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टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम का बयान नोटबंदी के विरोध में है या फ़तवा? मीडिया को भी समझना होगा

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 9 January 2017, 8:07 IST

कोलकाता के केंद्र में मौजूद ऐतिहासिक मस्जिद टीपू सुल्तान के मौजूदा इमाम मौलाना सैय्यद मुहम्मद नूरूर रहमान बरकती हैं. शनिवार की दोपहर 2 बजे कोलकाता प्रेस क्लब में एक प्रेस कांफ्रेंस कर उन्होंने नोटबंदी पर बयान जारी किया है. उनके बयान में कुछ जगहों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आपत्तिजनक बातें कही गई हैं. उनके बयान का कुछ हिस्सा भड़काऊ भी माना जा सकता है. 

ज़्यादातर समाचार चैनलों, अख़बारों और डिजिटल मीडिया ने इमाम के बयान को भड़काऊ मानकर प्रसारित किया है. मगर मीडिया ने उनके बयान को बयान न लिखकर फ़तवा क़रार देते हुए इसका सांप्रदायिकरण कर दिया है. 

भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई ने इमाम के ख़िलाफ़ थाने में शिकायत दर्ज कराई है जबकि पार्टी के महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी सिद्धार्थ नाथ सिंह ने इस कथित फ़तवे की निंदा करते हुए उनकी गिरफ़्तारी की मांग की है. 

पश्चिम बंगाल के स्थानीय भाजपा नेता मानस सरकार ने अपने वीडियो स्टेटमेंट में कहा है कि इमाम नुरूर का सिर काटकर काली के चरणों में रखने वाले को वह एक करोड़ का इनाम देंगे.

सवाल तीन हैं कि क्या टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम फ़तवा देने की योग्यता रखते हैं? दूसरा यह कि भाजपा और मीडिया जिसे फ़तवा कहकर प्रसारित कर रहा है, क्या उसे पड़ताल के बिना ऐसा कराना चाहिए? तीसरा मीडिया इस छोटी सी बात को क्यों नहीं समझता कि नोटबंदी का राजनीतिक विरोध देश का कोई भी नागरकि कर सकता है. मीडिया ने उसे फ़तवा क्यों करार दिया?

फ़तवा कौन दे सकता है?

इस्लाम में इमाम का काम मस्जिद में नमाज़ पढ़ाना है. यह ज़रूरी नहीं कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम धार्मिक मामलों का विशेषज्ञ भी हों. भले ही मस्जिद कितनी ख़ास क्यों ना हो. आमतौर पर इमाम मुफ़्ती नहीं होते. 

इस्लाम में कानूनविद को मुफ़्ती कहा जाता है. मुफ़्ती इस्लामिक मामलों के विशेषज्ञ होते हैं. इस्लाम का गहराई से अध्ययन मुफ़्ती होने की अहम शर्त है. 

इस्लामिक क़ानून किसी मुद्दे पर क्या कहता है, यह जानने के लिए मुफ़्ती का दरवाज़ा खटखटाया जाता है. इस्लामिक मामलों पर सुझाव, विचार या आदेश देने का नियंत्रण मुफ़्ती के पास है.

इस लिहाज़ से देखा जाए तो टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम मौलाना नुरूर रहमान फ़तवा देने के लायक़ नहीं हैं. फ़तवा देने के लिए उनका मुफ़्ती होना ज़रूरी है जबकि वो इमाम हैं. 

फ़तवा, बयान या अपील?

कोलकाता प्रेस क्लब में एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस ऑल इंडिया मजलिसे शुरा और ऑल इंडिया माइनॉरिटी फ़ोरम की तरफ़ से शनिवार दोपहर आयोजित की गई. मजलिसे शुरा की नुमाइंदगी टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम सैय्यद मुहम्मद नूरूर रहमान बरकती कर रहे थे और माइनॉरिटी फ़ोरम के चेयरमैन की हैसियत से वहां टीएमसी सांसद इदरीस अली मौजूद थे. 

यूट्यूब और सोशल मीडिया पर मौजूद इस प्रेस कांफ्रेंस के वीडियो में मौलाना नूरुर रहमान यह कहते हुए साफ़ सुने जा सकते हैं कि वह फ़तवा जारी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अगर कोई बहादुर शख़्स प्रधानमंत्री के चेहरे पर स्याही लगाता है तो उसे 25 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा. 

मगर कैच रिपोर्टर ने जब इस कथित फ़तवे का आधार पूछा तो इमाम ने कहा, 'मैंने फ़तवा नहीं बयान दिया है. फ़तवा तो किसी सवाल का जवाब होता है. यह मेरा बयान है जिसे फ़तवा नहीं कहा जा सकता.'

कैच रिपोर्टर ने जब इमाम से उनका पूरा नाम पूछा तो उन्होंने मौलाना मुफ्ती सैय्यद मुहम्मद नूरूर रहमान बरकती बताया. यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने नाम में मुफ़्ती शब्द भी जोड़ा. मगर वह सचमुच में मुफ़्ती हैं या नहीं, यह जांच का विषय है.  

इसकी संभावना ज़्यादा है कि वह मुफ़्ती नहीं हैं क्योंकि अगर वह मुफ़्ती होते तो यह नहीं कहते कि उन्होंने फ़तवा नहीं दिया है. 

इमाम, भाजपा और मीडिया का भड़काऊ खेल

प्रेस कांफ्रेंस की वीडियो सुनकर यह साफ़ है कि इमाम के बयान में एक अपील है. वह मोदी पर स्याही लगाने के लिए लोगों को उकसा रहे हैं. 

भाजपा जिसके नेता राजनीति में सफ़लता का मंत्र और शॉर्टकट मुसलमानों पर भड़काऊ बयान देने को मानते हैं, ऐसे बयान को तोड़-मरोड़कर उछालने से नहीं चूकते. 

मीडिया भाजपा के उछाले बयानों को उसी तरह लपकने के लिए लालयित दिखता है. इमाम के एक बयान को फ़तवा यानी कि एक धार्मिक आदेश के रूप में इस तरह प्रसारित किया जा रहा है कि जैसे मुसलमान ऐसे कथित फ़तवे मानने के लिए बाध्य होते हैं. इससे ये भी पता चलता है कि मीडिया में काम कर रहे पत्रकार इस्लाम की धार्मिक शब्दावली की कितनी समझ रखते हैं. 

इमाम, भाजपा और मीडिया की गतिविधि को जोड़कर देखा जाए तो यह साफ़ हो जाएगा कि तीनों मिलकर समाज का सांप्रदायिक आधार पर बंटवारा कर रहे हैं.

ममता के चापलूस इमाम?

टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम के बारे में खंगालने पर पता चलता है कि उनकी दिलचस्पी नमाज़ पढ़ाने से ज़्यादा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चापलूसी करने में रहती है. 

नोटबंदी का विरोध करने पर भाजपा ने ममता बनर्जी पर हमला तेज़ किया है. भाजपा को जवाब देने की ज़िम्मेदारी तृणमूल कांग्रेस और उसके नेताओं की है ना कि टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम नुरूर रहमान की मगर कई मौक़ों पर वह भाजपा को जवाब देते हुए दिखते हैं.

टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम नुरूर रहमान कई मौक़ों पर वह भाजपा को जवाब देते हुए दिखते हैं

पिछले महीने जब ममता बनर्जी दिल्ली में नोटबंदी के ख़िलाफ़ रैली कर रही थीं, तब पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा था, 'ममता दिल्ली में जब नाटक कर रही थीं तो हम चाहते तो बाल पकड़कर उन्हें वहां से बाहर निकाल देते. वहां पुलिस हमारी थी.'

तब इमाम नुरूर ने दिलीप घोष पर पलटवार करते हुए कथित फ़तवा जारी कर दिया था. उन्होंने कहा था, 'दिलीप घोष को संगसार कर दिया जाए और पत्थर से मार-मारकर राज्य से बाहर कर दिया जाए.'

कोलकाता के केंद्र में स्थित टीपू सुल्तान एक ऐतिहासिक मस्जिद है. इसका निर्माण टीपू सुल्तान के सबसे छोटे बेटे प्रिंस गुलाम मुहम्मद ने 1842 में करवाया था. यह मस्जिद इस मायने में ख़ास है कि अन्य धर्मों के मानने वाले भी यहां पहुंचते हैं. 

क्या इमाम मौलाना सैय्यद नुरूर रहमान बरकती टीपू सुल्तान मस्जिद की इस रोशन रिवायत का ख़्याल रख सकते हैं?

First published: 9 January 2017, 8:07 IST
 
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