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टोल टैक्स: सरकारों ने बनाया सोने का अंडा देने वाली मुर्गी

गुलाब कोठारी | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL

लोकतंत्र में बहुमत के आधार पर सरकार बनाई जाती है. जनता से कर रूप में राजस्व इकट्ठा करके सरकार क्षेत्र का विकास करती है. जनता का सम्मान तथा जनता के अधिकारों को सुरक्षित रखती है. संविधान में लोकतंत्र के तीन पाए रखे गए हैं, जो सरकार के कामकाज को सुचारु बनाए रखने की गारंटी देते है. 

इन पायों के वेतन भत्तों का प्रावधान भी इस राजस्व में रहता है. आज क्या हो रहा है?

करों की बाढ़ है, महंगाई ने चमड़ी छील रखी है. राजस्व जो भी आता है कर्मचारियों के वेतन-भत्ते और पेंशन भी कम पड़ जाता है. काम कराना है तो ऊपर से रिश्वत भी दो. विकास चाहिए तो बाहर से ब्याज पर उधार लाना पड़ेगा. भावी पीढ़ियां चुकाती रहेंगी. विकास ही के नाम पर हमने देखा विमंदित बच्चों एवं महिलाओं के पोषण का चित्र, जहां स्वयं सरकार कोर्ट एवं सदन के पटल पर भी झूठे आंकड़े रखने में शर्माती तक नहीं. 

राजस्थान सरकार ने जमीनें अवाप्त करने का जो विधेयक पास किया है, उसमें किसान की मर्जी के खिलाफ भी सरकार जमीनें अवाप्त कर सकेगी

जनता के अधिकार तो कहीं सुरक्षित ही दिखाई नहीं पड़ते. और तो और भारत के नागरिक को भारत में चलने की छूट तक नहीं है. लोकतंत्र में स्पष्ट बहुमत अहंकार का पर्यायवाची है. हमने हाल ही में उत्तराखंड के मामले में केंद्र की दादागिरी का उदाहरण देखा है. तब बेचारी जनता की तो हैसियत ही क्या है.

अभी हाल ही में राजस्थान सरकार ने किसानों की जमीनें अवाप्त करने का जो विधेयक पास किया है, इससे किसान की मर्जी के खिलाफ भी सरकार जमीनें अवाप्त कर सकेगी.

क्यों? क्या सरकार को ऐसे कानून बनाने से पहले सार्वजनिक बहस नहीं छेड़नी चाहिए? सरकार जिस निर्ममता से जनता की संपदा बेच रही है अथवा अनधिकार चेष्टा कर रही है, वह लोकतंत्र की मर्यादा के बाहर है. खेती की जमीनों का सड़कों और उद्योगों के लिए उपयोग करना तब आवश्यक है जब सरकार के पास जमीनें उपलब्ध न हों.

आज रीको के कितने औद्योगिक क्षेत्र खाली पड़े हैं, अथवा बंद पड़े हैं. वहां सड़कें भी हैं और पानी बिजली भी. यहां तक कि कुछ क्षेत्रों में लोगोंं ने आवास तक बना लिए हैं. फिर अवाप्ति की यह लीला क्यों? यह सारे विषय न्यायपालिका के योग्य हैं.

सड़कों का बजट कर्मचारी खाते हैं. सड़कें ठेके पर बनती हैं. ठेकेदार और विभाग मिलकर जनता का खून पीते हैं

सड़कें बनाना सरकार के विकास का प्रमाण है. प्रधानमंत्री सड़क योजना में प्रत्येक गांव-कस्बा सड़क से जुड़ चुका है. फिर भी और कितनी सड़के बनाई जा चुकी हैं. सड़कें सरकार के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन चुकी हैं. विभाग को कुछ करना नहीं पड़ता. सड़कों का बजट कर्मचारी खाते हैं. सड़कें ठेके पर बनती हैं. ठेकेदार और विभाग मिलकर जनता का खून पीते हैं. कितने मुकदमें लंबित हैं बीओटी को लेकर. क्यों नहीं विशेष ध्यान देकर लूट को रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए?

मूल रूप से ठेकेदार को सड़क बनाने का खर्चा और ब्याज मिलना चाहिए. रखरखाव का बजट विभाग इसी में से निकाल सकता है. नहीं तो विभाग की जरूरत क्या है? ठेकेदार से लेते रहना-खाते रहना? आज कई सड़कों की लागत दस-पंद्रह गुणा निकल गई, टोल चालू है. क्यों सरकार सामन्ती रुख बनाकर जनता के साथ अन्याय करती है? कई बार तो सड़क बनना शुरू होने से पहले ही टोल लेने लगते हैं. 

उदयपुर से डूंगरपुर के 110 किमी में पांच टोल आते हैं. ये किस नियम के तहत बने हैं? टोल सरकार की नीयत का जीता-जागता नमूना है. ढूंढ़ने निकले तो कई प्रभावी लोगों के रिश्तेदार भी ठेकेदार निकल सकते हैं. तब बंद कौन कराए? आप किसी भी फैसला करने वाले अधिकारी को एक-दो करोड़ महीना बांध दें, तो जनता रोती रहे-चीखते रहे, सबके कान बंद मिलेंगे.

इसको आंखों से देखना है तो किसी भी टोल बूूथ से पहले गाड़ी नीचे गांव में उतार लें. आकाओं के लठैत आपकी गाड़ी को आगे बढ़ने ही नहीं देंगे. मानो यह आपका देश ही नहीं है. क्या सामन्ती युग में भी ऐसा भयावह दृश्य आम था? आप अपने देश में बिना टैक्स दिए चल नहीं सकते. यह बहुमत का लोकतंत्र है, जिसे जनता ने सौंपा है.

अभी हाल में जो रिसर्जेंट राजस्थान में एमओयू हुए, उनमें से अधिकांश तो खारिज हो चुके हैं

अभी हाल में जो रिसर्जेंट राजस्थान में एमओयू हुए, उनमें से अधिकांश तो खारिज हो चुके हैं. जो बचे हैं उनको करने वालों की आंखें सस्ते दामों पर जमीनें हड़पने पर लगी हैं. पुराने वर्षों के आयोजनों का रिकॉर्ड उपलब्ध है.

सरकार को सोना उगलने वाली जमीनों को लुहारों के हाथों हर्गिज नहीं बेचना चाहिए. सड़कों के लिए भी प्रदेश के क्षेत्रफल का कोई एक प्रतिशत निश्चित कर दिया जाए, उससे अधिक जमीन उपलब्ध न कराई जाए. कई स्थानों पर आप देख सकते हैं कि नई सड़क के पास ही पुरानी सड़क बदहाल सी पड़ी है. उस जमीन का कोई उपयोग नहीं. पास के पेड़ सब कट गए, पक्षी लोगों के पेट में पहुंच चुके. 

कम से कम इन पुरानी सड़कों पर तो ढाबे, आपातकालीन सेवाएं, मोटल्स जैसी कुछ सुविधाएं विकसित की ही जा सकती हैं. किंतु सरकार ने देना ही बंद कर दिया. कुछ आता रहे ऐसे राजमार्ग खुले रहें बस. इन मार्गों पर लगे टोल नेताओं के विकास का सिंहद्वार बने रहें. इसीलिए इस मुद्दे के फैसलों की टालमटोल बनी हुई है. आगे भी बनी रहेगी.

First published: 14 May 2016, 2:28 IST
 
गुलाब कोठारी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका समूह के एडिटर इन चीफ हैं

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