्रतिमाएं बाहर आईं. इनमें 6 शिव मंदिर, 11 स्पार्तलिंग और एक-एक मंदिर क्रमश: उमा-महेश्वर और गरुड़ारूढ़ लक्ष्मी-नारायण मंदिर मिले हैं." खुदाई के बाद वहां बिखरे पत्थरों को मिलाकर मंदिरों का रूप दिया गया.

आम तौर पर हर साल यहां आने वाले रामशिखर सवाल करते हैं, "पांच साल में इस पुरावैभव के संरक्षण को लेकर अपेक्षित काम नहीं हो पाया. लोहे का डोम बना कर इन मंदिरों को धूप और बरसात से सुरक्षित तो कर लिया गया, लेकिन सदियों पुरानी इस विरासत की पुख्ता सार-संभाल करने वाला कोई नहीं है. क्या आधे-अधूरे साधनों से हम इस धरोहर को बचा पाएंगे."

यह सवाल इसलिए भी अहम हो चुका है, क्योंकि मुंगेली और बलौदाबाजार जिले को यहां मिलाने वाली शिवनाथ नदी के किनारों को रेत माफिया जिस तरह से खोखला कर रहा है, वह इस मदकू द्वीप के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है. छत्तीसगढ़ के इस 'मोहनजोदड़ो' खजाने के जमीन में छिपे अनमोल रहस्यों को बाहर लाने के लिए गहन शोध के साथ ही राजकीय संरक्षण भी जरुरी है. इन मूक पत्थरों के पीछे इनके बनने की कहानी होगी. इन्होंने भी तो कई सभ्यताओं को बनते-बिगड़ते देखा है. सवाल है कि  11वीं सदी की यह सभ्यता यहां लुप्त क्यों हुई? क्या इस रहस्य से भी कभी पर्दा उठेगा?

First published: 18 August 2016, 7:24 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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