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'ये लड़ाई नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के बीच है'

आशुतोष | Updated on: 11 January 2016, 19:50 IST
QUICK PILL
आशुतोष आम आदमी पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता हैं. उनका मानना है कि डीडीसीए घोटाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच बड़ी राजनीतिक लड़ाई का छोटा सा अंश है.

दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट अथॉरिटी (डीडीसीए) घोटाले से देश का राजनीतिक मानचित्र बदल सकता है. हो सकता है कि पहली नज़र में ये क्रिकेट में पैसे की हेराफेरी का साधारण मामला लगे जिसके दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए कड़ी लड़ाई लड़नी होगी. लेकिन ये इस पूरे मामले को देखने का बहुत ही चालू नजरिया होगा.

डीडीसीए घोटाले ने भारतीय राजनीति के सबसे बड़ी सड़ांध को उजागर कर दिया है. इसने सत्ताधारियों का चेहरा बेनकाब कर दिया है. इसने दिखा दिया है कि भ्रष्टाचार की ख़िलाफ़ लड़ाई कितनी ख़तरनाक हो सकती है. ये साफ़ हो गया कि भ्रष्टाचार को पूरी तरह सफ़ाया ही इस बीमारी का एकमात्र इलाज है. 

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जब तक भ्रष्टाचार के दोषी प्रभावशाली लोगों को सज़ा नहीं होगी तब तक ये सिस्टम ईमानदार और स्वच्छ भारत का सपना देखने वालों के लिए दुःस्वप्न ही बना रहेगा.

इस लड़ाई के एक सिरे पर नरेंद्र मोदी हैं तो दूसरे सिरे पर अरविंद केजरीवाल. मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं. उनका जितना महत्वाकांक्षी नेता देश ने पिछले कुछ दशकों में शायद ही देखा हो. दूसरा छुपा रुस्तम है जिसे चुनौती देना पसंद है. अरुण जेटली तो महज एक संयोग भर हैं.

मोदी और केजरीवाल के पास एक दूसरे को नापसंद करने की लिए पर्याप्त कारण हैं. केजरीवाल को दोनों के बीच हुए पहले मुक़ाबले में हार मिली थी. साल 2014 के लोक सभा चुनाव में केजरीवाल ने मोदी के ख़िलाफ़ वाराणसी से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था. मोदी जनता के प्यारे थे, वो लोकप्रियता की लहरों पर सवाल थे. जबकि केजरीवाल को ऐसे आदमी के रूप में देखा गया जो उनका रास्ता काट रहा था. नतीजन, वो हार गये.

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उनका दूसरा मुकाबला दिल्ली विधान सभा चुनाव में हुआ. उस समय आम आदमी पार्टी पस्तहाल थी. हर किसी को लग रहा था कि मोदी को रोकना असंभव है लेकिन ये असंभव संभव में बदल गया. मोदी को अपने जीवन की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा. कथित मोदी लहर के बुलबुले को केजरीवाल ने फोड़ दिया.

हार को आसानी से स्वीकार करना सबके वश की बात नहीं. घायल सिपहसालार पलट के वार जरूर करता है.

जब आम आदमी पार्टी को लगने लगा कि उसने भारी जीत हासिल कर ली है जिससे चीजें बेहतर हो जाएंगी और वो शांति से काम कर सकेगी तभी उसपर हमले होने लगे. पिछले 11 महीने में एक चुनी हुई सरकार को पंगु बनाने का हर प्रयास किया गया है. एक बार तो सरकार को गिराने के साजिश की गयी लेकिन अदालत के हस्तक्षेप के कारण ऐसा हो न सका.

दिल्ली में मिली हार के बाद मोदी को समझ आ गया कि अगर आम आदमी पार्टी के विचार को दिल्ली से आगे बढ़ने दिया गया तो ये आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा विचार बन जाएगा. जिससे मोदी और बीजेपी की नियति बदल जाएगी. इसलिए वो इस पार्टी को पैदा होते ही खत्म कर देना चाहते हैं.

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अगर केजरीवाल और उनकी पार्टी एक क्षेत्रीय नेता और पार्टी होते और उनकी कोई राष्ट्रीय योजना नहीं होती तो मोदी को उनसे कोई तकलीफ नहीं होती. दूसरी राष्ट्रीय पार्टियों के उलट आम आदमी पार्टी में एक राष्ट्रीय अपील है. इसे बीजेपी और कांग्रेस के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. इसे भारतीय राजनीति में जो कुछ भी ग़लत है उसके समाधान के रूप में देखा जा रहा है.

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के रूप में शुरू होकर ये राजनीतिक पार्टी बनी. इसने सभी सत्ता संस्थानों को चुनौती दी. इसने किसी को नहीं बख्शा. भ्रष्टाचार में पगे सिस्टम को बदलकर एक ईमानदार, स्वच्छ और किफ़ायती प्रशासन देने के इसके वादे ने लोगों को आकर्षित किया है.

आम आदमी पार्टी, सिस्टम को आम आदमी के प्रति जवाबदेह बनाने की लड़ाई लड़ रही है. वही आम आदमी जो लोकतंत्र का आधारस्तम्भ है. मोदी ने लोक सभा चुनाव में इस कमी को पूरा करने की उम्मीद जगायी थी जो उनके अब तक के कार्यकाल को देखते हुए एक शगूफा साबित हुआ. मोदी और उनके दोस्त जेटली के लिए चिंता की यही वजह भी है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री के कार्यालय में पड़ा छापा केजरीवाल पर सबसे दुःसाहसी हमला था. इसका मक़सद उन्हें और उनकी पार्टी की छवि को धूमिल करना था. उनकी कोशिश थी कि केजरीवाल और उनकी टीम को भी वो अपने जैसा भ्रष्ट और भ्रष्टाचारियों को पनाह देने वाला साबित कर दें. लेकिन सत्य का अपना तर्क होता है.

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ठोस रूप से कुछ भी नहीं प्रमाणित कर पाने का अक्सर उलटा नुकसान होता है. इस बार पलटवार बहुत ज्यादा घातक था. इसकी आंच में मोदी के सबसे भरोसेमंद केंद्रीय मंत्री झुलस गये. उनके पास अपने किए की कोई विश्वसनीय सफाई नहीं है.

इसे आम आदमी पार्टी की विश्वसनीयता का प्रमाण माना जाना चाहिए कि जनता को यकीन है कि जेटली मासूम नहीं हैं और डीडीसीए में हुआ कथित घोटाला उनकी नाक के नीचे हुआ. उनका द्वारा दायर मानहानि का मुकदमा पूरे मामले पर पर्दा डालने की एक कोशिश भर है. दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार पर छापा मारना तो महज एक बहाना था.

क्या शहंशाह अपने वज़ीर की कुर्बानी देंगे?

ये लड़ाई यहीं खत्म नहीं होगी. दोनों नेता अपनी जुझारू प्रवृत्ति के लिए जाने जाते हैं. ये लड़ाई किसी एक के अंत के बाद ही रुकेगी. डीडीसीए तो बस इसकी शुरुआत भर है.

शहंशाह को अपने वज़ीर की रक्षा करनी है लेकिन शहंशाह अपनी रियासतों को दांव पर नहीं लगाया करते. उसे बचाने के लिए वो कई बार अपने वज़ीर को भी आसानी से कुर्बान कर देते हैं. इसका ये मतलब भी नहीं होगा कि शंहशाह ने हार मान ली.

पंजाब में विधान सभा चुनाव होने में बहुत देर नहीं है. आम आदमी पार्टी पहले ही वहां जगह बनाना शुरू कर चुकी है. पंजाब में जीत मिली तो आम आदमा पार्टी के लिए देश का दरवाज़ा खुल जाएगा. मोदी के लिए ये ख़तरनाक संकेत होगा. इसलिए उन्हें उसके पहले ही हमला करना होगा.

डीडीसीए मसले से ये भी साफ़ हो गया है कि उनके सभी साथी उनसे सहमत नहीं हैं. बिहार विधान सभा में मिली हार के बाद शहंशाह की ताक़त कम हुई है. हो सकता है कि उन्हें अपने ही लोगों से लड़ाई लड़नी हो.

केजरीवाल के साथ-साथ उन्हें भीतरखाने भी लड़ाई लड़ने होगी इससे ये और रुचिकर हो जाएगी. चाहे जो भी हो डीडीसीए मामला भविष्य के लिए निर्णायक साबित होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. इनसे संस्थान का सहमत होना आवश्यक नहीं)

First published: 11 January 2016, 19:50 IST
 
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