Home » इंडिया » Three Presidents have rejected the Gujrat anti-terror Bill
 

तीन राष्ट्रपति खारिज कर चुके हैं गुजकोक विधेयक

सुहास मुंशी | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल के बाद गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम बिल को वापस करने वाले प्रणब मुखर्जी तीसरे राष्ट्रपति हैं. 
  • कैच को दिए गए एक साक्षात्कार में गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले सीधे निर्देशों के बारे में बताया था. श्रीकुमार ने कहा था कि उन्हें कांग्रेस नेताओं को झूठे मामले में फंसाने के निर्देश दिए गए थे.

भारत के राष्ट्रपति ने पांचवीं बार गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम बिल (जीसीटीओसी) को वापस लौटा दिया है. परिणामस्वरूप केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अध्यादेश को वापस लेते हुए संशोधित ड्राफ्ट को पेश करने का फैसला किया है.

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और प्रतिभा पाटिल के बाद विधेयक को वापस करने वाले प्रणब मुखर्जी तीसरे राष्ट्रपति हैं. इस विधेयक को देश का सबसे दमनकारी आतंकवाद विरोधी कानून बताया जा रहा है.

2004 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विधेयक को पहली बार पेश किया गया था. इसके बाद से मामूली संशोधन और अलग-अलग नामों से इसे 2004, 2008, 2009 में और 2015 में कुल पांच बार गुजरात राज्य विधानसभा में पारित किया गया. 

हर बार तत्कालीन राष्ट्रपतियों की तरफ से विधेयक के विभिन्न प्रावधानों में बदलावाें का संकेत देते हुए कर इसे लौटा दिया गया. 

पिछले 12 सालों से वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का समूह गुजकोका को दमनकारी कानून बताता रहा है

तो फिर राज्य सरकार इस कानून को क्यों लाना चाहती है? गुजरात में विपक्षी दल के नेताआें की माने तो, यह विधेयक "लोगों की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि भाजपा के संरक्षण के लिए है."

कैच को दिए गए एक साक्षात्कार में गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले सीधे निर्देशों के बारे में बताया था. श्रीकुमार ने कहा कि उन्हें कांग्रेस नेताओं को झूठे मामले में फंसाने के निर्देश दिए गए थे.

इससे साफ संकेत मिलता है कि कैसे इस विधेयक का दुरुपयोग किया जा सकता है. 

पहली बार विधेयक पेश किए जाने के बाद के पिछले 12 वर्षों के दौरान वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे 'अत्यधिक', 'कठोर' और 'पैशाचिक' कानून बताते रहे हैं. विधेयक के प्रावधानों में से कुछ पर बारीक नजर डालते हैं.

1. प्रावधान

जीसीटीओसी की धारा 16 पुलिस अधिकारियों के समक्ष इकबालिया बयान को अदालत में स्वीकार्य बनाती है. इसके मुताबिक "कम से कम अधीक्षक के पद से ऊपर वाले पुलिस अधिकारी के सामने एक व्यक्ति द्वारा दिया गया बयान अदालत में बताैर सबूत स्वीकार्य होगा." 

परिणाम

कानून बन जाने के बाद पुलिस को किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने आैर उसे अपराधों को कबूल करने के लिए मजबूर करने की शक्तियां मिल जाएंगी. 

2. प्रावधान

यह विधेयक जांच और आरोप पत्र दाखिल करने की अवधि बढ़ाए जाने की सुविधा देता है. यानी इसके लागू होने के बाद जांच-आरोप पत्र दाखिल करने की निर्धारित अवधि 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन की जा सकती है. 

परिणाम

इसका मतलब यह है कि पुलिस किसी को भी अपराध के संदेह में 180 दिनों के लिए जेल में रख सकती है.

3. प्रावधान

यह विधेयक "तार, इलेक्ट्रॉनिक या ओरल कम्यूनिकेशन के इंटरसेप्शन से एकत्र साक्ष्य" को अदालत में स्वीकार्य बनाता है.

परिणाम

निजी बातों को आधार बनाकर सरकार किसी को आरोपी बना सकती है. 

4. प्रावधान

यह कानूनी कार्रवाई से राज्य सरकार को छूट देता है. विधेयक की धारा 25 के मुताबिक, "किसी भी कार्य के लिए राज्य सरकार या राज्य सरकार के किसी भी प्राधिकरण या किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जाएगी."

परिणाम

यदि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है तो राज्य अपना बचाव कर सकता है. सैद्धांतिक रूप से  यह खतरनाक आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) की ही तरह है जो सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत पड़ने पर एक गैर कमीशन प्राप्त अधिकारी (एनसीओ) को भी महज संदेह के आधार पर गोली मारने का अधिकार देता है. 

5. प्रावधान

गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट, 2015 के अंतर्गत किया गया कोई भी अपराध गैर जमानती होगा. 

परिणाम

मतलब कि गुजरात पुलिस ईमेल या फोन पर आपके कम्यूनिकेशन को सुन सकती है. अाैर फिर अाप 180 दिनों के लिए जेल में डाले जा सकते हैं. अापको उस अपराध को स्वीकार करने के यातना दी जा सकती है जो आपने किया ही नहीं है. रिकाॅर्डेड बातचीत को सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है आैर इस आधार पर जमानत अर्जी खारिज की जा सकती है.

भारत में अब तक का सबसे दमनकारी आतंकवाद विरोधी विधेयक

मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड ने कहा, "इस बिल में कई ऐसे प्रावधान हैं जो मौजूदा किसी भी अन्य कानून से अधिक कठोर हैं. मानवाधिकारों के उल्लंघन का बेहद खराब रिकॉर्ड रखने वाली गुजरात पुलिस को ज्यादा शक्तियों देने की जरूरत नहीं है. सरकार ने जिस तरह  से हार्दिक पटेल के खिलाफ कार्रवाई की है, उसे भी देखे जाने की जरूरत है."

ऐसा नहीं है कि इस विधेयक को केवल केंद्र में कांग्रेस सरकार होने या फिर इसके द्वारा नामित राष्ट्रपतियों के होने की वजह से खारिज कर दिया गया. राजग सरकार वाले तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी 2004 में इस बिल को वापस भेज दिया था. उस दौरान केंद्र और राज्य दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी.

राष्ट्रपति कलाम ने बातचीत रिकाॅर्ड किए जाने से संबंधित सेक्शन को हटाने की सिफारिश की थी.

इस बिल में कई ऐसे प्रावधान हैं जो आज देश में मौजूद किसी भी अन्य कानून से अधिक क्रूर हैं

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हाल ही में संचार, सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ ही गृह मंत्रालय ने इस विधेयक का विरोध किया है. हालांकि गुजरात ने इन सभी आपत्तियों को ठुकराते हुए इस विधेयक काे फिर से आगे बढ़ा दिया.

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता कामिनी जायसवाल ने कहा कि उन्हें खुशी है कि राष्ट्रपति ने इस पर विचार करने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि "हमें किसी भी विशेष कानूनों की जरूरत नहीं है. मौजूदा कानूनों का पहले से ही दुरुपयोग हो रहा है. यह गुजरात में काफी पहले से ही दिखने लगा था जब 1990 के बाद टाडा के तहत गुजरात में लोगों को उठाना शुरू कर दिया गया. कानूनों का दुरुपयोग करने के मामले में गुजरात सबसे आगे है."

उन्होंने यह भी कहा कि कई ऐसे मामले दर्ज हैं जिनमें गुजरात पुलिस ने अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले लोगों को आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के नाम पर गिरफ्तार कर लिया.

"यह सभी मामले दर्ज हैं. यह सभी मामले जानकारी में भी हैं. इसलिए मुझे खुशी है कि उन्हें अपने विशेष आतंक निरोधक कानून के लिए ज्यादा अधिकार नहीं मिल रहे हैं."

फिलहाल गृह मंत्रालय ने विधेयक को वापस लेने का फैसला किया है. लेकिन खबर हैं कि गृह मंत्रालय इसमें सुधार कर फिर से अनुमोदन के लिए राष्ट्रपति के समक्ष पेश करेगा. एक बार फिर से लाखों लोगों की स्वतंत्रता और जीवन खतरे में पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

First published: 29 January 2016, 11:50 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

प्रिंसिपल कॉरेसपॉडेंट, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में आने से पहले इंजीनियर के रूप में कम्प्यूटर कोड लिखा करते थे. शुरुआत साल 2010 में मिंट में इंटर्न के रूप में की. उसके बाद मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मेल टुडे में बाइलाइन मिली.

पिछली कहानी
अगली कहानी