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तीन साल बाद झीरम घाटी: खुद शिकार न बन जाएं इसलिए 'शिकार' पर निकल जाते हैं

अजय श्रीवास्तव | Updated on: 11 February 2017, 5:48 IST

यहीं वह जगह है जहां माओवादियों ने देश के सबसे बड़े नरसंहार को अंजाम दिया था. आज तीन साल बाद भी उस रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है. बस्तर में स्थित दरभा के झीरम घाटी में 25 गाडियों के काफिल में निकले 200 कांग्रेसी कार्यकर्ताओं पर 300 से अधिक माओवादियों ने हमला किया था, जिसमें मारे गए 32 लोगों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल, तत्कालीन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा, उदय मुदलियार, दिनेश पटेल और योगेंद्र शर्मा आदि शामिल थे. वहीं, 38 लोग घायल हो गए थे.

आज तीन साल बाद जब पशु-पक्षी भी छांव में दो पल सुस्ता लेते हैं तो झीरम के रहवासी बीहड़ों की खाक छानने निकल जाते हैं. पीछे रह जाते हैं बुजुर्ग, महिलाएं और विकलांग. झीरम गांव के ठोठापारा में ऐसा ही माहौल नजर आ रहा है. गांव की एक झुग्गी के बाहर बैठी बुजुर्ग महिला से जब हमने सवाल किया कि घर में कोई है तो उसने सपाट जवाब दिया, "बाबू लोग पारद (शिकार) में गए हैं."

यह पूछने पर कि शिकार में क्या लाएंगे, उसने जवाब दिया, "जान बचाने निकल जाते हैं." इस इलाके में पारद में जाने का एक ही मतलब है सुरक्षाबलों की गोली का शिकार बनने से बच जाएं. इसलिए शिकार का बहाना बनाकर जंगल में निकलना उनकी मजबूरी बन गई है.

तीन सालों से इस बस्ती के ज्यादातर घरों में यह रोजाना की बात हो गई है. दरअसल, 25 मई, 2013 को इसी गांव के निकट कांग्रेस काफिले पर जानलेवा हमला हुआ था. हमले के बाद झीरम में माओवादियों के प्रभाव को नियंत्रित करने के मकसद से इस गांव के दोनों छोर पर सरकार ने सुरक्षाबलों के कैंप बिठा दिए.

माओवादियों को नियंत्रित करने के मकसद से इस गांव के दोनों छोर पर सरकार ने सुरक्षाबलों के कैंप बिठा दिया

जिला मुख्यालय, जगदलपुर से सुकमा जाने वाले राजमार्ग संख्या 30 पर दरभा के एक सिरे पर स्थित है झीरम घाटी. पांच किमी के दायरे में फैली झीरम घाटी में एक दर्जन मोहल्ले या छोटे गांव हैं. शुरुआत ठोठापारा और दूसरा छोर पांच किमी दूर तोंगपाल के पूसपाल के निकट सरपंचपारा में है.

ठोठापारा, कांडकीपारा और कैंप पारा राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे हुए हैं. इन तीनों गांव में युवक और युवतियों पर सुरक्षाबलों का दबाव इतना अधिक है कि वे उनसे जान बचाने के लिए गांव छोड़कर जंगल में छिप जाते हैं. बुजुर्ग महिला और पुरुष इस डर के मारे बेदम पड़े रहते हैं कि कहीं उनके परिजनों को फर्जी मुठभेड़ का शिकार न बना दिया जाय. हाल ही में सुकमा के मोखपाल में शिकार पर गए युवकों को कथित मुठभेड़ में मारे जाने के बाद लोगों का डर और बढ़ गया है.

न तीर न कमान

झीरम जाने के बाद जब पता चला कि वहां के युवा शिकार के लिए गए हैं तो यह पत्रकार भी उसी दिशा में आगे बढ़ गया. दो-तीन किलोमीटर जंगल में जाने के बाद एक खुली जगह पर दर्जन भर युवा बैठे हुए दिखाई दिए. पूछताछ करने पर पहले तो उन्होंने बहानेबाजी की कि हम जंगल घूमने आए हैं. कुछ देर की चर्चा में वे खुल गए.

उन्होंने बताया कि पुलिस और माओवादी दोनों के ही दबाव से बचने के लिए वे इस तरफ निकल आते हैं. उनसे बचने के लिए वे जंगल में दिन गुजारते हैं. तीन सालों में ऐसी नौबत सैकड़ों बार आई है कि जब उन्होंने जंगल में रात गुजारी है. उनकी बात सच इसलिए जान पड़ी की शिकार के लिए न तो उनके पास कोई हथियार दिखाई दिए, न ही तीर कमान. वे अपनी सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित थे.

जंगल हैं, लेकिन जानवर तक नहीं

झीरम के चारों ओर जंगल ही जंगल हैं. पास ही कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान है. 200 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले इस पार्क सहित नजदीकी जंगल में शिकार के लिए जानवर मिलना तो दूर कंदमूल भी बेहद मुश्किल से मिलता है. इससे एक बात फिर साबित होती है कि ग्रामीण शिकार के लिए जानवर की तलाश में भला क्यों भटकेंगे? जो दो-चार लोग गांव मेंं मिले उनका कहना है कि झीरम कांड पता नहीं किसने किया है, पर पुलिस वाले हमेशा पूछताछ के नाम पर हमें उठा लेते हैं. इससे बेहतर है कि या तो गांव को सरकार उजाड़ दे या फिर सुरक्षा-बलों के कैंप को हटा दे. ग्रामीण सहदेव ने बताया' "कांडकीपारा में आबादी तो है पर पानी नहीं है."

सरकार तो पहुंची है, लेकिन नहीं पहुंचा सुराज

गांवों में कांक्रीट रोड़, हैंड पंप और सोलर बिजली को देखकर यह कह सकते हैं कि यहां सरकार तो पहुंची है, लेकिन सुराज नहीं नजर आता है. गांव के मोहल्ले में सस्ता चावल नहीं पहुंच पाया है.

गांव में जंगल काटकर खेती करने का प्रचलन बढ़ा है. यहां जिंदगी के सात दशक देख चुकी वृद्धा देई ने बताया, 'कोसरा पीसकर पेज बनाकर खा लेते हैं. दाल, सब्जी जैसी चीजें तो कभी नसीब नहीं हुआ है.' दो दर्जन से अधिक परिवारों की गरीबी का आलम यह है कि तन पर पहने हुए कपड़ों और इक्का-दुक्का बर्तन ही उनकी सकल संपत्ति है. इन ग्रामीणों के पास न तो पहचान पत्र हैं, न ही सरकारी योजनाओं का रत्ती भर फायदा इन्हें मिल पाया है.

First published: 30 July 2016, 12:58 IST
 
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