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क्या भारत की शीर्ष कम्पनियां पारदर्शी, विश्वसनीय और जवाबदेह हैं?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 16 February 2017, 7:56 IST

ऑक्सफेम इंडिया ने हाल ही में कॉरपोरेट रिस्पॉंसबिलिटी वाच, प्रेक्सिस एंड पार्टनर्स इन चेंज के साथ मिलकर इंडिया रिसपांसिबल बिजनेस इंडेक्स (आईआरबीआई) का दूसरा संस्करण जारी किया है. इस सूची में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध शीर्ष 100 कम्पनियों की उनके सामाजिक, पर्यावरण और व्यापार की आर्थिक जिम्मेदारी के लिए कॉरपोरेट मंत्रालय द्वारा जारी स्वैच्छिक दिशा-निर्देशों के तहत उनके जुड़ाव की रैंकिंग की गई है.

आईआरबीआई के दूसरे संस्करण को जारी करते हुए नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा कि भारत जिस मुख्य चुनौती का सामना कर रहा है, वह है स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में किए जा रहे भारी निवेश को किस तरह से प्रभावकारी तरीके से उपयोग में लाया जा सके. उसके संसाधनों का हम कहां पऱ प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल कर सकें.

उन्होंने आगे कहा कि इसे सुलभ बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा कम्पनियों को अपने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉंसबिलिटी लक्ष्यों को हासिल करने की जरूरत है. वर्तमान में भारत की सिर्फ 18 फीसदी कम्पनियां ही कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉंसबिलिटी लक्ष्यों को पूरा कर रही हैं.

सिर्फ 18 कंपनियां ईमानदार

वाकई में, जब भारतीय कम्पनियों की कार्य संस्कृति की बात आती है तो आईआरबीआई की रिपोर्ट से चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा होता है. शीर्ष 100 कम्पनियों में से केवल 18 कम्पनियां ही कायदे-कानूनों के अनुसार अनुबंध वाले अपने कर्मचारियों को सामाजिक लाभ जैसे कि प्राविडेन्ट फंड और स्वास्थ्य बीमा की सुविधा देती हैं, केवल 16 कम्पनियां ही स्थानीय लोगों को रोजगार देने के प्रति प्रतिबद्धता दिखाती हैं, केवल 5 ही नियमों का पालन करती हैं और 95 कम्पनियों ने अपनी परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के लिए न तो सामाजिक सुरक्षा का दायित्व निभाया है और न ही उन्हें बेहतर अवसर प्रदान किए हैं.

केवल दो कम्पनियों ने ही अपने परियोजना क्षेत्रों से लोगों के विस्थापित होने, उनके पुनर्वास, पुननिर्वेशन और उन्हें रोजगार देने की संख्या बताई है. किसी भी कम्पनी के पास पुनर्वास के लिए नीति तैयार करने के लिए सिस्टम ही नहीं है. आईआरबीआई ने कॉरपोरेट एकाउंटेबिलिटी और गवर्नेंस को लेकर जो खुलासे किए हैं, उसके असर को बेहतर तरीके से समझने के लिए कैच ने तीन विशेषज्ञों से बात की.

पहले के योजना आयोग के पूर्व सदस्य अरुण मारिया अकाट्य तर्कों के साथ बताते हैं कि सीएसआर का नवाचार कॉरपोरेट गवर्नेंस का मूल्यांकन करते समय एक धक्का क्यों हैं और किस तरह से अपने उत्तरदायित्व से बचने के लिए चालाकी भरा रास्ता अपनाते हुए एकाउंटेबिलिटी से अपना ध्यान मोड़ लिया गया है.

किसी भी कम्पनी के पास पुनर्वास के लिए नीति तैयार करने के लिए सिस्टम ही नहीं है.

ऑक्सफेम की सीईओ निशा अग्रवाल दावा करती हैं कि पिछले दशक से भारतीय कम्पनियां और ज्यादा पारदर्शी हुईं हैं. भारतीय कम्पनियां अब भूमि अधिग्रहण, स्थानीय लोगों को रोजगार देने समेत इसी तरह के मामलों में अन्य जानकारियां देने के प्रति ज्यादा इच्छुक हैं.

उन्होंने यह बात भी तफसील से बताई कि किस तरह से कम्पनियों को छोटी जगहों पर लोगों की सुविधाओं पर ध्यान देने और थर्ड पार्टी के साथ व्यापार करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि इन सब लोगों का कम्पनियों के लाभों में बड़ा योगदान होता है लेकिन कर्मचारी इन लाभों से वंचित रह जाते हैं.

एक गैर सरकारी संगठन नेशनल फाउंडेशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक अमिताभ बेहर उन वजहों के बारे में बताते हैं कि विशिष्ट कॉरपोरेट क्षेत्रों को क्यों नियमों की पालना करने में दिक्कत आती है और क्यों वे अपने कर्मचारियों को बेसिक लाभ नहीं दे पाते हैं. उन्होंने यह भी व्याख्या की कि अपनी गतिविधियों के बारे में ज्यादा जानकारी देने के साथ ही नियमों के क्रियान्वयन में सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियां निजी क्षेत्र की कम्पनियों से क्यों कहीं आगे हैं.

First published: 16 February 2017, 7:56 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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