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'मेरा मानना है कि सरकारी ठिकानों पर आतंकी हमले बढ़ेंगे'

क़मर आग़ा | Updated on: 3 October 2016, 18:44 IST
QUICK PILL
  • जम्मू-कश्मीर में सेना के कैंपों पर हो रहे हमले कोई नई बात नहीं हैं. बस अब हमलों में तेज़ी आ गई है.
     

महज़ 15 दिनों के भीतर सेना और अर्द्धसैनिक बलों के कैंप पर आतंकी हमले की यह दूसरी कोशिश हुई है. इस बार आतंकी हमारा एक जवान शहीद कर भागने में कामयाब रहे. हालांकि अभी तक यह साफ़ नहीं है कि 46 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कैंप के नज़दीक हमला करने वाले घुसपैठिए थे या स्लीपर सेल के सदस्य.

मेरा मानना है कि सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था कितनी भी पुख़्ता कर दी जाए, घुसपैठ या इस तरह के हमले नहीं रोके जा सकते. जम्मू-कश्मीर से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा भौगोलिक रूप से इतनी जटिल है कि आतंकी अपना रास्ता बना ही लेते हैं. आधी-आधी पहाड़ियां दोनों तरफ़ बंटी हुई हैं. आतंकी इन्हीं पहाड़ियों के दर्रों और संकरे रास्तों से घुसपैठ कर लेते हैं.

इससे इतर अगर किसी आतंकी संगठन को सरकार, सरकारी तंज़ीम या स्थानीय लोगों की मदद मिलने लगे तो उसका नेटवर्क नहीं भेदा जा सकता. बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में भी इनके मददगारों की तादाद में तेज़ी आई है. मुझे सुनने में आया है कि हाल ही में कश्मीर के कुछ लड़के सरहद उस पार चले गए हैं लेकिन अभी इसकी पुष्टी नहीं हो सकी है.

बुरहान वानी की हत्या से भड़के कश्मीरियों को भी लगने लगा है कि पत्थरबाज़ी और हड़ताल से इस आंदोलन को ज़िंदा नहीं रखा जा सकता. हालिया आंदोलन घाटी में तकरीबन 10 हज़ार करोड़ का नुकसान कर चुका है. सीज़न ख़त्म हो गया और सैलानी नहीं आए. सारे होटल इस दौरान खाली रहे और दुकानें बंद. लिहाज़ा, कश्मीरी मूवमेंट का नेतृत्व कर रहे संगठनों को रणनीति बदलनी पड़ी है. 

पाकिस्तान को पहली बार गहरी चोट

मुझे लगता है कि ये हमले थमने की बजाय बढ़ेंगे. घाटी में हुए जान-माल के नुकसान और उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक इसकी दो बड़ी वजहे हैं. इस कार्रवाई से लश्कर चीफ़ हाफ़िज़ सईद काफ़ी बौखलाए हुए हैं. उन्होंने पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर हाल में ख़ूब उधम मचाया है और हिन्दुस्तान की लानत-मलामत करने के अलावा दिल्ली जैसे बड़े शहर पर हमले की धमकी दी है. पाकिस्तान की तरफ़ से हो रही ऐसी प्रतिक्रियाएं साफ़ करती हैं कि उसे भारत ने गहरी चोट दी है.

पाकिस्तान, वहां जमे आतंकी संगठन और घाटी में भारत से नाराज़ कश्मीरियों के बीच बढ़ता तालमेल एक ऐसी स्थिति है जिसने आतंकी संगठनों का नेटवर्क ज़्यादा ताक़तवर या यूं कहें कि अभेद्य बना दिया है. ये अभी भारत पर और हमले करेंगे.

सेना के कैंपों पर हमला नई बात नहीं है, बस इसमें तेज़ी आ गई है. घुसपैठियों के निशाने पर हमेशा से पुलिस हेेडक्वॉर्टर, सरकारी इमारतें वग़ैरह ही होती हैं. सच कहूं तो कश्मीर में सक्रिय जमात-ए-इस्लामी, हुर्रियत वग़ैरह से कहीं ना कहीं इन्हें मदद पहुंच रही है. अब इन्हें मिलिटेंसी ही एक मात्र उपाय नज़र आ रही है. पाकिस्तान हमेशा से मिलिटेंसी का समर्थन करता रहा है.

मगर बंदूक के बल पर जंग फ़तह करने वालों को ईराक़, सीरिया का हश्र देखना चाहिए. यह एक खोखली और मध्ययुगीन सोच है. पाकिस्तान ने अगर इस लाइन को नहीं बदला तो उसका हाल भी वही हो जाएगा जो पिछले 10-15 सालों में बाकी मुस्लिम देशों का हुआ है. कश्मीरी भी कहीं के नहीं रहेंगे.

(मध्यपूर्व और दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ क़मर आग़ा से शाहनवाज़ मलिक की बातचीत पर आधारित)

First published: 3 October 2016, 18:44 IST
 
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