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एक दिन में तीन मरे, 500 घायल, 50 की आंखें फूट गईं, आप कहते हैं कश्मीर में स्थिति सामान्य है?

आदित्य मेनन | Updated on: 9 August 2016, 8:01 IST
(कैच न्यूज)

हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान मुजफ्फर वानी को कोकरनाग में एक मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को एक महीना पूरा हो चुका है. कर्फ्यू और मोबाइल व इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध के बावजूद वानी की हत्या के बाद घाटी में शुरू हुआ विरोध-प्रदर्शन अब तक नहीं रुका हैं.

सरकार का दावा है कि कश्मीर में सामान्य हालात बहाल हो रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है. शुक्रवार यानि पांच अगस्त का दिन प्रदर्शनों की शुरुआत होने के बाद से अब तक का सबसे अधिक खूनखराबे वाला दिन रहा.अब तक दक्षिणी कश्मीर के जिले पुलवामा, अनंतनाग और कुलगाम सबसे अधिक प्रभावित थे. लेकिन शुक्रवार को हिंसा मुख्यतः उत्तरी कश्मीर के सोपोर और कुपवाड़ा जैसे क्षेत्रों और मध्य कश्मीर के बडगाम जिले में हुई.

500

लोगों के घायल होने का अनुमान है पांच अगस्त को. प्रदर्शनकारियों ने श्रीनगर में हजरतबल दरगाह तक मार्च निकालने की कोशिश की लेकिन सुरक्षा बलों ने उन्हें रोक दिया.

दरगाह में शुक्रवार की नमाज अदा करने की इजाजत भी नहीं दी गई. पिछले 27 सालों के दौरान शायद ही कभी ऐसा हुआ हो. लगातार चौथे हफ्ते श्रीनगर के जामिया मस्जिद में शुक्रवार की नमाज नहीं अदा की गई.

3

लोग पुलिस की फायरिंग में शुक्रवार को मारे गए. इनमें सोपोर का दसवीं क्लास का छात्र दानिश रसूल मीर भी शामिल था. पहली मौत बडगाम जिले के चदूरा में मोहम्मद मकबूल वांगे की हुई.रिपोर्टों के मुताबिक सुरक्षा बलों ने प्रदर्शन को रोकने के लिए ऑटोमैटिक हथियारों से फायरिंग की. एक गोली वांगे को सीने में लगी. जब तक वांगे को नजदीक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी. इसके अलावा बडगाम के खान साहिब ब्लॉक के मलनूर गांव के रहने वाले समीर अहमद वानी की भी मौत हो गई.

146

लोग अनुमानतः शुक्रवार को अकेले सोपोर में ही सुरक्षाबलों के हाथों घायल हुए. शुक्रवार के नमाज के बाद एकत्र हुए प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों ने पेलेट और आंसू गैस के गोले छोड़े. कुपवाड़ा जिले में तकरीबन 80 और बडगाम में 40 लोग घायल हुए. खास तौर पर बडगाम जिले के चंदूरा कस्बे में तीखा विरोध प्रदर्शन देखा गया.

50

लोगों को शुक्रवार को सुरक्षा बलों की पेलेट की फायरिंग की वजह से आंख में चोट लगी है. श्रीनगर के डॉक्टरों के मुताबिक इनमें से कई लोगों की आंख की रोशनी भी जा सकती है.

200

के लगभग प्रदर्शन पूरी घाटी में शुक्रवार को हुए. विरोध प्रदर्शन पीर पंजाल और चेनाब घाटी तक फैल गया है.

55

लोग बुरहान वानी की हत्या के बाद शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों में अब तक सुरक्षा बलों के हाथों मारे जा चुके हैं. इनमें से अधिकांश युवा लड़के और महिलाएं थीं.

3000

लोग मोटे तौर पिछले एक महीने में हुए प्रदर्शनों के दौरान घायल हुए हैं. स्थानीय लोगों के अनुमान के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या 6500 तक हो सकती है.

इनमें से काफी लोग पेलेट से घायल हुए हैं. छब्बीस जुलाई की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीआरपीएफ ने बुरहान वानी की मौत के बाद से 2,223 पेलेट कारतूस का इस्तेमाल किया है. सुरक्षा बलों का कहना है कि उनके पास “सबसे कम घातक” विकल्प के तौर पर पेलेट गन ही है.

40

पेलेट आबिद अहमद के सिर से निकाले गये हैं. वह कुलगाम के कुलपोर से है और 11वीं कक्षा का छात्र है. उसकी दो सर्जरी की जा चुकी हैं- एक अनंतनाग में और दूसरी श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसकेआईएमएस) में. इसके बावजूद आठ पेलेट अभी भी उसके सिर में हैं. उसे पुलवामा के तहाब इलाके में 29 जुलाई को ये गोलियां लगीं. उसके मस्तिष्क को काफी नुकसान पहुंचा है. इसके बाद का मामला और भी भयानक है.

300

के लगभग पेलेट रियाज के पेट में मिले. यह बीस वर्षीय युवक एटीएम गार्ड था. उसका शव तीन अगस्त को श्रीनगर के चत्ताबल इलाके में सड़क के किनारे मिला. शाम को कर्फ्यू में ढील के बाद रियाज महज यह देखने गया था कि जिस एटीएम की वह रखवाली करता है, वह काम कर रहा है या नहीं. उसके भाई शकील की कुछ ही दिनों में शादी होने वाली थी.

4 दिन

पेलेट से घायल हुए सबसे छोटे बच्चे की उम्र है. बच्चे को आंख में चोट लगी थी और इलाज के लिए उसे जम्मू और कश्मीर से बाहर ले जाया जाना है.

इंसान की पीड़ा को महज आंकड़ों में पेश करना निर्दयता है. दरअसल इनमें से हर एक मामला एक आपदा है.

जो लोग घायल हुए हैं या जिन लोगों के करीबियों ने अपनी जान गंवा दी है, उनके अलावा ऐसे लोग भी हैं जो हर रोज कड़े अनुभवों से दो-चार हो रहे हैं. ये लोग लगातार बंधकों जैसे स्थिति में रह रहे हैं, कर्फ्यू के कारण कहीं बाहर नहीं जा सकते, रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, अपने आसपास घायलों और मर रहे लोगों को देख रहे हैं.कोई भी आंकड़ा या शब्द उनके दर्द को बयान नहीं कर सकता. खास तौर पर वह शब्द तो बिल्कुल नहीं जो अक्सर सरकार और मीडिया कश्मीर के लिए इस्तेमाल करते हैं- सामान्य स्थिति.

First published: 9 August 2016, 8:01 IST
 
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