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कश्मीर के लिए एक नई सोच और नई शुरुआत की जरूरत है

अरुण चौधरी | Updated on: 20 July 2016, 8:23 IST
(कैच)

आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिद्दीन के कमांडर बुरहान वानी के एक मुठभेड़ में मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला चल पड़ा जो अभी तक नहीं थमा है. विरोध प्रदर्शनों में एक पुलिस अधिकारी समेत अब तक 45 लोगों की जान जा चुकी है. 

मारे गए लोगों के अलावा प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से स्थानीय लड़के-लड़कियों की आंखों के गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाने की भी काफी चर्चा हो रही है. घाटी में आम नागरिक या तो पुलिसवालों और सुरक्षाबलों पर हमला करने वाली भीड़ में शामिल हैं या फिर तमाशबीन हैं.

सुरक्षाबल पत्थरबाजी करने वाली भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल करते हैं लेकिन कई बार इनसे आसपास के लोग भी घायल हो जाते हैं.

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पैलेट गन से सबसे ज्यादा समस्या उन लोगों को होती है जिनकी आंखों पर चोट लग जाए. कुछ मामलों में ऐसे लोगों की आंखों की रोशनी भी चली जाती है.

घाटी में बिगड़े हालात के लिए कौन जिम्मेदार है?

दक्षिण कश्मीर, खासकर पुलवामा, त्राल, बिजबेहरा और अनंतनाग में गुस्साई भीड़ पुलिस थानों और चौकियों पर हमला कर रही हैं. ऐसी स्थिति में सुरक्षाबलों के पास बलप्रयोग के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता.

सुरक्षाबलों को आम नागरिकों के खिलाफ न्यूनतम बलप्रयोग करने का प्रशिक्षण मिला होता है लेकिन कई बार अपने साथियों को घायल होते देख वो थोड़े ज्यादा सख्त हो जाते हैं. जिसने भी ऐसी परिस्थिति का सामना किया है वही सुरक्षाबलों की स्थिति समझ सकता है.

अतीत का सबक

अगर पीछे मुड़कर देखा जाए तो सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस स्थिति ऐसी स्थिति के लिए पूरी तरह तैयार नहीं नजर आते. वो बुरहान वानी की मौत पर होने वाली प्रतिक्रिया का अनुमान नहीं लगा पाए.

बुरहान कोई आम आतंकी नहीं था. वो नौजवान आतंकियों का सबसे लोकप्रिय चेहरा था.

खुफिया एजेंसियां बुरहान की बढ़ती लोकप्रियता को भांपने में भी विफल रहीं, जिसकी वजह से उसके जनाजे में भीड़ उमड़ी और हिंसा हुई.

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बुरहान वानी सोशल मीडिया की मदद से स्थानीय नौजवानों को आंतकवाद से जोड़ने की कोशिश कर रहा था. पिछले साल दक्षिण कश्मीर में हुए आतंकी हमले के लिए बुरहान का गुट जिम्मेदार था.

कश्मीर पर चर्चा करते समय इन बातों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. जब आप हिंसा का सहारा लेते हैं और उसका रूमानीकरण करने लगते हैं तो आप उन लोगों को खतरे में डाल रहे होते हैं जिनका उनका इससे कोई संबंध नहीं होता. ऐसी स्थिति में जब प्रशासन कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए बलप्रयोग करता है तो कई बार ऐसे लोग उसकी जद में आ जाते हैं. 

सरकार क्या कर रही है?

सरकार की जिम्मेदारी है कि ऐसी स्थिति में ऐसे कदम उठाए जिससे आंतकियों और भीड़ को कड़ा संदेश मिले.

लेकिन मौजूदा हालात में प्रशासन की प्रतिक्रिया मूक और निराशाजनक रही. जब दक्षिणी कश्मीर जलने लगा तो पहले 48 घंटे तक राज्य की सीएम नदारद रहीं.

घायलों के लिए अस्पतालों और दवाखानों में पर्याप्त दवाइयां और अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं. जिससे उनके शरीर और दिलों पर लगे जख्मों को भरा जा सके.

जो जनप्रतिनिधि आक्रोशित भीड़ को शांत कर सकते थे, वो मौका-ए-वारदात से गायब थे.

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आगे का रास्ता

कश्मीर के लिए ऐसी अव्यवस्था नई बात नहीं है. 2008 में अलगाववादी नेता शेख अज़ीज़ की मौत हो या 2008 और 2010 में श्रीनगर और दक्षिणी कश्मीर में पत्थरबाजी हो, घाटी के हालात ऐसे ही हो गए थे. 

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सुरक्षाबलों को हर समय ऐसे हालात के लिए तैयार रहना चाहिए. यहां सुरक्षाबल सुस्त या क्रूर बनकर नहीं रह सकते लेकिन ताजा मामले में ऐसा होता दिख रहा है.

जानिए कश्मीर पर केंद्र सरकार कितना खर्च करती है?

घाटी में धीरे-धीरे हालात सुधर रहे हैं. अमरनाथ यात्रा दोबारा  शुरू हो चुकी है. लेकिन सुरक्षाबलों को नौजवान तकनीकी पसंद आतंकियों पर लगातार नजर रखनी होगी. ऐसे नौजवानों को जल्द से जल्द मुख्यधारा में वापस लाने की कोशिश करनी होगी.

कश्मीर में हिंसा बढ़ने की सीधी वजह अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों का बढ़ता प्रभाव हो, ये जरूरी नहीं है. लेकिन घाटी के नौजवानों को ओरलैंडो, फ्रांस, ब्रसेल्स या तुर्की में हुए हमलों से पढ़े-लिखे हिंसा की रूमानियत से प्रभावित कुछ नौजवानों को प्रेरणा मिल सकती है.

केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि वो ऐसे नौजवानों की वाजिब चिंताओं को दूर करने की कोशिश करे. सरकार को घायलों के उपचार के लिए भी समुचित प्रबंध करना चाहिए.

कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसके लिए पूरी तरह पाकिस्तान को जिम्मेदार बता देना, सही तरीका नहीं है. हमें लोगों से जुड़ने के लिए एक नई शुरुआत करनी होगी. इस दिशा में पहला कदम कश्मीर मुद्दे के सभी पक्षों से संवाद बहाल करना होना चाहिए.

First published: 20 July 2016, 8:23 IST
 
अरुण चौधरी @catchhindi

लेखक पूर्व पुलिस निदेशक हैं. वो इंटेलिजेंस ब्यूरो में भी काम कर चुके हैं, जहां उन्होंने लम्बे समय तक कश्मीर का प्रभार देखा.

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