Home » इंडिया » Catch Hindi: time machine returned from future and stamement of a sansakri cow
 

व्यंग्य: भविष्य से लौटी टाइम मशीन और संस्कारी गाय का बयान

संदीप सिंह | Updated on: 18 July 2016, 8:16 IST
(कैच)
QUICK PILL
दस्तावेज नंबर 2ये 2115 वाले आला दर्जे के वैज्ञानिक हैं. इन्होंने जानवरों की भाषा समझने और लिखने में सफलता पायी है. अभी शुरुआत पालतू जानवरों से की गयी है. बीते समय के जानवरों की कई उम्दा रिकार्डिंग्स इनके पास हैं. मुक़द्दस जानवर ‘गौ-माता’ (पहले तुच्छ लोग इन्हें गाय कहते थे) को इन लोगों ने बहुत तव्वजो और नाम-इकराम दिया. उनके आर्काइव में रखी ‘गौ-माता’ के बयानों की कुछेक पांडुलिपियां वैज्ञानिक लायें हैं. ‘गौ-माता’ का यह 100 बरस पुराना बयान है. कहीं-कहीं वो पर्सनल हो गयी हैं और भाषा के राजपथ से उतर जनपथ पर चली गयी हैं. माता हैं, उनकी कृपा हम पर बनी रहे. पेश-ए-खिदमत

“बां बां.. मेरा नाम सीधी-सादी गाय है. किस्मत से मिल जाय तो घास वर्ना प्लास्टिक खाकर भी काम चला लेती हूं. कुछ भी खाकर जिन्दा रहती हूं और दूध देती हूं. अरे एक बात बताना मैं भूल ही गयी. मनुष्य मानते हैं कि मेरा जन्म सिर्फ दूध देने के लिए हुआ है. इसलिए इंजेक्शन, एस्टेराइड्स देकर येन-केन-प्रकारेण मेरे भीतर से दूध निकाल ही लेते हैं. 

मेरी किस्मत अच्छी है कि मैं हिन्दुस्तान की गाय हूं. मुए अमरीकी, इजरायली तो मुझे मारकर खा जाते हैं. वहां की बहनों के बारे में सोचकर ही मुझे रोना आता है. कुछ लोग हैं, मुझे देखते ही उनकी लार टपकने लगती है. आजकल एक बंदा सब कामधाम छोड़ पूरी दुनिया का चक्कर इसलिए लगाता रहता है कि हमारी बहनों का वध बंद हो. ऐसा उसका दावा है.

बंदा मुझे ‘मां’ कहता है. उसने वादा किया है ‘मां, तेरा वध रुकवाने के लिए मैं पूरी दुनिया के कोने-कोने में जाऊंगा और ‘पिंक रिवोल्यूशन’ बंद करवाऊंगा’. लोग कहते हैं यह बहुत ही महान बंदा है. पहले के महापुरुषों के जूते, कपड़े, चश्मे पहनने का इसे बहुत शौक है. लोग इसकी महानता पहचानने में गलती न कर दें इसलिए कभी-कभी कोट पर अपना नाम लिखवा लेता है. नाहक इस बंदे को विरोधी ‘उड़ता पीएम’ बोलते हैं. अरे वो तो पिछले जन्म का क़र्ज़ उतार रहा है! 

व्यंग्य: भविष्य से लौटी टाइम मशीन और एफटीआईआई में युधिष्ठिर का एक साल

देखो, क्या होता है. आप ही बताओ किसको अच्छा लगेगा कि उसकी बिरादरी क़त्ल होती रहे. गाय हो या इंसान- हैं तो सब बराबर ही न. उसके इस वादे से हमारी पूरी बिरादरी बहुत खुश है. मैं ज्यादा दूध देने लगी हूं. मेरी सगी गुजराती बहन तो इतनी खुश हुई है कि सीधे सोना मूतने लगी है. 

वैसे सुनने में आया कि पराये मुल्कों में जाकर यह भाषणबाजी, नगाड़ेबाजी और फोटोबाजी में ज्यादा ध्यान दे रहा है. मां और लुगाई की तरह हम गायों का इस्तेमाल भी वह सिर्फ फोटू खिंचवाने और वोट पाने के लिए करेगा तो बात बिगड़ सकती है. हम गायों की कौम भी उसे फेंकू और जुमलेबाज कहने लगेगी.

बाबा आदम का जमाना

जानते हो, बाबा आदम और बेद-वेद के जमाने में यहां के बंदे मुझे खा लेते थे. वो मुआ याज्ञवल्क्य, वो तो मेरा मांस खाने के लिए गोविंदा की तरह नाचता था. आगे इनको सद्बुद्धि आयी. अब वे मुझे पूजते हैं. उन्होंने मेरी रक्षा के लिए सेनाएं बना रखी हैं. इनके स्वयंसेवक नियम से लोगों की रसोइयां और फ्रिज वगैरह चेक करते रहते हैं.

मैं अपनी जान पर खेलकर हिन्दुस्तान देश को एकजुट करने का एजेंडा बनी गई हूं. ये तो इतने बेचारे हैं कि इनके पास ‘एक’ होने का और कोई साधन न था. मैं न होती तो ये क्या करते!  

भैंसों को ज्यादा दूध और मांस देने के बावजूद गायों जैसी इज्जत नहीं मिलती

कुछ बहनों के चलते मेरी बहुत बदनामी हो रही है. यह ठीक है कि ‘पवित्र गाय’ का नारा सुन-सुनके बेचारियों को खुद में ‘दिव्य-शक्ति’ होने का फितूर चढ़ गया. उनको लगता है तुच्छ ट्रेन और गाड़ियां भला हमारा क्या कर लेंगी. पर सच यही है कि न मैंने किसी का खेत खाया है, न ही मैंने ट्रैफिक जाम लगाया. 

सारी पृथ्वी पर मनुष्यों ने मकान बना लिए. बिल्डरों ने हमारे खेतों, चरागाहों, तालाबों पर कब्ज़ा कर लिया. जैसे ही हम बूढ़ी होकर दूध देना बंद करती हैं. हमें घरों से निकाल दिया जाता है या फिर औने-पौने दामों पर बेच दिया जाता है. आप ही बताओ फिर हमारी अभागी बहनें क्या करें. वे ‘स्वच्छता अभियान’ और ऑड-इवेन ट्रैफिक सिस्टम’ को सफल बनाने में जुट जाती हैं.

गुजरात: वैज्ञानिकों का दावा, गोमूत्र में मिले सोने के कण

यही हाल हमारे बैलों-साड़ों का है. हमारा तो उनसे मिलन ही न होने देते हैं अब. अजीब-अजीब सुइयां बना लीं हैं इंसानों ने. इंजेक्शन लगाकर गर्भवती कर देते हैं हमें. अब परखनली से पैदा हुए बच्चे कैसे होंगे. कुछेक किस्मतवाले सांड़ बचे हैं उनसे कौम की यह दुर्दशा अब देखी नहीं जाती तो इधर-उधर सींग मारते हैं. 

मेरे नाम का बेजा इस्तेमाल भी बहुत हो रहा है. असल में आम हिन्दुस्तानियों की तरह हालत तो मेरी भी ख़राब है. अब भैंसों को ही लो. मुझसे किसी बात में कम नहीं. पर उनकी कोई कद्र नहीं. 

एक कह रही थी “क्या बहन, सारा फोकस तुम्हीं खा लेती हो. तुमसे ज्यादा दूध हम देवें, तुमसे ज्यादा मांस हमारा खाया जाय, तुमसे ज्यादा मेहनत हमारे बालक करें. पर पूजा सिर्फ तुम्हारी हो. इसीलिए न कि हम काली चमड़ी के हैं. देखो तो इंसानों ने हमको वाहन भी बनाया तो यमराज का! एक ही था जो हमको सच्चा प्यार करता था. महिषासुर. उसको ये लोग राक्षस बना दिए. ई कैसा न्याय है बहन? हे ऊपरवाले किधर है तू?”.  

भेदभाव के खिलाफ

सच कहूं मैं भी यह भेदभाव नहीं मानती. पर क्या करूं. अब आप ही बताओ. विश्व में मेरी कुल आठ सौ किस्म की बहनें हैं. 26-27 तो हिंदुस्तान में ही पायी जाती हैं. बहुत सी बहनें इधर भी हैं, उधर भी. हम लोग पूरी तरह से अन्तरराष्ट्रीयतावादी हैं. हां, हैं हममें कुछ जो भटककर राष्ट्रवादी हो गयी हैं. वे भारतभूमि में आने वाली विदेशी बहनों से बहुत चिढ़ती हैं. 

नॉन एलायंमेंट मूवमेंट के बाद अब ‘काऊ एलायंमेंट मूवमेंट’ का वक़्त आ गया है

वैसे सच बताऊं तो ज्यादा पूछ विदेशी बहनों की ही है. गोरी मेम हैं न. अमरीका और इंग्लैण्ड से कुछ भी आ जाए. यहां के इंसान लोग बड़ा पसंद करते हैं. राष्ट्रवादी बहनों के कलेजों पर छूरी चल जाती है. कल एक बोली, ‘देखो बहन, हजारों सालों से हमने इन्हें अपना दूध-मांस पिला-खिलाकर बड़ा किया. देखो मौका मिलते ही गोरी मेम के पीछे लग लिए. हाय रे जमाना’. 

प्रश्न उठता है क्या सिर्फ हिंदुस्तान की गायें पवित्र हैं? या सारी गायें पवित्र हैं? सिर्फ इधर वाली पवित्र हैं, उधर वाली नहीं. जो यह कहता है वह धूर्त है और हमारी दुलत्ती खाने का हक़दार है. अगर वह मानता है कि सकल विश्व की गायें पवित्र हैं. तो यह विश्व का, आज और अभी का सबसे बड़ा मुद्दा है. जब तक यह मुद्दा हल न हो जाए, हम दूध देना बंद रखेंगीं. 

यदि हमारे प्रति ‘भक्ति’ सच्ची है तो देश की विदेश-नीति ‘गाय-सिद्धांत’ से चलाओ. जो देश गौ-वध बंद न करेगा उससे आर्थिक संबंध समाप्त. हमारी पेशाब में सोना मिलने के बाद अब घबराने की भी जरूरत न रही. सारे के सारे मुल्क अपने आप लाइन में आ जायेंगे. है हिम्मत? 

हम हिंदुस्तान की गायें गाय-गाय में भेद नहीं करती. अब वे अमरीका और यूरोप वाले हमारी कितनी बहनों को खा जाते हैं. क्या श्रवण कुमार को संयुक्त राष्ट्र-संघ में यह मुद्दा नहीं उठाना चाहिए. असली नारा तो ‘गौ-कुटुम्बकम’ होना चाहिए था जाने किस मूर्ख ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ कर दिया.

हरियाणा में गोरक्षा के लिए खट्टर सरकार ने शुरू की हेल्पलाइन

इंसानों ने अपना जाति-वर्ग-रंग-धर्म विभाजन किया हो सो हो. हमारे लिए दुनिया की सारी गायें एक हैं. सारे जीव-जंतु एक और बराबर हैं. मूर्खों अगर हम पूज्य है तो सब जानवर पूज्य हैं. हमारे नाम पर तुम दूसरों को पीटो, मारो, फांसी पर टांगों. यह न चलेगा.

जो अपने भाई-बंधुओं की कद्र न करे हमारी क्या करेगा. इनकी बदमाशी तो देखो, तेल में, खाने-पीने की चीजों में मेरी चर्बी मिलाकर बेचने वाले मेरे भक्त बने बैठे हैं. ऐसे ही कुछ ‘गौ-भक्त’ सबसे बड़े बूचड़खानों के मालिक हैं जो विदेशी ग्राहकों को हमारा ‘नरम, ताज़ा गौ-मांस’ स्टीकर लगाकर बेचते हैं. जूते, बेल्ट, बैग, जैकेट हमारे चमड़े से बनाकर ये बेंचे. ‘बैलापा’ बंद करो, बुलशिट. 

नॉन एलायंमेंट मूवमेंट के बाद अब ‘काऊ एलायंमेंट मूवमेंट’ का वक़्त आ गया है. हम हैं असली सर्वहारा. दुनिया की गायों – एक हो! दुनिया के जीवों – एक हो!” 

First published: 18 July 2016, 8:16 IST
 
संदीप सिंह @catchhindi

लेखक जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं. छात्र संगठन आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं. पढाई-लिखाई राजनीती विज्ञान, हिन्दी और दर्शनशास्त्र में हुई है. आजकल कलम की मजदूरी करते हैं. 

पिछली कहानी
अगली कहानी