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सीएसडीएस का सर्वे: देश का युवा परंपरागत, रुढ़िवादी और भाजपा को पसंद करता है

चारू कार्तिकेय | Updated on: 6 April 2017, 9:55 IST


अगर देश के युवाओं के बारे में हाल में किए गए एक अध्ययन पर गौर करें तो इससे देश के भविष्य के बारे में सचमुच एक चिंताजनक तस्वीर उभरती है. सैंपल पर आधारित इस सर्वे में बुनियादी रूप से तस्वीर यह उभरती है कि बड़ी संख्या में इस देश का युवा चिंताग्रस्त है, रुढ़िवादी है, बहुमत अनुगामी है और सिर्फ सरकारी नौकरी की ही चाहत रखता है. इसमें भी सबसे चौंकाने वाली बात सर्वे की यह है कि आम जनभावना के विपरीत, युवा आबादी का बड़ा भाग सोशल मीडिया से चिपका हुआ नहीं है और उसके असर में नहीं है.

यह सर्वे सेंटर फॅार स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज ने लगभग एक साल पहले अप्रैल-मई 2016 में कोनार्ड अडेनैयूर स्टिफतुंग ने किया था. इस सर्वे के दौरान 19 राज्यों के 15 से 34 साल के 6.122 युवाओं से बात की गई. सर्वे में गोवा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू—कश्मीर और उत्तर—पूर्व के राज्यों को शामिल नहीं किया गया.

प्रोफाइल


सर्वे में जवाब देने वालों में से 32 प्रतिशत छात्र थे, 18 प्रतिशत कृषि सेक्टर में काम करने वाले थे, 18 प्रतिशत घर पर रहने वाले थे, 7 प्रतिशत बिजनेसमैन थे और 2 प्रतिशत सरकारी नौकरी में थे. 22 प्रतिशत इन सब के अलावा दूसरे प्रकार के कामों से जुड़े हुए थे.

इनमें से 46 प्रतिशत शादीशुदा थे और इसमें भी 84 प्रतिशत की शादी माता—पिता की मर्जी से यानी अरेंज्ड मैरिज थी. सिर्फ 4 प्रतिशत ने अपनी जाति से बाहर जाकर शादी की थी. यह और बात है 50 प्रतिशत युवाओं को अंतर्जातीय विवाह से कोई आपत्ति नहीं थी.

 

आकांक्षाएं


इन युवाओं में 65 प्रतिशत की बड़ी मात्रा में सरकारी नौकरी करना चाहते हैं. सिर्फ 7 प्रतिशत लोग ही निजी नौकरी करना चाहते थे और 19 प्रतिशत कोई अपना ही कारोबार शुरू करने के इच्छुक थे.

विश्वास

सर्वे के डाटा को देखें तो देश में युवाओं की बड़ी आबादी धार्मिक और अपने दृष्टिकोण में रुढ़िवादी है. सर्वे में 35 प्रतिशत ने माना है कि वे बहुत धार्मिक हैं और इसमें भी 12 प्रतिशत ने कहा कि वे बहुत ही अधिक धार्मिक हैं.


लगभग 41 प्रतिशत ने, अलग—अलग दृढ़ता से, कहा कि महिलाओं को नौकरी आदि नहीं करना चाहिए, 43 प्रतिशत ने कहा कि पुरुष बेहतर नेता होते हैं और 51 प्रतिशत ने कहा कि पत्नियों को हमेशा अपने पति की बात सुनना चाहिए और सिर्फ 4 में से एक ने कहा कि समान लिंग के लोगों के बीच रोमांटिक संबंध ठीक हैं.


जब दूसरों में कौन से गुण स्वीकार्य हैं और किस तरह की गतिविधियां उचित हैं इसकी बात आती है तो 27 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें ऐसे पड़ोसी से कुछ न कुछ परेशानी तो होगी जो कि मांसाहारी खाना पकाता हो, 22 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें अलग धर्म के पड़ोसी से थोड़ी—बहुत परेशानी होगी और 47 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें इस बात से परेशानी होगी कि उनके पड़ोस में अविवाहित युगल एक साथ रहता हो और 26 ने अफ्रीकन पड़ोसी को पसंद नहीं किया.

अपनी सारी रुढ़िवादिता के साथ इन युवाओं में आश्चर्यजनक रूप से शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के लिए समर्थन देखने को मिला. लगभग 48 प्रतिशत ने एससी और एसटी के लिए नौकरियों में और 46 प्रतिशत ने शिक्षा में आरक्षण को ठीक माना. 45 प्रतिशत ने पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए नौकरी और शिक्षा में आरक्षण का समर्थन किया. हिंदू सवर्ण युवाओं ने आरक्षण का विरोध किया, जिससे यह संकेत मिलता है कि उच्च जातियों की श्रेष्ठता का भाव इस नई पीढ़ी में भी आ चुका है. संयोग से भारत की समस्याओं में प्राथमिकता का क्रम देखें तो जातिवाद उनकी सूची में सबसे अंत में आता है.

 

राजनीतिक विश्वास


विभिन्न पैमानों पर युवाओं के दिए गए जवाबों को देखें तो सबसे अधिक संख्या में युवा भाजपा के निर्वाचक बनने को तैयार दिखते हैं. यह और बात है 48 प्रतिशत ने कहा कि वे भाजपा को अपने राजनीतिक दल के रूप में नहीं देखते जबकि 20 प्रतिशत ने कहा कि राजनीतिक दलों की उनकी प्राथमिकता में भाजपा सबसे पहले है. लगभग 16 प्रतिशत ने कहा कि वे गैर—कांग्रेसी, गैर—भाजपाई और गैर—समाजवादी तथा गैर वामपंथी दलों को पंसद किया. जबकि सिर्फ 10 प्रतिशत ने कांग्रेस को प्राथमिकता दी.


इन सब आंकड़ों पर गौर करें तो स्पष्ट तौर पर तो 20 प्रतिशत युवा अपने को भाजपा के करीब पाते हैं पर बड़ी मात्रा में युवाओं के धार्मिक और पितृसत्तामक होने के साथ वे उच्च वर्ण की श्रेष्ठता में भी भरोसा करते हैं. इसके अतिरिक्त 49 प्रतिशत चाहते हैं कि मृत्युदंड कानून में बना रहना चाहिए, 60 प्रतिशत चाहते हैं कि ऐसी फिल्मों पर रोक लगे जिनसे धार्मिक भावनाएं आहत होती हों और 46 प्रतिशत मानते हैं कि बीफ खाना कोई निजी चुनाव का मसला नहीं है और इसे सीमित—प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. बहुमत के दृष्टिकोण से युवाओं का नजरिया सिर्फ एक मायने में अलग है कि उनमें से 45 प्रतिशत मानते हैं कि आतंकवाद के केसों में मुस्लिमों को गलत फंसा दिया जाता है.

समाज की व्यापक समस्याओं से यह युवा को बमुश्किल ही कोई सरोकार दिखता है. जिन युवाओं को चिंता है उनमें से 18 प्रतिशत का मानना है कि बेरोजगारी देश की सबसे बड़ी समस्या और इसके बाद 12 प्रतिशत आर्थिक असमानता और 9 प्रतिशत भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी समस्या मानते हैं. जबकि स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को 6 प्रतिशत, आबादी वृद्धि को 4 और अशिक्षा को 3 तथा जातिवाद और सांप्रदायिकता को 3—3 प्रतिशत युवा सबसे बड़ी समस्या मानते हैं.

सर्वे का चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें से 55 प्रतिशत युवा अत्यधिक चिंताग्रस्त दिखे, इनमें भी शहरी युवा और उच्च आय वर्ग और उच्च शिक्षा प्राप्त युवा अधिक चिंतित दिखे. इसमें भी रोचक यह है कि अधिकांश युवा अपने माता—पिता के स्वास्थ्य के प्रति भी चिंतित दिखे. युवा की अन्य चिंताओं में उनकी उम्र के साथ कुछ बदलाव भी दर्ज किया गया. 18 से 25 उम्र वर्ग के युवा जहां रोजगार के प्रति चिंतित दिखे, वहीं 15 से 17 उम्र वर्ग के युवा अपने शिक्षा को लेकर चिंतित दिखे.

 

सर्वे युवाओं के बारे में उस प्रचलित अवधारणा को भी चुनौती देती है जिसके अनुसार युवाओं की अधिकांश आबादी ने या तो कभी सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप और यूट्यूब का इस्तेमाल नहीं किया या फिर वे इसका यदा—कदा ही इस्तेमाल करते हैं. सर्वे करने वाले संगठन ने इस बारे में ग्रामीण और शहरी युवा के आधार पर अलग से कोई डाटा जारी नहीं किया, जिससे इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. उदाहरण के लिए इस बारे में सर्वे में कुछ नहीं कहा गया है कि सोशल मीडिया के उपयोग के बारे में इस तरह के हैरान करने वाले डाटा के पीछे वजह क्या है.


इस संभावना के बारे में अन्य कारण यह हो सकता है कि ग्रामीण और अर्ध-नगरीय क्षेत्रों में इंटरनेट की उपलब्धता अधिक न हो. पर यह सब केवल अनुमान है. सीएसडीएस और केएएस इसके बारे में विस्तृत डाटा जल्द ही जारी करेंगे तब हम इसके बारे में विस्तार से जान पाएंगे.

First published: 6 April 2017, 9:55 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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