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उना के गोरक्षकों के लिए महाराष्ट्र में सरकारी नौकरी पाने का अवसर

चारू कार्तिकेय | Updated on: 11 February 2017, 5:48 IST

गुजरात के उना में मृत गाय की चमड़ी उतारने वाले जिन दलितों को सरेआम पीटा गया, वे घटना के बाद से बेहद तनाव में हैं, उनकी रातों की नींद उड़ गई है और मनोचिकित्सकों से इलाज करवा रहे हैं. इस घटना से कई लोग विचलित हैं लेकिन महाराष्ट्र सरकार एकदम नहीं. यहां का पशु पालन मंत्रालय आधिकारिक तौर पर उना के गोरक्षकों जैसे युवाओं की नियुक्ति करना चाहता है.

विभाग की ओर से जारी पशु कल्याण अधिकारियों की भर्ती के लिए 1900 से ज्यादा आवेदन आए हैं. ये अधिकारी ‘बीफ पर प्रतिबंध’ लगाने में प्रभावी भूमिका निभाएंगे. स्मरण रहे कि महाराष्ट्र सरकार ने 2015 में महाराष्ट्र पशु संरक्षण अधिनियम-1995 में संशोधन के तहत गोवध पर प्रतिबंध लगा दिया था. उसके बाद से राज्य में गाय और गौवंश को मारना दंडनीय अपराध है. इस अपराध की सजा पांच साल की जेल और 10,000 रूपए का जुर्माना भी हो सकता है.

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मई 2016 में पशुपालन आयुक्त ने कथित तौर पर पशु कल्याण संगठनों में उक्त पदों की भर्ती के लिए नियुक्तियां निकाली थी. आयुक्त कार्यालय इस बात पर खासा चिंतित था कि राज्य के कुछ भागों में बीफ पर प्रतिबंध के कानून का पालन नहीं किया जा रहा. इसलिए इसे सरकार से बाहर के व्यक्तियों की जरूरत थी जो यह प्रतिबंध लगाने में पुलिस की मदद कर सकें.

उना, मंदसौर और दादरी में पुलिस सतर्कता

मध्यप्रदेश के मंदसौर में तीन दिन पहले ही 26 जुलाई को सुरक्षा बलों द्वारा इन पशु कल्याण कार्यकर्ताओं से जिस प्रकार मदद ली गई उसे एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. यहां गोरक्षकों के झुंड ने दो मुस्लिम महिलाओं को पुलिस की मौजूदगी में रेलवे स्टेशन पर बुरी तरह पीटा. इस झुंड में ज्यादातर महिलाएं थीं. उन्होंने इन दो महिलाओं को थप्पड़ और लात मारी और गाली-गलौज की.

रही सही कसर गोभक्त पुलिस वालों ने पूरी कर दी. उन्होंने उन दो महिलाओं को जेल भेजा, जिनके साथ मारपीट की गई, उन्हें नहीं जिन्होंने की थी. जिस समय यह घटना घटी, गुजरात के दलित उना की घटना के विरोध में आत्महत्या के प्रयास कर रहे थे.

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गौरतलब है कि उना मामले में पुलिस की भूमिका भी चिंताजनक है. दलितों के साथ मारपीट पुलिस स्टेशन से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर हुई. दूसरा, उस वक्त वहां तैनात पुलिसकर्मियों के खिलाफ ड्यूटी में लापरवाही बरतने के आरोप की जांच चल रही है. जिनके सामने गोरक्षक दलितों को चेन से बांध कर रास्ते भर मारपीट करते, घसीटते हुए पुलिस थाने लाए थे.

इसी प्रकार गत वर्ष सितम्बर महीने में दिल्ली के निकट दादरी में पुलिस बीफ खाने के शक में मारे गए अखलाक को गांव वालों से नहीं बचा पाई, जिन्होंने उसे पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया.

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अखलाक की मौत की जांच में पुलिस की भूमिका अब भी संदिग्ध है. अब तक पुलिस यह साबित नहीं कर पााई है कि खाया गया मांस बीफ था कि नहीं. बीफ न होने की स्थिति में भी जान से मारना तो न्याय संगत नहीं है. कानून हाथ में लेने की हिम्मत लोगों में कैसे आआ गई है. अखलाक की मौत के साथ ही गाय के नाम पर देश भर में हो रही राजनीति थम जानी चाहिए थी जो पिछले दो साल से देश भर में सुलगी हुई है.

गोरक्षकों का समर्थन

अफसोस कि इन गोरक्षकों का समर्थन लगातार बढ़ रहा है. इसका श्रेय फौरी तौर पर ऊपर से दिखाई देने वाली चुप्पी को तो जाता ही है लेकिन असलियत में इन गोरक्षकों को केंद्र सरकार और संघ परिवार के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन प्राप्त है.

इन घटनाओं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेता अमित शाह ने एक बार भी अफसोस नहीं जताया और न ही इनके खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए. बल्कि इस संकीर्ण राजनीति के चलते कई बार दबे छिपे स्वर में यह पूछ लिया जाता है कि अखलाक की मौत में गलत क्या था?

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अब महाराष्ट्र सरकार इन ‘गोरक्षकों’ को आधिकारिक तौर पर मान्यता देने पर तुली है और जब वे अगली बार किसी ऐसे ही 'शिकार' पर धरचढ़ने के लिए तैयार हों तो उनका पूरा समर्थन करने को भी तैयार रहें.

शुक्र है राज्य सरकार के इस इरादे को वास्तविकता में बदलने की राह में एक रोड़ा है. इन नियुक्तियों पर अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति को करना है. जिसके पास ये आवेदन भेज दिए गए हैं.

बचाव का एकमात्र तरीका

इस समिति के एक व्यक्ति ने कथित तौर पर चिंता व्यक्त की है कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि ये अधिकारी कानून के दायरे में रहकर काम करेंगे. इन दिनों इस दिशा में काफी गतिविधियां बढ़ गई हैं. कई बार अप्रिय घटनाएं घट जाती हैं. इस सदस्य ने कथित तौर पर यह भी खुलासा किया कि पूर्व पशुपालन आयुक्त एसएस भोंसले ने सेवानिवृत्ति के बाद यह सुझााव दिया था. चूंकि इस संबंध में अगला कदम उठाने को लेकर समिति में कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया, इसलिए इन चिंताओं पर अब गंभीर रूप से विचार किया जाएगा.

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बाॅम्बे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश सीएस धर्माधिकारी के नेतृत्व में इस समिति की बैठक अगस्त मेें होगी. उम्मीद है न्यायाधीश इस सुझाव के पीछे की विकृत रूपरेखा को समझेंगे और इसके गंभीर परिणामों की आशंका को ध्यान में रखते हुए इसे खारिज करेंगे.

First published: 31 July 2016, 7:24 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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