Home » इंडिया » This is not the ABVP we knew: What happened at Ramjas & why the Sanghis should be ashamed
 

हमारे ज़माने का एबीवीपी ऐसा नहीं था, संघ को शर्मिंदा होना चाहिए

दिलीप सिमियन | Updated on: 25 February 2017, 14:31 IST

रामजस कॉलेज में बिलकुल शांति से हो रहे सेमिनार पर हिंसक हमला अपने आपमें अनोखी घटना है, इसलिए नहीं कि यह हमला आरएसएस से संबद्ध एबीवीपी समर्थकों ने किया. एबीवीपी से तो ऐसी ही उम्मीद की जा सकती है. उनमें हमेशा हिंसा करने और डराने-धमकाने की प्रवृति रही है.


यह घटना पुलिस की निर्लज्ज उदारता के कारण अनोखी है. उन्होंने एबीवीपी के समर्थकों को शांत लोगों पर पत्थर फेंकने दिया. एक शिक्षिका पर हमले किए गए, उन पर एक कुर्सी उछालने के बाद लगभग 5 घंटे घेर कर रोका गया. कई छात्रों और पत्रकारों के साथ हाथापाई, हमला और गाली-गलौज की गई.


दंगे और घायल करने जैसे संज्ञेय अपराधों के खिलाफ कार्रवाई करना पुलिस का कर्तव्य है और उसका अधिकार भी. वे मौके पर कार्रवाई कर सकते थे. इसकी बजाय उन्होंने घंटों आपराधिक गतिविधियां चलने दीं, मानो वे बदमाश दंगाई उनके लिए महज नटखट बच्चें हों.


टीचर्स ने उस घटना का विस्तृत ब्यौरा तैयार किया है, जिसे मैं उपलब्ध होने पर पोस्ट करूंगा. मैं फिलहाल रामजस के एक वरिष्ठ छात्र की उस समय की तत्काल प्रतिक्रिया पोस्ट कर रहा हूं , जो उस घटना का चश्मदीद गवाह था.

 

केंद्रीय मंत्री का हल्कापन



पर मुद्दे की बात यह है कि वहां, जिसे मैं फिर दोहरा रहा हूं कि सेमिनार में भाग लेने वालों की तरफ से कोई उत्तेजना नहीं थी. वे बस बोल रहे थे और सुन रहे थे. एक केंद्रीय मंत्री कैसे कह सकता है कि यह कॉलेज भारत-विरोधी केंद्र बन रहा है? क्या उन्होंने पता किया था कि वहां कैसे नारे लगाए जा रहे थे?


यह बिलकुल गैर-जिम्मेदाराना बयान है. इससे पता चलता है कि सरकार के उच्च अधिकारी अपने तथाकथित राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसा को न्यायसंगत ठहराना चाहते हैं. क्या उनका काम गुंडागर्दी को प्रोत्साहन देना है? क्या उन्होंने सेमिनार का एजेंडा देखा और उन्हें पहले से मालूम हो गया कि वहां क्या कहा जाएगा और किस पर विमर्श होगा?

 

वो एबीवीपी नहीं है

 

जिस एबीवीपी को हम जानते थे, यह वह नहीं है आज एबीवीपी वह नहीं है, जो कुछ दशकों पहले हुआ करती थी. जब मैं रामजस में (1974-94) पढ़ाता था, मुझे याद है, एबीवीपी के लड़के मेरी सोवियत इतिहास की कक्षा में आते थे. शायद वे सोचते थे कि उन्हें एक आदर्श अतीत का गैर-प्रचारात्मक विचार मिलेगा.


मुझे 1988 की शुरुआत का ‘तमस’ धारावाहिक पर एक और सेमिनार याद आ रहा है, जहां उन्होंने मुझे व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था. मैं वहां नहीं बोला, पर मेरे मित्र पुरुषोत्तम अग्रवाल जरूर बोले और वह भी पूर्व दिल्ली भाजपा सांसद और एबीवीपी के छात्र नेता के सामने.


सीरियल को लेकर जो उन्हें अपत्ति थी, उसका पुरुषोत्तम ने जबर्दस्त खंडन किया, पर उन्हें सम्मान से सुना गया था. आज वह सब कहने पर उन पर हमला होता. उसके बाद, कई धमकियों के चलते, हमने रामजस में ‘तमस’ पर एक बैठक रखी.

उन दिनों एबीवीपी के लड़कों में कम से कम अपने टीचर्स के लिए तो सम्मान था. मैं यह भी कह सकता हूं कि कांग्रेस प्रशासन के द्वारा सीता राम माली को पीड़ित करने पर रामजस में जो संघर्ष (1981-83) में चला था, उसे लेकर कइयों ने अपने मूल्य सहज बदल दिए थे, जबकि हमने उन्हें उत्साहित नहीं किया था.


मैंने अपने स्टूडेंट्स को कभी आदर्श नहीं सिखाए, सिवाय अहिंसा और इंसानी जीवन का सम्मान करने के. आज के एबीवीपी छात्रों ने टीचर्स को सम्मान देने के आधारभूत मूल्य को भी छोड़ दिया है. कुछ टीचर्स को गंदा बोलते हैं और कुछ नाम लेकर निशाना बनाते हैं. भारत माता की जय बोलते हुए महिला टीचर्स सहित शिक्षकों के साथ हाथापाई और गाली-गलौज- क्या यही भारतीय संस्कृति है? यह अब भारतीय जनता पार्टी नहीं है, मोदी की जनता पार्टी है. ईश्वर भारत की मदद करे.

 

विचारों को आने दें


लोगों को आपत्ति जाहिर करने का अधिकार है, चाहे हमें उनके विचार पसंद आएं या ना आएं. किसी भी परिस्थिति में उन पर हिंसक हमला नहीं होना चाहिए. अगर लोगों को कुछ विचार पसंद नहीं हैं, तो उन्हें सवाल करने का अधिकार है और वे वक्ता की आलोचना भी कर सकते हैं. किस कानून के तहत उन्हें वक्ता और श्रोता पर हिंसक हमला करने की अनुमति है? क्या ऐसा कोई कानून है, जिसके तहत आप हिंसक अपराध कर सकते हैं, यह कहते हुए कि आप ‘राष्ट्रवादी’ हैं. क्या आपका तथाकथित देश-प्रेम कानून का उल्लंघन करने का अनुमति-पत्र है.


संघी गुस्से में थे कि स्टूडेंट्स ने उनके हंगामे का विरोध किया, परिसर में शांति मार्च के जरिए. यह मार्च वे बोलने और एसेंबली की आजादी के लिए निकाल रहे थे जिसके नारे जानबूझकर गलत समझे गए, अलगाववादी बताकर. अब ठीक किए गए वीडियो सर्कुलेट किए जा रहे हैं. फ्रीडम के लिए इस्तेमाल हिंदी शब्द का अपराधीकरण हो गया है. क्या देश और भाषा आरएसएस द्वारा सुधारी जाएगी? क्या गृहमंत्री और दिल्ली पुलिस कमिश्नर कृपा करके शब्दों और मुहावरों का शब्दकोश देंगे, जो सरसंघचालक प्रमुख को मान्य हों?


पुलिस दंगाइयों के साथ कैसे नरमी बरत सकती है, जब शांत नागरिकों पर हमला हो रहा हो? क्या वे संघ परिवार के भाड़े के आदमी हैं? उन्होंने भारत के संवैधानिक पद की शपथ ली है या वर्तमान सरकार के लिए. अपने सामने हो रहे अपराध को जब एक पुलिस अधिकारी इस नजर से देखता है, तो उसकी नजरों में फासीवाद अत्याचार के कीटाणु हैं.

 

रामजस घटना


कुछ यही रामजस कॉलेज में हुआ. मैंने अपनी आंखों से मंगलवार 21 फरवरी को देखा, जब मुझे 1984 की सामूहिक हत्या पर जन प्रतिक्रिया की थीम पर बोलना था (दोपहर 3 बजे). जब मैं परिसर में आया दंगा चरम पर था और मैं अपना व्याख्यान नहीं दे सका. ऐसा दृश्य मैंने कई बार देखा है, जब रामजस में टीचर था.


पत्थर फेंके गए, कांच तोड़े गए, गाली-गलौज हुआ. इस तरह की गतिविधियां संघ के उच्च राजनीतिक नियंत्रकों के निर्देशों के बिना नहीं हो सकती थीं. उनके कार्यकर्ताओं को पता है, उनके साथ सख्त कार्रवाई नहीं होगी, वे जानते हैं कि वे अपराध कर सकते हैं और छूट जाएंगे. ये कानून के विरुद्ध अपराध है, और विस्तृत मायने में एक सर्वसत्तावादी प्रोजेक्ट के एक्टिविस्ट द्वारा हमारे दिमाग पर आघात करने का संकेत है. ये लोग अपने विचारों को हम पर थोपना चाहते हैं और अपने हिंसक कारनामों के लिए राजनीतिक शक्ति को कवच के रूप में इस्तेमाल करते हैं.


अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना हमारा दायित्व है. जब तक हम इसका मजबूती से विरोध नहीं करेंगे, इस तरह के हमले और होंगे. हम सब रामजस से हैं. मैं यहां 1930 में नाजीवाद पर लिखी फ्रेंज न्यूमैन की किताब ‘बेहीमोथ, द स्ट्रक्चर एंड प्रेक्टिस ऑफ नेशनल सोशलिज्म’ का कुछ हिस्सा सामने रखना चाहता हूं.

 

(प्रतिक्रांति) ‘...कई उपाय किए, पर शीघ्र जान गए कि वे स्टेट मशीन की मदद से ही सत्ता में आ सकते हैं, उसके खिलाफ जाकर कभी नहीं...1920 के कैप पुच्छ और 1923 के हिटलर पुच्छ ने यह सिद्ध कर दिया है...प्रतिक्रांति के केंद्र में न्यायपालिका है. प्रशासनिक कार्यों के विपरीत, जो सुविधा और मुनाफे के विचार पर आधारित है, न्यायिक फैसले कानून पर आधारित हैं, यानि सही या गलत पर, और वे हमेशा प्रचार की सुर्खियों का आनंद लेते हैं.’ राजनीतिक संघर्ष में कानून शायद सब हथियारों में सबसे घातक है, खासकर प्रभामंडल के कारण, जो सही और न्याय की अवधारणा के चारों ओर होता है.


हॉकिंग के मुताबिक ‘सही’, मनोवैज्ञानिक रूप से एक दावा है, जिसका उल्लंघन नाराजगी से ज्यादा किया जाता है, किसी को राहत से मिलने वाली संतुष्टि से ज्यादा. नाराजगी उस पैशन तक जा सकती है, जिसके लिए लोग अपना जीवन और संपत्ति खतरे में डाल सकते हैं. इस तरह से वे कभी मुनाफे के लिए नहीं करेंगे.’


जब यह ‘राजनीतिक’ बन जाता है, तो न्याय से उन लोगों में नफरत और हताशा पनपती है, जो उसे हमला करने के लिए चुनती है. दूसरी ओर यह जिनका पक्ष लेती है, न्याय के मूल्य के लिए उनमें गहरी घृणा पनपती है. वे जानते हैं कि उसे सत्ताधारी खरीद सकते हैं.


एक राजनीतिक पार्टी को अन्यों की कीमत पर मजबूत करने के लिए, दुश्मनों को कम करने के लिए और राजनीतिक सहयोगियों को मदद करने के लिए, फिर कानून उन बुनियादी विश्वासों पर आघात करने लगता है, जिस पर हमारी सभ्यता की परंपरा टिकी हुई है.

 

हिंसक सेंसर के कुछ नमूने

 

वेन्यू फॉर अ स्पीच ऑनतमस- क्रोनिकल ऑफ एन इवेंट देट शुड नेवर हेव

जावेद आनंद- मिस वदुद, हम शर्मिंदा हैं

एके रामानुजन का निबंध, जिसे डीयू की अकादमिक परिषद ने सेंसर किया.

एके रामानुजन के काम जिन्हें डीयू के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया.

सांभाजी ब्रिगेड ने 2004 में पुणे में भंडारकर इंस्टीट्यूट को तोड़-फोड़ दिया.

उलेमा अब तसलीमा नसरीन के निष्कासन की मांग कर रहे हैं. आइए, हम उनके शांति से जीने और बोलने के अधिकारों की रक्षा करें.

प्रो. इरफान हबीब की एएमयू के माइनोरिटी कैरेक्टर पर टिप्पणी ने हलचल मचा दी.

रुशदी के साहित्यिक काम पर अकादमिक शोध को देवबंद उलेमा ने नुकसान पहुंचाया.

 

First published: 25 February 2017, 9:02 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी