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हरिवंश राय बच्चन: इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 November 2016, 8:07 IST
(एजेंसी)

इलाहाबाद के महान कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्म 7 नवंबर, 1907 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव पट्टी में हुआ था. ये हिन्दू कायस्थ परिवार से संबंध रखते हैं.

इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव और माता का नाम सरस्वती देवी था. इनको बाल्यकाल में 'बच्चन' कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ 'बच्चा या संतान' होता है. बाद में हरिवंश राय ने 'बच्चन' को अपना उपनाम बना लिया और इसी नाम से मशहूर हुए.

1926 में 19 वर्ष की उम्र में उनका विवाह 'श्यामा बच्चन' से हुआ जो उस समय 14 वर्ष की थी. लेकिन 1936 में श्यामा की टी.बी के कारण मृत्यु हो गई.

पांच साल बाद 1941 में बच्चन ने पंजाब की तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं. इसी समय उन्होंने 'नीड़ का पुनर्निर्माण' जैसे कविताओं की रचना की.

तेजी बच्चन से अमिताभ तथा अजिताभ दो पुत्र हुए. अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा के महानायक कहे जाते हैं.

हरिवंश राय बच्चन की शिक्षा इलाहाबाद तथा कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में हुई. इन्होंने कायस्थ पाठशालाओं में पहले उर्दू की शिक्षा ली जो उस समय क़ानून की डिग्री के लिए पहला क़दम माना जाता था.

इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी में एम. ए. और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. किया.

कार्यक्षेत्र

शिक्षा लेने के बाद हरिवंश राय बच्चन कई साल तक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाते रहे. कुछ समय के लिए हरिवंश राय बच्चन आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से सम्बद्ध रहे.

उसके बाद 1955 में वह विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ होकर दिल्ली चले गये.

साहित्यिक परिचय

'बच्चन' की कविता के साहित्यिक महत्त्व के बारे में अनेक मत हैं. वो उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं. 'बच्चन' के काव्य की विलक्षणता उनकी लोकप्रियता है. यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि आज भी हिन्दी के ही नहीं, सारे भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में 'बच्चन' का स्थान सुरक्षित है.

'बच्चन' छायावाद के अतिशय सुकुमार्य और माधुर्य से, उसकी अतीन्द्रिय और अति वैयक्तिक सूक्ष्मता से, उसकी लक्षणात्मक अभिव्यंजना शैली से उकता गये थे.

उर्दू की गज़लों में चमक और लचक थी, दिल पर असर करने की ताक़त थी, वह सहजता और संवेदना थी, जो पाठक या श्रोता के मुंह से बरबस यह कहलवा सकती थी कि, मैंने पाया यह कि गोया वह भी मेरे दिल में है. मगर हिन्दी कविता जनमानस और जन रुचि से बहुत दूर थी.

'बच्चन' ने उस समय (1935 से 1940 ई. के व्यापक खिन्नता और अवसाद के युग में) मध्यवर्ग के विक्षुब्ध, वेदनाग्रस्त मन को वाणी का वरदान दिया.

उन्होंने सीधी, सादी, जीवन्त भाषा और सर्वग्राह्य, गेय शैली में, छायावाद की लाक्षणिकता की जगह संवेदनासिक्त अभिधा के माध्यम से अपनी बात कहनी प्रारम्भ की.

'बच्चन' का 'तेरा हार' पहले भी प्रकाशित हो चुका था, पर उनका पहला आधिकारिक काव्य संग्रह 1935 ई. में प्रकाशित 'मधुशाला' को ही माना जाता है.

'मधुबाला', 'मधुशाला' और 'मधुकलश'- एक के बाद एक, ये तीनों संग्रह शीघ्र ही सामने आ गये हिन्दी में जिसे 'हालावाद' कहा गया है. ये उस काव्य पद्धति के बड़े ग्रन्थ हैं.

उस काव्य पद्धति के संस्थापक ही उसके एकमात्र सफल साधक भी हुए, क्योंकि जहां 'बच्चन' की पैरोडी करना आसान है, वहीं उनका सच्चे अर्थ में, अनुकरण असम्भव है. अपनी सारी सहज सार्वजनिकता के बावजूद 'बच्चन' की कविता नितान्त वैयक्तिक, आत्म-स्फूर्त और आत्मकेन्द्रित है.

सम्मान और पुरस्कार

हरिवंश राय बच्चन को उनकी कृति 'दो चट्टानें' को 1968 में हिन्दी कविता के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था.

उन्हें 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के 'कमल पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया. बिड़ला फाउन्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिये उन्हें सरस्वती सम्मान दिया था.

हरिवंश राय बच्चन को भारत सरकार द्वारा सन् 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था.

हिन्दी कविता और साहित्य के मूर्धन्य कवि हरिवंश राय बच्चन का निधन 18 जनवरी 2003 को मुम्बई में हुआ.

First published: 28 November 2016, 8:07 IST
 
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