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जगदीप छोकर: चुनाव लड़ने की योग्यता तय करना लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा है

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST

हरियाणा और राजस्थान की सरकार ने पंचायत चुनाव लड़ने के लिए निश्चित शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य कर दिया है. यह मामला नौ मार्च को राज्यसभा में उस समय उठाया गया जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद ज्ञापन चल रहा था. विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने दबाव डालकर राष्ट्रपति के अभिभाषण में संशोधन करवा लिया और सरकार के लिए एक असहज स्थिति का निर्माण किया.

कांग्रेस ने इन प्रतिबंधों को "भारत के 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं को चुनाव लड़ने से बाहर रखने” की कोशिश करार दिया. पार्टी ने आरोप लगाया कि "उन सब के लिए जिनकी पहुंच नहीं है, जो शोषित हैं और जिन्हें दबाकर रखा गया है", विशेषकर गरीबों, दलितों और आदिवासियों का चुनाव लड़ने का लोकतांत्रिक हक छीनने के लिए यह भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस का डिजाइन था.

विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद द्वारा प्रस्तावित संशोधन के तहत धन्यवाद ज्ञापन प्रस्ताव में यह जुड़वा दिया गया, “सरकार सभी नागरिकों के सभी स्तरों पर चुनाव लड़ने के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करने को प्रतिबद्ध है.

कांग्रेस ने इन प्रतिबंधों को "भारत के 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं को चुनाव लड़ने से बाहर रखने” की कोशिश करार दिया

हरियाणा के केस में, इस मामले को कानूनी रूप से चुनौती दी गई और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के कानून को ही सही ठहराया और कहा कि इसमें कुछ भी "तर्कहीन या असंवैधानिक या असंबद्ध” नहीं है. साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि आधारभूत शिक्षा "पंचायत के कर्तव्यों के सही तरह से निर्वहन में उम्मीदवारों को सक्षम बनाएगी.”

कैच ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफोर्म्स के संस्थापक प्रो. जगदीप छोकर से इस तरह की बाध्यताओं से समाज के कम विशेषाधिकार प्राप्त तबके पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर बात की.

जानिए प्रो. छोकर ने क्या कहा


इस तरह के चुनावी मापदंड लोकतंत्र का गला घोंट देंगे. हरियाणा में 587 गांवों में ऐसा कोई उम्मीदवार नहीं मिला जो न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता और घर में चालू अवस्था में शौचालय के निर्धारित मापदंड को पूरा करता हो. यह दर्शाता है कि कानून व्यावहारिक नहीं है.

व्यक्तिगत तौर पर मैं महसूस करता हूं कि जब तक देश के हर बच्चे के लिए तर्कसंगत अच्छी शिक्षा तक पहुंच न हो, तब तक चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों पर इस तरह की शैक्षणिक बाध्यताएं नहीं थोपी जा सकती. यदि हम पंचायत चुनावों के लिए दसवीं कक्षा को अनिवार्य कर देते हैं तो क्या हम विधानसभा चुनावों के लिए स्नातक और लोकसभा चुनावों के लिए स्नातकोत्तर को अनिवार्य करेंगे?

जब तक हर बच्चे तक तर्कसंगत अच्छी शिक्षा की पहुंच न हो, तब तक चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों पर इस तरह की बाध्यताएं नहीं थोपी जा सकती


इसका अंत चयनात्मक लोकतंत्र के रूप में होगा. यानी चुनिंदा लोगों तक ही लोकतंत्र की पहुंच सुलभ होगी. हमारे संविधान निर्माताओं ने इसके विपरीत विचार दिया था. उन्होंने हर भारतीय को सार्वभौमिक मताधिकार दिया, जिसे अब चुनौती दी जा रही है. यह असंवैधानिक है और हमारे देश का जैसा चरित्र है उसे बदलने की नीयत को दर्शाता है.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई तरीकों से गलत था. सबसे पहले, यह कानून चुनावी प्रक्रिया में रोड़े अटकाता है. जैसा कि इस फैसले के बारे में किए गए एक सर्वेक्षण भी हमें बताता है कि इस तरह के मापदंड हरियाणा में 68 प्रतिशत अनुसूचित जाति की महिलाओं को चुनाव लड़ने के अयोग्य बना देंगे.

दूसरा, यह निर्णय इस धारणा का सरलीकरण कर देता है कि “सिर्फ शिक्षा ही एक मनुष्य को सही-गलत और अच्छे-बुरे में अंतर करने की शक्ति” देती है. क्या देश की सर्वोच्च अदालत के पढे-लिखे जज यह कहना चाहते हैं कि उपनिवेशवादियों द्वारा शुरू की गई "शिक्षा” से पहले भारत में "सही एवं गलत और अच्छे एवं बुरे” में कोई अंतर नहीं होता था?

यह निर्णय इस धारणा का बल देता है कि “सिर्फ शिक्षा ही एक मनुष्य को सही-गलत और अच्छे-बुरे में अंतर करने की शक्ति” देती है


हरियाणा में, पिछले पंचायत चुनाव में 15,825 उम्मीदारों का चुनाव निर्विरोध हुआ, जो कि नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार को नुकसान पहुंचा रहा है. इस हानि का वर्णन खुद सुप्रीम कोर्ट ने नोटा से संबंधित फैसले में दिया है, “लोकतंत्र पसंद की बात है. यह पसंद मतदाताओं को वोट द्वारा अपना फैसला सुनाने का अधिकार देकर और उनकी इस पसंद के चयन में उन पर कम से कम पाबंदियां लगाकर ही इसे बेहतर तरीके से बयां किया जा सकता है.”

फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि "यदि वोट न करने का हक इनकार करने के समान है” तो यह संविधान की धारा 19(1)(a) के तहत और आरपी एक्ट की धारा 79(d) के अधिकार के तहत "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार” का उल्लंघन करना होगा.

सरल शब्दों में, उम्मीदवारों का निर्विरोध चयन होने का अर्थ है कि नागरिकों को वोट के अधिकार के साथ-साथ वोट न करने के अधिकार से भी वंचित किया जा रहा है. इस तरह का कोई भी चुनाव लोकतंत्र के विरोध और इनकार करने के समान है. क्योंकि यह नागरिकों को मौलिक अधिकार से वंचित करता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार "लोकतंत्र ही सबकुछ है.”

First published: 12 March 2016, 12:06 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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